पुस्‍तक मंगवाने के नियम व शर्तें

पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हम वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी। पुस्‍तकें मँगवाने के लिए संपर्क करें : सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन एक्‍सटेंशन-2, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-2648212 ई-मेल : antika56@gmail.com
हमारी किताबें अब आप घर बैठे ऑनलाइन मँगवा सकते हैं...www.amazon.in पर...

गद्य की पहचान : अरुण प्रकाश (Gadya ki pahchan by Arun Prakash)


गद्य की पहचान : अरुण प्रकाश
भूमिका

हम साहित्य को विधाओं के भीतर देखने के आदी हैं। कभी महाकाव्य और नाटक ही मुख्य रूप से साहित्य थे। इनमें कथा भी होती थी। अब इंटरनेट के सामाजिक साइट पर ब्लॉग व्यूवर जैसी नई विधाएँ आ धमकी हैं। लेखक की मृत्यु की घोषणा भले हुई हो, पर लेखन के नए-नए रूप बन रहे हैं। साहित्यिक विधाओं में मिश्रण भी एक चलन है, जैसे उपन्यास में लंबे पत्र, डायरी, लोककथाएँ, भाषण और लोकगीत। कई बार उपन्यास और इतिहास का फ्यूजन होता है। काव्य नाटक, गद्य  कविता और आख्यानपरक आलोचना हैं। रिपोर्ताज और समाज विज्ञानों का मिश्रण है। अब कुछ भी संभव है। हर विधा की परंपरागत सरहदें अशांत हैं। लेखक विधागत रेजिमेंटेशन से बाहर निकल रहे हैं। इतना निश्चित है कि विधाओं के चिर परिचित रूप बदल रहे हैं, अब कई विधाएँ टूट रही हैं।
समाज में नए मनोभावों वाले वर्गों के आने और नए ढंग के सुख-दुख बनने से यह स्वाभाविक है कि सृजनशील मनुष्य की अभिव्यक्ति-लालसा नई विधाओं के लिए मचलती है। भरत के नाट्यशास्त्र में नाटक के रूप में जिस पंचम वेद की चर्चा है, वह वस्तुत: शूद्र और स्त्री को देखकर प्रस्तावित हुआ था। इसमें कहा गया है, ''यह नाट्ïय दुखात्र्त, श्रमात्र्त, शोकात्र्त गरीब लोगों को विश्राम देने वाला होगा।‘’ जबकि महाकाव्य उच्च क्षमतावान समाज का परिपूर्ण जीवन-दर्शन और एथिक्स स्थिर करने के लिए लिखे गए थे। इसी तरह भारत में कुछ तो भारतीय परंपराओं के विकास और कुछ पश्चिम में तीन-चार सौ साल पहले नवोदित विधाओं के रूप पाकर 19वीं सदी में उपन्यास, कहानी, रिपोर्ताज, निबंध, आलोचना, साहित्येतिहास, जीवनी, आत्मकथा, संस्मरण, रेखाचित्र, डायरी और ऐसी ही कुछ और आधुनिक विधाओं का जन्म हुआ। ये सभी गद्य की विधाएँ हैं जिनका संबंध जीवन-अनुभव और तर्क की बढ़ी महत्ता से है।
दुनिया भर में नवजागरण और गद्य के बीच गहरा संबंध रहा है। क्योंकि स्वतंत्रता के बहुस्तरीय अनुभव और तर्क के लिए गद्य से बेहतर दूसरा माध्यम नहीं है। जिस समाज में रूढि़वादी धारणाएँ जितनी कठोर हों, वहीं गद्य की ज़रूरत उतनी अधिक होती है। समाज के तीव्र रूपांतरण और बदलाव का सामना करने के लिए अभिव्यक्ति के नए रूपबंधों, शैलियों और शब्द-संपदा की ज़रूरत स्वाभाविक है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि भारतेंदु कविता के तुलना में गद्य में ने केवल ज़्यादा अग्रसोची हैं, बल्कि उनमें नई-नई साहित्यिक विधाओं के सूत्रपात की बेचैनी दिखती है। यह बात कई कवियों के संदर्भ में सही है। इसलिए जब हम गद्य की पहचान या गद्य की नई विधाओं के अभ्युदय की चर्चा में जाते हैं, यह सि$र्फ साहित्य के अनगिनत दिशाओं में महान प्रस्फुटन को समझना ही नहीं है, मनुष्य की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के एक अद्ïभुत इतिहास को देखना भी है।
