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बया की पाती (जुलाई-सितम्‍बर, 2010)

ज़मीनी संकट

आम जनता की स्थिति व्यवस्था-नियंताओं की नज़र में कठपुतली जैसी है। जिसके भी हाथ में इस कठपुतली के धागे का छोर होता है वही अपनी मर्जी से इसको नचाता है। चारों तरफ जिस कदर आए दिन नए-नए घोटालों को लेकर रहस्योद्घाटन होते रहते हैं, ऐसे में उदाहरण देकर इस व्यवस्था-नियंताओं की असलियत अलग से बताना ज़रूरी नहीं। व्यवस्था के हमाम में नंगे हो चुके ये नियंता हमारी ज़मीन जिसको चाहे उसको मनमाने ढंग से सेज़ के नाम पर दे सकते हैं। ज़मीन से जुड़े लोग दर-ब-दर होते आ रहे हैं, तो होते रहें। करोड़ों की कंपनियाँ बसाने के लिए कुछ हज़ार लोगों को कभी भी और कहीं भी भगाया जा सकता है। ज़्यादा हो-हंगामा करनेवाले को माओवादी घोषित कर उनके खिलाफ ग्रीनहंटया सलवा जुडुमजैसा अभियान चलाने का अनुभव और विशेषाधिकार तो सरकार के पास है ही। इससे भी स्थिति काबू में न आएगी तो अपनी सेना किस दिन काम आएगी!
            व्यवस्था के इन नियंताओं को ज़मीन से जुड़े लोगों की चिंता सिर्फ वोट माँगने के समय होती है। ऐसी ही स्थिति जंगल से जुड़े आदिवासियों की है। उनकी समस्याएँ सर्वाधिक विकराल रूप ले चुकी हैं। जहाँ एक तरफ उन्हें जंगल-ज़मीन ही नहीं, जंगली पेड़-पौधे, जड़ी-बूटी, घास-पत्ते तक से बेदखल किया जा रहा है; वहीं उनके साथ पराए देश के नागरिक से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। आदिवासियों पर व्यवस्था और शासनतंत्र से जुड़े लोगों का विश्वास प्राय: नहीं है। तभी तो उन्हें इस क़दर संदेह से देखा जाता है कि अक्सर तमाम पात्रता और योग्यता के बावजूद सरकारी सेवाओं में चयन के वक्त इन्हें अयोग्य करार दिया जाता है। आदिवासी इलाके में कोई भी बड़ी घटना घटित होने पर सबसे पहले उन्हें ही शक के घेरे में लिया जाता है और पूछताछ के नाम पर डराया-धमकाया और निरंतर परेशान किया जाता है। अन्यथा क्या वजह है कि हर साल बड़ी संख्या में माओवादियों के नाम पर निर्दोष आदिवासी मारे जा रहे हैं?
            पानी के लिए तो लगभग हर जगह स्थिति विस्फोटक होती जा रही है। आम जुमले की तरह कही जानेवाली यह बात कि अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए होगासौ प्रतिशत सच है। बहुत गंभीरतापूर्वक देखा जाए तो इस विश्वयुद्ध की शुरुआत हो चुकी है और औपनिवेशिक शत्रु के रूप में जल पर क़ब्ज़ा करने के लिए बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हमारे देश के विभिन्न हिस्सों में अपना जाल बिछा चुकी हैं। गौर करेंगे तो पाएँगे कि बोतल बंद पानी से जुड़ी बड़ी कंपनियों में से अधिकांश हमारे देश से बाहर की ही हैं। इनके ठण्डोंऔर मिनरल वाटरोंका ही वरदान है कि नगरों-महानगरों में ही नहीं, छोटे-छोटे शहर-कस्बों और गाँवों का भी भूजल स्रोत लगातार नीचे जा रहा है। जहाँ कहीं सहज है भी, ज़हरीले रसायन के कारण वह पीने लायक नहीं। नदियाँ-तालाब और झील का पानी भी ज़्यादातर जगहों पर सामान्य उपयोग लायक़  भी नहीं रहा। जिस देश की जनता को पीने का पानी और साँस लेने की हवा तक के लिए नगद मूल्य चुकाना पड़े, उससे अभागा कौन होगा?
            इस समय देश के विभिन्न कोनों से विभिन्न बैनरों तले जो आंदोलन चल रहे हैं उनमें से अधिकांश जल-जंगल-ज़मीन से जुड़े मसलों को लेकर ही हैं। ऐसे में जन चिंताओं और सरोकारों से जुड़ाव रखनेवाले हर सजग-संवेदनशील नागरिक का कर्तव्य बनता है कि वे सामर्थ्‍य भर अपनी लड़ाई लडऩे आगे आएँ। देश और देश की प्राकृतिक संपदाओं की चिंता व्यवस्था से ज़्यादा आम जनता की होनी चाहिए।

इस अंक में जल-जंगल-ज़मीन की समस्याओं पर अर्थशास्त्री गिरीश मिश्र और पत्रकार कृपाशंकर चौबे के विचारोत्तेजक लेख हैं। इसके साथ ही रवीन्द्रनाथ ठाकुर की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में हम उनके रचना-संसार के दो अपेक्षाकृत कम चर्चा में रही विधाओं पर विशेष सामग्री लेकर आए हैं। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कहानियों और कविताओं के साथ ही उनके उपन्यासों पर काफी चर्चा बांग्ला-हिन्दी ही नहीं, बाहर की दुनिया में भी हुई है लेकिन उनके चित्र और नाटक पर स्वतंत्र और महत्त्वपूर्ण लेख प्राय: दिखने में नहीं आते। इसलिए इस अंक में उनकी चित्रकला पर वरिष्ठ चित्रकार अशोक भौमिक के विस्तृत लेख के साथ ही उनके नाटक पर सोमेन सरकार के गंभीर लेख दिए जा रहे हैं। इस अंक के सारे चित्र भी रवीन्द्रनाथ ठाकुर के हैं।
            इस अंक में चर्चित उपन्यासकार प्रियंवद का ताज़ातरीन उपन्यास धर्मस्थलदिया जा रहा है।  प्राचीन भारतीय इतिहास एवं संस्‍कृति के मर्मज्ञ कथाशिल्पी प्रियंवद के इस उपन्यास में हमारी न्याय-व्यवस्था का पवित्र स्थल न्यायालय का आज के संदर्भ में एक नया पाठ प्रस्तुत किया गया है। निश्चय ही बयाके पाठकों के लिए इस उपन्यास का पाठ यादगार होगा।