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खरामा-खरामा : पंकज बिष्‍ट

''हिमालय में जुड़े व्यक्ति को सहयाद्री के ये पहाड़ बहुत ही सौम्य और शिशुवत लगते हैं। हालांकि उम्र में बड़े हैं। छोटी-सी वघोरा नदी के दूसरी ओर अर्धचंद्राकार गुफाओं को पहली बार देख कर, दर्शक, सब कुछ सुना होने के बावजूद, अनुमान नहीं कर पाता कि वह सौंदर्य के किस लोक में प्रवेश करने जा रहा है। इस छोटी-सी नदी को (इस तरह की जलधाराओं को कुमाऊँनी में गधेरा यानी झरना या नाला कहा जाता है जो हमारे पहाड़ों में हर मोड़ पर मिल जाते हैं) इन गुफाओं ने दुनिया के न$क्शे पर अमर कर दिया है। कह नहीं सकता कि बरसात में यह नदी कैसी लगती होगी। पर दिसंबर में इसमें इतना भी पानी नहीं था कि एडिय़ाँ डूब पाएँ। एक क्षीण-सी जलधारा। पाँच किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है। इसका नाम है अजंता और अंग्रेज़ों ने इन्हें इसी नाम से पुकारना शुरू कर दिया। अजंता सुंदर नाम है पर मराठी में यह अजिंठा है, बल्कि कहना चाहिए अजिंठा लेणी।’’



(इसी पुस्तक से...)
 
 
पंकज बिष्ट
जन्म, 20 फरवरी, 1946 को मुंबई में।
शिक्षा : 1969 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.।
1969 में भारत सरकार की सूचना सेवा में प्रवेश। इस दौरान 'योजना’ अंग्रेज़ी में सहायक संपादक, आकाशवाणी के अंग्रेज़ी समाचार विभाग में संवाददाता और समाचार संपादक, $िफल्म प्रभाग में पटकथा लेखक का कार्य किया।
1993 से प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका 'आजकल’ के संपादक।
1998 में स्वैच्छिक अवकाश।
1999 से 'समयांतर’ का मासिक रूप में पुनप्र्रकाशन।
पहली कहानी 1967 में 'साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी। पहला कहानी-संग्रह 1980 में 'पंद्रह जमा पच्चीस’।
कृतियाँ : 'लेकिन दरवाजा’, 'उस चिडिय़ा का नाम’, 'पंखवाली नाव’ (उपन्यास), 'बच्चे गवाह नहीं हो सकते?’, 'टुंड्रा प्रदेश तथा अन्य कहानियाँ’, 'चर्चित कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह), 'गोलू और भोलू’ (बाल उपन्यास), 'हिंदी का पक्ष’, 'कुछ सवाल कुछ जवाब’, 'शब्दों के घर’ (लेख संग्रह)
कई भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी तथा कुछ अन्य योरोपीय भाषाओं में भी अनुवाद।
संपर्क : 98, कला विहार, मयूर विहार फेज वन
दिल्ली-110091