अरुण प्रकाश ने स्पष्ट किया है कि हिंदी में किस तरह 'विधाका इस्तेमाल 'फॉर्मऔर 'जेनरदोनों अर्थों के लिए होता है। उनके अनुसार उपन्यास एक रूपबंध है जिसकी कई विधाएँ हो सकती हैं। मुख्य बात है, विधाओं या रूपबंधों की सैद्धांतिक कहानी उद्घाटित करना, जो 'गद्य की पहचानमें बड़े विस्तार और रोचक ढंग से है। पश्चिम के साहित्यिक सिद्धांतकारों ने फॉर्म और जेनर पर बड़े-बड़े काम किए हैं। मेरे देखने में हिंदी में इधर इस ढंग का यह पहला काम है, जिसमें कुछ बुनियादी सवाल उठाए गए हैं। इस संग्रह के निबंधों में अरस्तू से लेकर बाख्तिन, रोलां बार्थ, तोदोरोव, देरिदा आदि तक के विचारों पर चर्चा है। यह जानने की चीज़ है कि आ$िखरकार कोई रूपबंध क्यों अस्तित्व में आता है, किसी युग में कुछ खास रूपबंध या विधाएँ प्रधान क्यों हो उठती हैं, जीवनी जैसा प्राचीन रूपबंध अब भी क्यों जीवित है, जबकि महाकाव्य जैसा शक्तिशाली रूपबंध मर गया, क्या इस रूपबंध की कुछ सीमाएँ और नियम हैं, मिश्रण या संकरता क्यों घटित होती है, क्या नए रूपबंध या विधाएँ पुरातन के ही कायांतर हैं, चिर-परिचित रूपबंध पाठकीय मनोविज्ञान पर कैसा प्रभाव डालते हैं, साहित्यकार किसी रूपबंध से कितना रेजिमेंटेड होता है और कितना उसे तोड़कर नई ज़मीन देता हैअरुण प्रकाश ने ऐसे ढेरों प्रश्नों की रोशनी में गद्य की पहचान की है।
ऐसा नहीं है कि जब पश्चिम के साहित्यिक रूपबंधों ने भारत में प्रवेश किया, भारत में गद्य नहीं था। आधुनिकता के साथ गद्य को भी पश्चिम की देन मानने का एक औपनिवेशिक दुराग्रह है, जिसका रामचंद्र शुक्ल और रामविलास शर्मा दोनों ने खंडन किया है। दरअसल, भारत में गद्य लेखन ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, टिप्पणियों, चरित लेखन, शिक्षण, संत प्रवचनों और नीतिपरक गद्यात्मक कथाओं-दास्तानों के रूप में प्राचीन काल से था। गद्य साहित्य की एक मौखिक परंपरा भी थी। इसलिए ज़रूरत यही थी कि इन पूर्व-औपनिवेशिक गद्य-रूपों की निरंतरता में पश्चिम की साहित्यिक विधाओं का स्वाभाविक भारतीय विकास हो। हमें उपनिवेशवाद से संपर्क के अलावा उससे टकराकर आ रहे राष्ट्रीय जागरण और आधुनिक विकास की रोशनी में विभिन्न रूपबंधों में गद्य के विकास की पहचान करनी होगी। इसी तरह यथार्थवाद के लिए भी पत्रकारिता और रेखाचित्र-लेखन ने ज़मीन बनाई। साहित्य में नई विषयवस्तु का समावेश हुआ, नई प्रवृत्तियाँ उभरीं। यद्यपि संस्कृत नाटक पहले से थे, पर पारसी थियेटर की एक महत्त्वपूर्ण भूमिका हैनाटक को सार्वजनिक क्षेत्र में न केवल लोकप्रिय बनाने में बल्कि नाट्ïयभाषा को लोकोन्मुख करने में भी। हम अच्छी तरह समझ सकते हैं कि साहित्य की नई विधाओं का उदय शहरों और मध्यवर्ग के उत्थान से जुड़ा हुआ है और इसका संबंध प्रेस द्वारा ज्ञान पर धार्मिक विशेषाधिकार प्राप्त पुरोहितों के एकाधिकार की समाप्ति से है।
गद्य के आधुनिक रूपबंध भारत के नए महानगरों में ही नहीं, परंपरागत बड़े शहरों में भी पनपे। हलचलें कलकत्ता और अहमदाबाद में ही नहीं, बनारस और केरल के पुराने शहरों में भी थीं। पत्रकारिता एक बड़ा समावेशी रूपबंध लेकर आती है। लक्षित किया जा सकता है कि गद्य की नई विधाओं में उपनिवेशवाद को चुनौती के बावजूद आधुनिकता के प्रति खुला रूख है, परंपरा और परिवार में नए स्पेस की खोज है। कुछ दुविधाओं के बावजूद स्वतंत्रता और आधुनिकता दोनों की भूख गद्य विधाओं में दिखती है। खुद साहित्येतिहास जातीय आत्म-पहचान के एक नए रूपबंध के रूप में सामने आता है, थोड़े-बहुत आख्यान