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कविता-संग्रह ''भाषा साँस लेती है'' और ''पगडंडियाँ गवाह हैं''

भाषा साँस लेती है


 इन कविताओं से गुज़रते-गुज़रते में लगातार खुशी और विस्मय में डूबा रहा। यहाँ युवा कविता का एक ऐसा स्वर सुनाई दिया जो केवल ताज़ा और नाद से परिपूर्ण ही नहीं है बल्कि इधर लिखी जा रही युवा कविता के बहुलांश में व्याप्त इकहरेपन, बड़बोलेपन और दृष्टि के अभाव का शिकार भी नहीं दिखलाई देता। कुमार सुरेश की हर कविता अपनी ज़मीन पर खड़ी नज़र आती है, वह ज़मीन जो हमारे बचपन, हमारी स्मृतियों, हमारे दुखों और जीवन की अनेकानेक विडंबनाओं को अपना विषय बनाती है। हर कविता का अपना कन्सर्न है, अपनी दिशा है, गति है और यहाँ कविता का जल सतत् प्रवाहमान दिखलाई देता है। हम कविता की आवाज़ और पुकार सुन सकते हैं। भाषा यहाँ जैसे निरंतर साँस लेती है। इन कविताओं में हमें कुछ नितांत ही अंतरंग पंक्तियाँ मिल जाती हैं जो स्मृति का हिस्सा बनती जाती हैं। कुमार सुरेश जैसे कवि को मैं उस पाँत में रखना चाहता हूँ जहाँ हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि अपनी कविता को संभव बना रहे हैं। यह ऐसी कविता नहीं है जिसे 'आज और अभीÓ की कविता या 'युवतम कविताÓ या युवा कविता जैसे खण्डों में ठेल दिया जाए। यहाँ हम खड़े होते हैं एक सतर्क, सजीव, परिपक्व और विचारोत्तेजक कविता के समक्ष जैसे कि कभी-कभार जि़क्र उठा करता है 'पुराने चावलÓ या 'पुरानी शराब के स्वाद का।
—नरेन्द्र जैन

कुमार सुरेश
कुमार सुरेश का जन्म शिवपुरी मध्यप्रदेश में 9 सितम्बर 1962 को हुआ। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इन्दौर से एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त की। 1982 से 1992 तक कारखाना अधिनयम के अंतर्गत नौकरी के दौरान श्रमिकों के जीवन को नजदीक से देखने का अवसर मिला। मध्यप्रदेश लोकसेवा आयोग से चयनित होकर वर्ष 1992 से 93 तक नायब तहसीलदार रहने के बाद पुन: चयनित होकर वर्ष 1994 से सहकारिता विभाग में। सम्प्रति: उपायुक्त सहकारिता।
वर्ष 1987 से व्यंग्य लेखन से सृजन-यात्रा का प्रारम्भ। समकालीन कविता की पहली पुस्तक 'शब्द तुम कहोÓ 2004 में प्रकाशित और चर्चित हुई। इसी पुस्तक पर वर्ष 2005 का रजा पुरस्कार मिला। 'रचना समयÓ पत्रिका की काव्य पुस्तिका 'आवाज एक पुल है में कविताएँ संकलित। कविताएँ 'नया ज्ञानोदय, 'समकालीन भारतीय साहित्य, 'परिकथाÓ, 'साक्षात्कारÓ, 'समावर्तनÓ, 'रचना समयÓ, 'पाण्डुलिपिÓ, 'आकण्ठÓ, 'अक्षराÓ एवं अन्य पत्रिकाओं में प्रकाशित। समालोचना, व्यंग्य, यात्रा विवरण, दार्शनिक आलेख एवं बाल साहित्य भी प्रकाशित। नव साक्षरों के लिए भी लेखन।
सम्पर्क : 14-ए, सागर एस्टेट, अयोध्या बायपास, भोपाल-462041 (म.प्र.)



