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विचारक लेखक थे अरुण प्रकाश



सारंग कुमार
नई दिल्ली, 23 जून (आईएएनएस)| जन-सरोकारों से जुड़े सातवें दशक के महत्वपूर्ण कथाकारों में से एक अरुण प्रकाश के हाल ही में हुए आकस्मिक निधन से साहित्य जगत शोकाकुल है। राजधानी दिल्ली में मौजूद विभिन्न साहित्कारों एवं समालोचकों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। साहित्य अकादमी के सभागार में आयोजित श्रद्धांजलि सभा में वरिष्ठ कथाकार असगर वजाहत ने कहा, "अरुण प्रकाश अनुभवों के धनी थे। उनकी रचनाओं में इसकी झलक मिलती है। कोई भी काम विस्तार में करने का उनका शौक देख मैं अचरज में पड़ जाता था।"

वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट ने कहा, "मेरी उनसे पहली मुलाकात कनॉट प्लेस के कॉफी हाउस में हुई थी। वह बहुत साहसी थे। उनके जीवन के अलावा उनकी पत्रकारिता और साहित्यकर्म में भी उनका साहस देखने को मिलता था। खतरा मोल लेना उनका शगल रहा।"

समालोचक विश्वाथ त्रिपाठी ने कहा, "अरुण प्रकाश जिजीविषा के प्रतीक थे। एक साहित्यकार और एक नागरिक का आचरण कैसा होना चाहिए, इसका वह बहुत ख्याल रखते थे। जिंदगी के मुश्किल दौर में भी उन्होंने अपना स्वाभिमान बनाए रखा। सचमुच, वह साहित्य के नागरिक थे।"

अरुण प्रकाश की कहानी 'भैया एक्सप्रेस' का जिक्र करते हुए साहित्यकार राजकुमार सैनी ने कहा, "प्रतिभा जन्मजात होती है, इस बात पर में  यकीन तब हुआ, जब उनसे मेरी मुलाकात हुई। उनकी कहानी 'बेला लौट रही हैं' हमें उनके अनुभव के नए संसार में ले जाती है। जनजातियों के जीवन को अरुण ने बहुत करीब से देखा था, यह इस कहानी से पता चलता है।..वह अगर सिगरेट छोड़ देते तो शायद आठ-दस साल और हमारे बीच होते।"

वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा, "वह अंदर से मजबूत थे और हर चीज का ब्योरा रखने में माहिर थे। यही वजह है कि उनकी रचनाओं में ब्योरों की कमी नहीं है।"

साहित्यकार आनंद प्रकाश ने कहा, "वह विचारक लेखक थे और बेहतर आलोचक भी। वह नई से नई चीज पढ़ते थे और हर विषय की अद्यतन जानकारी रखते थे।"

वरिष्ठ समालोचक मैनेजर पांडेय ने एक दशक पुरानी घटना को याद करते हुए कहा, "अरुण प्रकाश मुझे संकट से उबारने वाले मित्रों में से एक थे। जब मेरे बेटे की हत्या हुई थी और मैं पूरी तरह टूट चुका था, तब वह बार-बार मुझसे मिलने आते रहे और उनकी जिद के आगे मुझे झुकना पड़ा। 'इंडिया टुडे' के साहित्य वार्षिकी के लिए कवर स्टोरी मैंने उनकी जिद पूरी करने के लिए लिखी। उन्होंने मुझे दोबारा लेखक बनाया।"

पांडेय ने कहा कि अरुण प्रकाश जो काम करते थे सलीके से करते थे, मित्रता और दुश्मनी भी। उन्होंने कहा कि देश के सबसे सताए हुए लोग बिहार में रहते हैं, उन्हीं सताए हुए लोगों के कथाकार थे अरुण।

साहित्कार विष्णु नागर ने कहा, "वह कभी अपनी बीमारियों के बारे में बात नहीं करते थे। ऑक्सीजन लगे होने पर भी बीमारी पर नहीं, साहित्य और दुनिया पर बात करते रहे।"

कथाकार गौरीनाथ ने उन्हें भारतीय लोकमानस का कथाकार बताते हुए कहा, "उनके साहित्य में जो विषय और भूगोल के लिहाज से जितनी विविधताएं हैं, वे अन्य लेखकों में कम ही मिलते हैं।" उन्होंने जानकारी दी कि हाल के दिनों में अरुण प्रकाश ने आलोचना पर काम करना शुरू किया था। 'उपन्यास के रंग' सहित उनकी कुछ  आलोचनात्मक किताबें अभी प्रकाशन के चरण में हैं।

अरुण प्रकाश के पुत्र मनु प्रकाश ने अपने पिता की फणीश्वर नाथ रेणु से निकटता को याद किया और कहा कि रेणुजी की प्रेरणा से उनके पिता ने मजदूरों के लिए संघर्ष किया। उन दिनों उनके पिता पर गोलियां भी चलाई गई थीं।

कथा लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ, कथाकार प्रेमपाल शर्मा, साहित्य अकादेमी में  बांग्ला के अनुवादक अमर मुदि  और साहित्यकार रमेश उपाध्याय ने भी दिवंगत साहित्यकार के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर रोशनी डाली। साहित्य अकादेमी की तरफ से आयोजित इस सभा में अकादेमी के अधिकारी के. एस. राव मौजूद थे। संचालन युवा लेखक देवेंद्र कुमार देवेश ने किया।

शुक्रवार शाम हुई श्रद्धांजलि सभा में अरुण प्रकाश की पत्नी वीणा और पुत्री अमृता प्रकाश भी मौजूद थीं, जिनकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी।

उल्लेखनीय है कि अरुण प्रकाश का निधन 18 जून को दिल्ली के पटेल चेस्ट अस्पताल में हो गया। उनका जन्म बिहार के बेगूसराय जिले के  निपनियां गांव में 22 फरवरी 1948 को हुआ था। उनके चर्चित कहानी संग्रह हैं 'भैया एक्सप्रेस', 'जल प्रांतर', 'मझधार किनारे', 'लाखों के बोल सहे', 'विषम राग' और 'स्वप्न घर'। 'कोंपल कथा' उनका प्रसिद्ध उपन्यास है। कई पुरस्कारों से सम्मानित अरुण प्रकाश टीवी धारावाहिकों से जुडे  रहे। उन्होंने विदेशी फिल्मों के संवादों का अनुवाद भी किया तथा आठ महत्वपूर्ण  पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद कर चुके हैं।