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''स्‍त्री स्‍वाधीनता का प्रश्‍न और नागार्जुन के उपन्‍यास'' : श्रीधरम

HB 395/-
स्त्री स्वाधीनता का प्रश्न समकालीन भारत का एक प्रमुख प्रश्न है, जिस पर विचार करने के क्रम में सामंती और पूँजीवादी समाज दोनों की विकृतियों पर ध्यान देना आवश्यक है। स्त्री-विमर्श के दौर में स्त्री को मात्र 'देह' तक सीमित करना पूँजीवाद का चाकर होना है, जिसने नव उदारवादी अर्थव्यवस्था के ज़रिए स्त्री-देह का एक खुला व्यवसाय-जाल प्राय: सभी देशों में फैला रखा है। श्रीधरम उन सचेत युवा लेखकों में हैं, जो भूमंडलीकृत विश्व में विश्व सुंदरी प्रतियोगिता और 'सेक्स टूरिज्म' की आकर्षक-मोहिनी चालों तक को समझते हैं और हमें सावधान भी करते हैं।
उपन्यासकार नागार्जुन पर कोई भी सार्थक-सुसंगत विचार स्त्री स्वाधीनता के प्रश्न को केन्द्र में रखे बगैर संभव नहीं है। पहली बार नागार्जुन के ग्यारह हिंदी उपन्यासों और दो मैथिली उपन्यासों पर गंभीर विचार-विवेचन स्त्री-स्वाधीनता के संदर्भ में श्रीधरम ने किया है। पहला अध्याय 'पराधीनता का यथार्थ' सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। लेखक ने मातृसत्तात्मक समाज से लेकर सामंती-पूँजीवादी समाज तक की ऐतिहासिक विकास-प्रक्रिया पर गंभीर विचार किया है। उसके ध्यान में उत्तर आधुनिक समय भी है। नागार्जुन के उपन्यासों के यथार्थ को मिथिला के इतिहास और उसकी संस्कृति  के बगैर नहीं समझा जा सकता। मिथिला का सामंती समाज, ब्राह्मïणों के वर्चस्व, दरभंगा नरेश, राजा हरिसिंह देव द्वारा 1310 ई. में आरंभ की गई पंजी-व्यवस्था, इस व्यवस्था से उत्पन्न पंजीकार या घटक का एक नया वर्ग, बिकौआ प्रथा आदि ने स्त्री-दशा को विशेष रूप से प्रभावित किया।
यह पुस्तक नागार्जुन के उपन्यासों में चित्रित स्त्रियों को समग्रता में समझने के साथ मिथिलांचल और उसकी संस्कृति के एक रुग्ण पक्ष को समझने में भी सहायक है। इसमें एक ओर नागार्जुन की औपन्यासिक कृतियों में स्त्रियों के निजी दाम्पत्य, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक जीवन को समझा गया है, तो दूसरी ओर मिथिलांचल की एक तस्वीर भी पेश की गई है।
इस पुस्तक में विवाह-संस्था को स्त्रियों के हक में नहीं माना गया है। नागार्जुन के उपन्यासों में स्त्री-स्वाधीनता के प्रश्न को समझने के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है। परिशिष्ट में नागार्जुन पर छ: हिंदी और दो मैथिली कवियों की कविताओं से नागार्जुन का महत्त्व समझा जा सकता है। इस पुस्तक का हिंदी संसार में स्वागत होना चाहिए। यह उपन्यासकार नागार्जुन और उनके स्त्री-चिंतन को समझने के लिए एक जरूरी पुस्तक है।
—रविभूषण


परिचय : 
श्रीधरम


युवा कथाकार-समालोचक श्रीधरम का जन्म 18 नवम्बर, 1974 को चनौरा गंज, (मधुबनी, बिहार) में हुआ। मिथिला विश्वविद्यालय, दरभंगा से हिंदी-साहित्य में एम.ए., जामिया मिल्लिया इस्लामिया से एम.फिल. और भारतीय भाषा केन्द्र, जे.एन.यू. से 'नागार्जुन के साहित्य में स्त्री-स्वाधीनता का प्रश्न' विषय पर पीएच.डी.।
कई कहानियाँ और वैचारिक-आलोचनात्मक लेख प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित-चर्चित। हिंदी के अलावा मातृभाषा मैथिली में भी समान गति से सक्रिय। हिंदी त्रैमासिक 'बया', हिंदी मासिक 'कथादेश' और मैथिली त्रैमासिक 'अंतिकाÓ आदि पत्रिकाओं के संपादन से संबद्ध रहे।
'स्त्री : संघर्ष और सृजन' (2008), 'महाभारत' (पाठ्य-पुस्तक, 2007), 'स्त्री स्वाधीनता का प्रश्न और नागार्जुन के उपन्यास' (2011) प्रकाशित। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान द्वारा विदेशी छात्रों के लिए प्रकाशित पाठ्ïय-पुस्तक 'हिन्दी का इतिहास' (2007) का सह-लेखन एवं संपादन। शम्भुनाथ द्वारा संपादित पुस्तक '1857, नवजागरण और भारतीय भाषाएँ' (2008) में संपादन सहयोग। शीघ्र प्रकाश्य 'चन्द्रेश्वर कर्ण रचनावली' (पाँच खण्ड) का संपादन। 'नवजात (क) कथा' (कहानी-संग्रह) प्रकाश्य।
हिन्दी-मैथिली दोनों भाषाओं के कई महत्त्वपूर्ण चयनित संकलनों में कहानियाँ संकलित। कुछ कहानियाँ अन्य भारतीय भाषाओं में भी अनूदित-प्रकाशित।
केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, आगरा में विदेशी छात्रों एवं हिन्दीतर प्रदेश के अध्यापकों के बीच अध्यापन-प्रशिक्षण। सम्प्रति, गुरु नानक देव खालसा कॉलेज, देवनगर (दिल्ली विश्वविद्यालय) में असिस्टेंट प्रोफेसर (तदर्थ)।
ई-मेल : sdharam08@gmail.com