 पगडंडियॉं गवाह हैं - आत्‍मा रंजन (Pagdandiyan Gawah hain : Aatma Ranjan)
आत्मा रंजन की ये कविताएँ हिन्दी की समसामयिक कविता को सहजता के साथ स्पर्श करती हैं। इनमें उनके कवि-अनुभोक्ता की जीवंत छवियाँ हैं। महीन किंतु मारक व्यंजना भी है इन कविताओं में। उन्होंने रचना में प्रतिफलित हर प्रसंग को शब्दों में हू-ब-हू उतारने का भरसक प्रयास किया है ताकि वह सामान्य आदमी के जैवी पर्यायों-विपर्यायों एवं जीवन के मारक एवं पोषक तत्वों की रहनुमाई कर सके।     रंजन ने कविता की पीछे छूट गई ज़मीन को फिर से टटोला है और निरंतर ऐसे सच को प्रकाशवृत्त में लाने की ऊहापोह की है जिसे हम आज प्राय: भुला चुके हैं। वे कविता के रूप में खँगाले गए सच और समाज से उसके सरोकार को एक संतुलित भावयष्टि में पिरोने का उपक्रम करते हैं। आज जबकि नई मीडिया टेक्नॉलोजी के जेरेअसर पूरा लिखित रचना साहित्य महज शेल्फों के क्षेपक भूमीय खातों में धूल फाँक रहा है, ऐसी कविता का कहा जाना एक साहसिक रचना कर्म का परिचायक है। कविता आज न केवल साहित्येतर अपितु साहित्य के हलकों में भी उपेक्षित हो रही है—इस तरह की कविताएँ सहसा हमें यह बोध कराती हैं कि हमने अपनी काव्य विरासत को बरसरे-रोज़गार होम कर दिया है।     इन कविताओं को पढ़कर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की 'काठ की घंटियाँÓ सहज ही स्मरण हो आती है जिनमें परोक्ष संवाद था, वक्रोक्ति व्यास शैली थी और थी मध्यवर्ग की बुर्जुवाई को तोड़ती हुई सहज और भरपूर प्रगतिशीलता। आत्मा रंजन ने भी हस्बेमामूल इन प्रतिमानों की चौहदी में अपने समीप के संसार को जिया है। उनकी इन रचनाओं में पारिवारी, समाजगत और परिवेशीय सभी स्थितियाँ सीधी-सरल काव्यपदीय भाषा में उकेरी नज़र आती हैं। आशा है सभी वर्ग के रसिक पाठक इन्हें पसंद करेंगे। —श्रीनिवास श्रीकांत
आत्मा रंजन की ये कविताएँ हिन्दी की समसामयिक कविता को सहजता के साथ स्पर्श करती हैं। इनमें उनके कवि-अनुभोक्ता की जीवंत छवियाँ हैं। महीन किंतु मारक व्यंजना भी है इन कविताओं में। उन्होंने रचना में प्रतिफलित हर प्रसंग को शब्दों में हू-ब-हू उतारने का भरसक प्रयास किया है ताकि वह सामान्य आदमी के जैवी पर्यायों-विपर्यायों एवं जीवन के मारक एवं पोषक तत्वों की रहनुमाई कर सके।
    रंजन ने कविता की पीछे छूट गई ज़मीन को फिर से टटोला है और निरंतर ऐसे सच को प्रकाशवृत्त में लाने की ऊहापोह की है जिसे हम आज प्राय: भुला चुके हैं। वे कविता के रूप में खँगाले गए सच और समाज से उसके सरोकार को एक संतुलित भावयष्टि में पिरोने का उपक्रम करते हैं। आज जबकि नई मीडिया टेक्नॉलोजी के जेरेअसर पूरा लिखित रचना साहित्य महज शेल्फों के क्षेपक भूमीय खातों में धूल फाँक रहा है, ऐसी कविता का कहा जाना एक साहसिक रचना कर्म का परिचायक है। कविता आज न केवल साहित्येतर अपितु साहित्य के हलकों में भी उपेक्षित हो रही है—इस तरह की कविताएँ सहसा हमें यह बोध कराती हैं कि हमने अपनी काव्य विरासत को बरसरे-रोज़गार होम कर दिया है।
    इन कविताओं को पढ़कर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की 'काठ की घंटियाँÓ सहज ही स्मरण हो आती है जिनमें परोक्ष संवाद था, वक्रोक्ति व्यास शैली थी और थी मध्यवर्ग की बुर्जुवाई को तोड़ती हुई सहज और भरपूर प्रगतिशीलता। आत्मा रंजन ने भी हस्बेमामूल इन प्रतिमानों की चौहदी में अपने समीप के संसार को जिया है। उनकी इन रचनाओं में पारिवारी, समाजगत और परिवेशीय सभी स्थितियाँ सीधी-सरल काव्यपदीय भाषा में उकेरी नज़र आती हैं। आशा है सभी वर्ग के रसिक पाठक इन्हें
पसंद करेंगे।
—श्रीनिवास श्रीकांत


आत्मा रंजन
जन्म : 18 मार्च 1971 (दस्तावेज़ों में 13 मार्च, 1970) को एक साधारण किसान परिवार में।
शिक्षा : एम.ए., एम. फिल. (हिन्दी साहित्य) हि.प्र. विश्वविद्यालय,    शिमला से।
सृजन : देश भर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ और कुछ समीक्षाएँ प्रकाशित। कुछ रचनाएँ संपादित संकलनों में भी संकलित। कुछ रचनाओं का अंग्रेजी व पंजाबी में अनुवाद। 'पगडंडियाँ गवाह हैं' पहला ही कविता-संग्रह।
सम्मान : युवा शिखर साहित्य सम्मान-2010 से सम्मानित।
सम्प्रति : हि.प्र. उच्च शिक्षा विभाग में वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर हिन्दी के प्राध्यापक।
स्थाई पता : गाँव-हरीचोटी चनारडी, डाक-थाची, वाया-धामी, जिला-शिमला-171103 (हि.प्र.)