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रामाज्ञा शशिधर और वसंत सकरगाए के नवीनतम कविता संग्रह आज जारी

''बुरे समय में नींद''
HB 200.00 PB 100.00
जब मैंने पहली बार दिल्ली के 'आकाश दर्शन' में एक युवा स्वर को उत्पीडि़त पृथ्वी के गीत—बिहार के जमीनी दलित के गीत—गाते हुए सुना तो मैं सम्मोहन से भर गया। कुछ देर के लिए ऐसा लगा जैसे भोजपुर का कोई नंगे पाँव दलित भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु के शहादत दिवस पर मयूर विहार के अभिजन, सभ्य समाज को आंदोलित करने चला आया हो।
शशिधर की इन कविताओं को जब मैंने सुना तो ऐसा महसूस हुआ कि भूमिहीन गरीब का जीवन उसी की भाषा, उसी के अंदाजे बयाँ में पूरे हाड़-मांस के साथ जीवंत हो गया है। यही कारण है कि शशिधर मेरे प्रिय कवि हो गए हैं, और मैं उनका मुरीद बन गया हूँ।
—वरवर राव

रामाज्ञा शशिधर की कविताएँ संवेदना की नई बनावट केसाथ-साथ यथार्थ को देखने परखने के अपने नज़रिए के कारण भी प्रभावित करती हैं। यह नई रचना दृष्टि आम आदमी के संघर्षों में उनकी सक्रिय भागीदारी की देन है। आज की कविता और कवियों को देखते हुए इसे दुर्लभ ही माना जाएगा। इसीलिए रामाज्ञा अपने समकालीनों में सबसे अलग हैं।
    वे किसान चेतना और प्रतिरोध के कवि हैं और इस रूप में नागार्जुन की परंपरा का विकास उनमें देखा जा सकता है। वे जानते हैं कि खेत में सिर्फ अन्न ही नहीं पैदा होते हैं, बल्कि फाँसी के फंदे के धागे, कफन के कपड़े और श्रद्धांजलि के फूल के उत्स भी खेत ही है। इस तरह किसान जीवन के संघर्ष ही नहीं, त्रासदी और विडंबनाओं की गहरी समझ भी शशिधर के पास है।
    शशिधर की संवेदना किसानों और बुनकरों की त्रासदी के चित्रण तक ही सीमित नहीं है। वे वर्तमान राजनीति के पाखंड को उजागर करने के साथ-साथ आज की कविता, कला और भाषा को लेकर भी गहरे सवाल उठाते हैं। जीवन-दृष्टि की यह व्यापकता ही उन्हें एक अलग काव्य व्यक्तित्व प्रदान करती है।
—मदन कश्यप


 रामाज्ञा शशिधर
02 जनवरी, 1972 को बेगूसराय जि़ले (बिहार) के सिमरिया गाँव में निम्नवर्गीय खेतिहर परिवार में जन्म। चार बहन-भाइयों  में अग्रज। दिनकर उच्च विद्यालय सिमरिया के बाद लनामिवि, दरभंगा से एम.ए. तक की शिक्षा। एम.फिल. जामिया मिल्लिया इस्लामिया एवं पीएच-डी. जेएनयू से।
2005 से हिन्दी विभाग, बीएचयू में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।
गाँव में दिनकर पुस्तकालय के शुरुआती सांस्कृतिक विस्तार में 12 साल का वैचारिक नेतृत्व, कला संस्था 'प्रतिबिंबÓ की स्थापना एवं संचालन तथा इला$काई किसान सहकारी समिति के भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष। जनपक्षीय लेखक संगठनों के मंचों पर दो दशकों से सक्रिय। इप्टा के लिए गीत लेखन।
लगभग आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन। दिल्ली से प्रकाशित समयांतर (मासिक) में प्रथम अंक से 2006 तक संपादन सहयोगी। ज़ी न्यूज, डीडी भारती, आकाशवाणी एवं सिटी चैनल के लिए छिटपुट कार्य।
प्रकाशित पुस्तकें : 'आँसू के अंगारे, 'विशाल ब्लेड पर सोई हुयी लड़की' (काव्य संकलन), 'संस्कृति का क्रान्तिकारी पहलू' (इतिहास), 'बाढ़ और कविता' (संपादन)। पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं के अलावा आलोचना, रिपोर्ताज और वैचारिक लेखन। 'किसान आंदोलन की साहित्यिक भूमिका' शीघ्र प्रकाश्य।
फिलहाल बनारस के बुनकरों के संकट पर अध्ययन।








