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'रास्ते की तलाश में’ कई अर्थों से पारंपरिक यात्रा-वृत्तांतों से भिन्न पुस्तक है। इस पुस्तक में विवरण के शब्द-चित्र ही नहीं बल्कि वास्तविक चित्र भी देखे जा सकते हैं। चित्रों की भाषा के व्यापक आयाम होते हैं। यही कारण है कि 'रास्ते की तलाश में’ यात्रा-वृत्तांत की भाषा को चित्र एक व्यापकता और समग्रता प्रदान करते हैं। हिंदी में ऐसे यात्रा-वृत्तांत कम हैं जो शब्दों को चित्रात्मक ही नहीं बनाते बल्कि चित्रों के माध्यम से एक जीवंत भाषा को संप्रेषित करते हैं।



हिंदी में बहुत श्रेष्ठ यात्रा-वृत्तांत लिखे गए हैं। यह एक ऐसी शैली में है जिसके माध्यम से लेखक आँखों देखी घटनाओं, स्थानों और व्यक्तियों को अपने शब्दों के माध्यम से पुनर्जीवित करता है। यात्रा एक दृश्यात्मक अनुभव है। असगर वजाहत के यात्रा-वृत्तांत जैसे ईरान यात्रा पर केंद्रित 'चलते तो अच्छा था’ और पाकिस्तान यात्रा पर आधारित 'पाकिस्तान का मतलब क्या’ पाठकों को अपने साथ यात्रा पर ले जाते हैं। इस यात्रा में ऐसे अनुभव होते हैं जो प्राय: समाजशास्त्रियों, पत्रकारों और अन्य की पकड़ में नहीं आते क्योंकि लेखक की सृजनात्मक और व्यापक दृष्टि ही उनसे साक्षात्कार कर सकती है।
 
 
 
असगर वजाहत


जन्म, 1946, फतेहपुर (उ.प्र.)
हिंदी के वरिष्ठ लेखक हैं जिनके छ: उपन्यास, पाँच कहानी-संग्रह, छ: पूर्णकालिक नाटक, एक नुक्कड़-नाटक संग्रह, पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, और ईरान तथा पकिस्तान की यात्राओं पर केंद्रित दो पुस्तकें छप चुकी हैं।
उनके नाटकों को हबीब तनवीर, एम. के. रैना, दिनेश ठाकुर, राजेन्द्रनाथ, शीमा किरमानी जैसे निर्देशों ने मंच पर प्रस्तुत किया है। उमेश अग्निहोत्री ने उनके बहुचर्चित नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या...’ का मंचन वाशिंगटन डी.सी. के कैनेडी सेंटर में किया था। इस नाटक को सिडनी, कराची, दुबई और लाहौर के अतिरिक्त देश के प्रमुख शहरों में मंचित किया गया है। इसके अनुवाद और मंचन गुजराती, मराठी और कन्नड़ भाषाओं में किए गए हैं। 'जिस लाहौर...’ पर विख्यात निर्देशक राजकुमार संतोषी फीचर फिल्म बना रहे हैं।
असगर वजाहत ने कई फिल्मों की पटकथाएँ भी लिखी हैं।
भुवनेश्वर नाट्य संस्थान, हिंदी अकादमी, कथा यूके सहित कई सम्मानों से सम्मानित।
सम्प्रति, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में हिंदी के प्रोफेसर।
संपर्क : 79, कला विहार, मयूर विहार फेज वन
दिल्ली-110091