और सूची बनाने के साथ आलोचनात्मक मूल्यांकन के तेवर में। आलोचना एक बड़ी विधा बनती है। हम निबंध भी ऐसे पाते हैं, जो निजी होने के साथ राष्ट्रीय मुद्दे उठाते हैंउनमें सिर्फ लालित्य नहीं होता। हम उपन्यास में दलितों और स्त्रियों की आवाज़ जिस रूप में देखते हैं या प्रेमचंद के उपन्यास भी कुछ इस सामाजिक चेतना से आते हैं कि राष्ट्र को 'काल्पनिक समुदाय  की दृष्टि से देखने की बेनडिक्ट एंडरसन की धारणा खंडित होती है। भारत में गद्य की पहचान के लिए पश्चिम की कसौटी काफी नहीं है।
अरुण प्रकाश गद्य के जिन आधुनिक रूपबंधों को उठाते हैं, उनकी भारतीय परंपराओं का उल्लेख करने में संकोच नहीं करते। इनकी नई महत्ता का विश्लेषण करते हुए वे हिंदी और पश्चिम की कृतियों की विधागत विशेषता की बड़े ही सृजनात्मक ढंग से पड़ताल करते हैं। वे उस राजनीति में भी घुसते हैं, जिसमें कोई विधा पीछे छूट जाती है और कोई विधा केंद्रीय स्थान बना लेती है। समय-समय पर हिंदी में यह विवाद चला भी है कि कब कविता केंद्रीय विधा है, कब कहानी और कब उपन्यास। अरुण प्रकाश सोच-समझकर ही यात्रा-आख्यान को एक खास संदर्भ में 'साम्राज्यवादी रूपबंधकहते हैं। हालाँकि कोई भी साहित्यिक विधा अपने आप में अमानवीय नहीं होती, उसका इस्तेमाल भिन्न उद्देश्य से हो सकता है।
अरुण प्रकाश मेरे बड़े पुराने आत्मीय हैं। मुझे प्रसन्नता है कि प्रमुख रूप से कथाकार होकर भी उन्होंने 'फार्मऔर 'जेनरजैसे गूढ़ विषय पर लिखने की योजना बनाई। मुझे थोड़ा विस्मय भी हुआ। इस क्षेत्र में और ऐसे कई जटिल क्षेत्रों में हिंदी में इतना कम काम हुआ है कि इस पुस्तक की महत्ता स्वत: बढ़ जाती है। उन्होंने खराब स्वास्थ्य में भी जो लिखा है, वह आगे भी बचे काम का रास्ता खोलनेवाला है। सतही कथन या स्पष्टवादिता के विकल्प के रूप में साहित्यिक विधाओं का एक महत्त्व है। इनमें इधर जो कायांतर आ रहा है, उसको समझने के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी।
डॉ. शंभूनाथ



पूर्वकथन



साहित्य के विभिन्न रूपबंधों पर समेकित रूप से विचार करने की परंपरा  सबसे पहले हडसन ने अपनी पुस्तक 'एन इंट्रोडक्शन टू द स्टडी ऑफ लिटरेचर’ (An Introduction to the Study of Literature) में शुरू की। उस पुस्तक का बहुत गहरा प्रभाव बाबू श्यामसुंदर दास बी.. की पुस्तक 'साहित्यालोचनमें देखा जा सकता है।
उसके बहुत साल बाद 1948 में गुलाब राय एम.ए. ने 'काव्य के रूपनाम की पुस्तक लिखी जिसमें साहित्य के विभिन्न रूपबंधों पर विचार किया गया। दस साल बाद 1958 के उसके चौथे संस्करण में इसी अध्ययन को विस्तार दिया गया। इसमें कविता, गीत, महाकाव्य, नाटक आदि पर कुल 155 पृष्ठों में विस्तार से विचार किया गया है। जबकि उपन्यास, कहानी, निबंध आदि के विवेचन पर 236 पृष्ठ लगाए गए हैं। बा$की के मात्र 12 पृष्ठों में जीवनी, आत्मकथा, पत्र, रेखाचित्र, रिपोर्ताज सब आ गए हैं। कह सकते हैं कि इन विधाओं को 12 पेजों में निपटा दिया गया। उसके बाद गद्य के इन रूपबंधों ने प्रगति तो पर्याप्त की और सारी दुनिया में इनपर विचार-विमर्श भी हुआ और हिंदी में वैश्विक स्तर की सामग्री उपलब्ध होने लगीं। फिर भी इन विधाओं के ऊपर समुचित विचार नहीं हो पाया।