''निगहबानी में फूल''
HB 200.00
वसंत सकरगाए का यह पहला कविता संग्रह है। पहले कविता संग्रह की तरह इसमें संशय भी है और उत्साह भी। बहुत कुछ कह डालने का उतावलापन भी है और बहुत कुछ कहने से अपने को रोक लेने का संकोच भी। एक नए कवि के पहले कविता संग्रह को पाठक हमेशा इस उम्मीद के साथ खोलता है कि वहाँ कहन का एक ताज़ा टटकापन ज़रूर होगा। अनुभवों में ताज़गी होगी। कुछ अक्सर अलक्षित रह जाने वाले हमारे आस-पास के दृश्य होंगे। जीवन की आपाधापी में ओझल हो गयी जीवन की नई सच्चाइयां होंगी। शिल्प में एक नई सी चमक होगी और भाषा में कुछ ऐसे शब्द होंगे जो हमारी भाषा का विस्तार करते हों। कहना न होगा कि वसंत सकरगाए की इन कविताओं में हमारे जीवन के अनेक चिरपरिचित दृश्यों, घटनाओं और अनुभवों में कुछ अदेखा रह जाने वाला, अक्सर अनकहा रह जाने वाला या कहें कि देखने-सुनने और कहे जाने से छूट जाने वाला कुछ है, जिसकी तरफ ये कविताएँ इंगित करना चाहती हैं। ये कविताएँ हमारे अनुभव में कुछ जोड़ती हैं। ये देखने में कुछ अलग से देखने को प्रस्तावित करती हैं। कई बार अचंभित करती हैं कि इस तरह तो हमने सोचा ही नहीं था। नर्मदा की पट्टी के अनेक शब्द और लोकानुभव की अनुगूँजें इन कविताओं में देखी सुनी जा सकती हैं।
वसंत का अनुभव संसार फकत मध्यवर्ग तक सीमित नहीं है। उसकी कविताओं में जीवन के अनेक संस्तर प्रकट होते हैं। उसमें हमारे जीवन के अँधेरे कोने-कुचाले हैं तो उसके धुले-उजले कोने भी हैं। जीवन की विद्रूपताएँ और विडम्बनाएँ हैं तो सुंदरता और विस्मित करने वाली आकस्मिकताएँ भी हैं। इन कविताओं में विषयों की विविधता का एक बहुरंगी लैण्डस्केप है। यह एक ऐसी कविता है जो हमारी विपुल और बहुरंगी सामाजिकता के अनेक पहलुओं को छूती है, टटोलती है और उनके ढके-छिपे रहस्यों को खोलती है। इन कविताओं की राजनीतिक दृष्टि उसकी सामाजिकता में ही विन्यस्त है। कहा जा सकता है कि उसकी सामाजिकता और उसकी राजनीति को एक-दूसरे से पृथक करना संभव नहीं है। उसके अन्तस में कहीं बहुत गहरे में अपनी पुरानी संस्कारबद्ध नैतिकताओं के आग्रह मौजूद हैं लेकिन वह इन नैतिकताओं पर भी सवाल उठाती हैं, उनसे जूझती हंै और टकराती हंै। मुठभेड़ करती हैं। वह पुरानी नैतिकताओं के सहज स्वीकार की कविता नहीं है। उसमें सही को स्वीकार करने का विवेक है और अस्वीकार करने का साहस भी।
वसंत की ये कविताएँ वस्तुत: समाज की परिधि पर खड़े उस आखिरी आदमी के पक्ष में बोलने वाली कविताएँ हैं जो अपनी फटी हुई चड्डी को अपनी हथेलियों से ढाँपने की कोशिश कर रहा है। जिसके लिये भाषा नया धागा कातने को आमादा है और जिसके लिये कविता सूखी घास में सुई को ढूँढ रही है। वस्तुत: ये कविताएँ आकाश में नक्षत्र की तरह चमकने या टूटने की चाहत की कविताएँ नहीं हंै ये तो अपनी ही ज़मीन पर जुड़कर टूटने और टूट कर फिर जुडऩे की इच्छा से भरी कविताएँ हैं।
— राजेश जोशी


वसंत सकरगाए 
02 फरवरी ( वसंत पंचमी) 1960 को मध्‍यप्रदेश के निमाड जनपद की तहसील हरसूद में (जो अब जलमग्‍न हो चुका) जन्‍म।
कविता के संस्‍कार अपनी जन्‍मभूमि से और परिष्‍कार सांस्‍कृतिक राजधानी तथा कर्मभूमि भोपाल में।
साहित्‍य और पत्रकारिता में समान रूप से सक्रिय।
वसुधा, साक्षात्‍कार, आकंठ, कला, समय, रंग, संवाद, वर्तमान साहित्‍य, कथन, कथादेश, अलाव आदि विभिन्‍न पत्र-पत्रिकाओं में नियमित प्रकाशन। आकाशवाणी तथा कई साहित्‍य-प्रसंगों में शिरकत। सांस्‍कृतिक यात्राएं और रचनात्‍मक सक्रियता के लिए पुरस्‍कृत।