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नईम : गलत पते पर समय


आज दिनांक 16/04/2011 को प्रसिद्ध गीतकार नईम जी के गृहनगर देवास में उनके चुनिंदा व श्रेष्‍ठ गीतों का नवीनतम संकलन 'गलत पते पर समय' वरिष्‍ठ आलोचक नामवर सिंह के हाथों जारी हो रहा है। इस अवसर पर आयोजित काव्‍य-गोष्‍ठी में वरिष्‍ठ कवि-गजलकार अदम गोंडवी, रामकुमार कृषक सहित देश के कई जाने-माने रचनाकार भाग ले रहे हैं। अंतिका प्रकाशन परिवार अपनी इस नवीनतम किताब के जारी होने के अवसर पर एक सप्‍ताह के लिए हरेक तरह के व्‍यक्तिगत पाठक हेतु विशेष छूट घोषित कर रहा है।... पुस्‍तक का मूल्‍य है 225.00 जो कि छूट के बाद 150 रुपए मात्र में प्राप्‍त किया जा सकता है।



'गलत पते पर समय' वरिष्ठ गीतकार नईम के चुनिन्दा प्रतिनिधि नवगीतों का संकलन है। गीतों का चयन नईम ने खुद किया था। संकलन कहीं और से होना था, जो परिस्थितिवश न हो सका। सभी नवगीत देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में छपे हैं और पाठकों के बीच आज भी बेहद लोकप्रिय हैं। गीति-अभिव्यक्ति नईम की जिंदगी के सिक्के का पहिला पहलू है। नईम ने भारतीय ग्रामीण परिवेश की सहज जि़दगी से खुद को ऐसा समरस कर लिया है कि, षट्ऋतुएँ नईम के गीतों में सुर में सुर मिलाकर गाती हैं। हद यह कि गाँव के चूल्हे-जाँते (चक्की) तक नईम के गीत गाये जाते हैं।
चाहे नईम ने जीवन भर कस्बाई शहरों के सरकारी कॉलेजों में पढ़ाया, लेकिन उनका तन-मन बुन्देलखण्ड से लेकर सतपुड़ा की वादियों और मालवा के पठारों में ही रमा। यही गवई मन लोक बानी में उनके नवगीत गाता है। जिंदगी की ही तरह, नईम के गीतों में 'सच' सर्वोपरि है। 'सच' की गेयात्मक अभिव्यक्ति के पेशेनज़र उन्हें काव्य के ख्वाब-ओ-खयाल या ज़ज़्बाती गुमरही से सख्त गुरेज़ है। समकालीन समाज जीवन की सच्चाईयाँ उजागर करने में नईम न खुद को बख्शते और न कवि-लेखक समुदाय को।
भारतीय समाज का पूँजीपति सामन्ती भद्रलोक, अटूट धनसम्पत्ति के मद में आमजन, औरत और दलित का मनमाना शोषण सदियों से करता आ रहा है। यही अय्याश भद्रलोक नईम के गीतों का निशाना है। आमजन के मरण-मारन की यह व्यथा-कथा नईम के काव्य में हर जगह गूँजती है।
भ्रष्टाचार के रसातल में पहुँचा यह देश नईम के छन्दों में तड़पता मिलता है। जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता के धुर विरोधी नईम, स्वतंत्रता के बाद देश के विकास के सफर पर जलते सवालों की आईनावार चोट लगातार किए जा रहे हैं, क्योंकि व्यवस्था से तसल्लीकुन जवाब मिलना आसान नहीं है। नईम की गीति-चेतना में कोई दरार, फाँक, समझौतापरस्ती या अवसरवादी पाला बदल नहीं, क्योंकि यह जान तो खालिस गीति-गेयता पर कुर्बान है :
                                   गीतों में कबीरा को जिया करता है
                                   एहसास में रसखान हुआ करता है
                                   मजलूम के दु:ख-दर्द की आवाज़ नईम
                                   सौ फीसदी इन्सान हुआ करता है।

नईम

जन्म : 01 अप्रैल, 1935, फतेहपुर (हटा) जि़ला-दमोह (म.प्र.)। पिता- अब्दुल करीम खान (शिक्षक)।
शिक्षा : दमोह से बी.ए., सागर विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश से हिन्दी में एम.ए.। कुछ दिन दमोह के एक विद्यालय में अध्यापकी, 1961 से महाविद्यालय शिक्षा में। देवास, धार, राजगढ़, सीधी, शाजापुर के कॉलेजों में अध्यापन।
1995 में पी.जी. कॉलेज के प्राचार्य पद से सेवानिवृत्त।
सृजन : गीत, गजल, सॉनेट एवं काष्ठ शिल्प।
संग्रह : 'पथराई आँखें', 'बातों ही बातों में', 'लिख सकूँ तो', 'पहला दिन मेरे आषाढ़ का', 'उजाड़ में परिन्दे' आदि।
संपादन : लघु पत्रिका 'जरूरत'।
काष्ठ शिल्प : कालिदास एकेडमी उज्जैन, जहाँगीर आर्ट गैलरी, मुम्बई (1997), त्रिवेणी कला संगम, नई दिल्ली (1998), जहाँगीर आर्ट गैलरी, मुंबई (2004)
पुरस्कार : पथराई आँखों पर म.प्र. साहित्य परिषद का दुष्यंत पुरस्कार। डॉ. शम्भूनाथ सिंह शोध सम्मान का 'नवगीत सम्मान'। म.प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 'भवभूति अलंकरण' (2003)। 'परिवार पुरस्कार', मुम्बई (2004)। दीर्घ साधना सम्मान, दुष्यंत स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय, भोपाल। उ.प्र. सरकार का साहित्य भूषण सम्मान (2006)। 'श्रेष्ठ कला' आचार्य सम्मान, मधुबन, भोपाल।
निधन : 09 अप्रैल, 2009