हिंदी के गद्य लेखक अक्सर आलोचकों को कोसते रहे हैं कि उन्होंने कविता के अध्ययन समीक्षा-आलोचना पर अधिक बल दिया और गद्य विधाओं की उपेक्षा की। इसके पीछे सच्चाई भी है। पर उससे भी विकट सच्चाई यह है कि स्वयं आलोचना में गद्य की आलोचना की तैयारी का$फी कम दीखती है। तब ऐसे में क्या हो? या तो विलाप किया जाए या विकल्प की तैयारी की जाए। यह पुस्तक इसी दिशा में उठाया गया एक छोटा $कदम हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि इससे गद्य आलोचना के अध्ययन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा।
हिंदी में फार्म और जेनर दोनों के लिए विधा शब्द का ही प्रयोग किया जाता रहा है। इससे कई प्रकार की उलझनें सामने आती रही हैं। जेनर फार्म की छोटी ईकाई है। जैसे उपन्यास यदि फार्म हैं तो जासूसी उपन्यास जेनर। ऐसे में उपन्यास को रूपबंध और जासूसी उपन्यास को विधा कहा जाएगा। इस विभाजन से उलझन नहीं रहेंगी। यही कारण है कि पूरी पुस्तक में मैंने फार्म के लिए रूपबंध और जेनर के लिए विधा का प्रयोग किया है।
प्रारंभिक लेखन के दौरान मुझे यह महसूस होने लग गया था कि इस पुस्तक के पाठक समीक्षक-मित्र होंगे, रचनाकार होंगे और आम पाठक भी होंगे। लिहाजा, इसकी प्रस्तुति ऐसी रखनी पड़ेगी कि गंभीरता के साथ इसमें रंजकता का पुट भी रहे। ऐसा तब विशेष रूप से आवश्यक लगा जब अध्याय लंबे होने लगे।
अध्यायों का आकार बड़ा होता देख मैंने लेख के बजाए निबंध शिल्प का मार्ग चुना ताकि अध्याय रोचक बने रहें और सुधी पाठक आलोचना का भी आनंद ले सकें।
जो सूचना अथवा स्रोत सर्वसुलभ थे, उन पर सायास कम बल दिया गया है। अल्पज्ञात और दुर्लभ पर बल अधिक है। हिंदी के अतिरिक्त बांग्ला, गुजराती, मराठी और अंग्रेज़ी के प्रकाशनों का उपयोग तो किया है पर सहायक ग्रंथसूची, संदर्भ सूची आदि औपचारिकताओं से लगभग बचने के पीछे इस पुस्तक को रोचक बनाए रखने का ही उद्देश्य था। स्रोत की सूचना यथासंभव पाठ में ही शामिल कर दी गई है जिससे कि पाठ-प्रवाह प्रभावित न हो।
शुद्ध साहित्यिक आलोचनात्मक लेखों पर विचार नहीं किया गया है। यह जानबूझकर है। आख्यान कहाँ नहीं समाया हुआ है। रिपोर्ताज, आत्मकथा, संस्मरण, जीवनी, डायरी और यात्रा-आख्यान के अलावा आख्यान के अन्य रूपबंध हैं : रेखाचित्र, कहानी, उपन्यास और पत्र-लेखन। सब पर अध्याय लिखे जाने हैं। सारे अध्याय पूरे होने में समय कितना लगेगा, नहीं मालूम। अब कितना जीवन बचा है, नहीं मालूम। यदि प्रकृति ने साथ दिया तो शेष अध्याय भी भविष्य में पूरे कर दूँगा।
इस पुस्तक की तैयारी में साहित्य अकादेमी परिवार की श्रीमती विजयालक्ष्मी कुरैशी, पद्ïमनाभन, रजनीश राणा, मधुमालती जैन और लक्ष्मी भगत का बहुत सहयोग मिला है। मैं इन सब का कृतज्ञ हूँ।
प्रारंभ में कुछ लेख व्याख्यान थे। इसके लिए मैं डॉ. मैनेजर पाण्डेय, देवी शंकर अवस्थी पुरस्कार समिति, डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी, नीरज कुमार, वेद प्रकाश, अनिल राय, हिंदी अकादमी, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय और वहीं के शोध छात्र राजीव कुमार का आभारी हूँ।
इन लेखों को प्रकाशित करने में उदारतापूर्वक रुचि लेने के लिए रवीन्द्र कालिया (संपादक 'वागर्थ’), कमला प्रसाद (प्रधान संपादक 'वसुधा’) और मनीषा कुलश्रेष्ठ (संपादक : नेट पत्रिका 'हिंदी नेस्ट डॉट कॉम’) का आभारी हूँ।
मेरी गंभीर लंबी बीमारी को देखते हुए कुछ मित्रों ने लेखन में सहायता देने का प्रस्ताव रखा। मैं उन सबका आभारी हूँ कि उन लोगों ने इस पुस्तक में ऐसी रुचि ली।
उन पाठकों को भी धन्यवाद देना चाहूँगा जिन्होंने 'वागर्थऔर 'वसुधामें प्रकाशन के बाद फोन, एस.एम.एस. और पत्रों के ज़रिए मेरा हौसला बढ़ाया।
अरुण प्रकाश