पुस्‍तक मंगवाने के नियम व शर्तें

पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हम वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी। पुस्‍तकें मँगवाने के लिए संपर्क करें : सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन एक्‍सटेंशन-2, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-2648212 ई-मेल : antika56@gmail.com
हमारी किताबें अब आप घर बैठे ऑनलाइन मँगवा सकते हैं...www.amazon.in पर...

आलोचना


भारतीय दलित साहित्‍य और ओमप्रकाश वाल्‍मीकि : संपादक - गौरीनाथ
मूल्‍य - 535/-
जनतांत्रिक व्यवस्था तथा भारतीय संविधान को स्वीकार करने के बाद यह स्वाभाविक ही था कि इस वर्णवादी और जातिवादी समाज-व्यवस्था में जो अब तक उपेक्षित, शोषित, दलित, श्रमिक, पीडि़त तबके थे, वे शिक्षित होकर मुखर हो जाते। सन् 1960 के बाद इन तबकों की आवाज़ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में गूँजने लगी। डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर के 'पढ़ो, संगठित हो जाओ और संघर्ष करो' के मूलमंत्र के कारण ये तबके अपने अस्तित्व और अपनी अस्मिता के प्रति सजग हो गए। इस पूरी व्यवस्था में, यहाँ की परंपरा में 'हम कहाँ हैं' इसकी खोज वे करने लगे। इस देश के धर्म को, संस्कृति और परंपरा को वे खंगालने लगे। वे उन कारणों की खोज करने लगे, जिससे वे नकारे गए थे। अपनी इस खोज में उन्हें जो भी प्राप्त हुआ, उसे वे पूरे तीखेपन के साथ व्यक्त करने लगे। बाबा साहब के विचारों के आलोक में उन्होंने जो भी लिखा वह 'दलित-साहित्य' कहलाया। 
धर्म, संस्कृति और समाज द्वारा जो नकारे गए थे, उनमें जो संवेदनशील थे, उन्होंने प्रत्येक काल में अपनी व्यथा-वेदना को व्यक्त किया ही है। यह दूसरी बात है कि उनकी कभी नोटीस प्रस्थापित व्यवस्था ने नहीं ली। इसी दलित संवेदना को, इसी व्यथा-वेदना-विद्रोह और संघर्ष को सन् 1980 के बाद हिंदी में वाणी दी है स्मृतिशेष ओमप्रकाश वाल्मीकि ने। उनके साहित्य के विभिन्न आयामों को जानने की जिज्ञासा हिंदी पाठकों में थी और है। उनके समग्र साहित्य पर तथा उनके रचनाकार व्यक्तित्व पर विस्तार से बहस ज़रूरी थी और है। 'भारतीय दलित साहित्य और ओमप्रकाश वाल्मीकि' (संपादक गौरीनाथ) ग्रंथ द्वारा इस दिशा में उठाया गया यह एक सार्थक कदम है।
स्मृतिशेष ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्य के बहाने 'भारतीय दलित साहित्य' पर, उसकी समस्याओं पर विस्तार से विवेचन की ज़रूरत थी। इस ज़रूरत को काफी हद तक यह ग्रंथ पूरी करता है। इस ग्रंथ के पहले हिस्से में गुजराती, मराठी, कन्नड़, हिंदी, तेलुगू और पंजाबी दलित साहित्य की परंपरा को भी वरिष्ठ दलित लेखकों ने अलग-अलग लेखों के माध्यम से विवेचित किया गया है। इतने व्यापक धरातल पर ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्य की जाँच-पड़ताल का यह प्रयत्न सराहनीय है। स्मृतिशेष ओमप्रकाश वाल्मीकि के साहित्य को जान लेने के लिए तथा प्रमुख भारतीय भाषाओं के दलित साहित्य की परंपरा से परिचित होने के लिए यह ग्रंथ अनिवार्य साबित होनेवाला है।

—सूर्यनारायण रणसुभे


मूल्‍य : 300/- (HB)
उपन्‍यास के रंग : अरुण प्रकाश
(Upanyas ke Rang : Arun Prakash)

अरुण प्रकाश ने अपनी किताब  'गद्य की पहचानमें उपन्यास को एक रूपबंध कहा था जिसमें कई विधाओं की आवाजाही हो सकती है। प्रस्तुत किताब  'उपन्यास के रंग' में अरुण प्रकाश उपन्यास के संभावित आयतन को नए सिरे से अन्वेषित करते हैं। उपन्यास में आ सकने वाली विधाओं और सामग्री की यह एक गंभीर जाँच-पड़ताल है जो पाठकों के साथ ही लेखकों को भी उद्वेलित करती है।

     कथाकार अरुण प्रकाश फिल्म की भाषा में सोचनेवाले रचनाकार थे अत: वे फार्म, भाषा, शिल्प के साथ ही आख्यान के सभी रूपों को गहराई से समझते थे। यह गुण उनकी आलोचना में मुख्य धातु की तरह विद्यमान है।

     अरुण प्रकाश इस किताब से एक गंभीर आलोचक की अपनी जगह सुनिश्चित करते हैं। उनकी यह किताब उपन्यास में आ रहे विधागत बदलाओं को समझने की एक भरोसेदार कुंजी है।

       लीलाधर मंडलोई



मूल्‍य 350.00 HB
गद्य की पहचान : अरुण प्रकाश (Gadya Ki Pahchan : Arun Prakash)
अरुण प्रकाश गद्य के जिन आधुनिक रूपबंधों को उठाते हैं, उनकी भारतीय परंपराओं का उल्लेख करने में संकोच नहीं करते। इनकी नई महत्ता का विश्लेषण करते हुए वे हिंदी और पश्चिम की कृतियों की विधागत विशेषता की बड़े ही सृजनात्मक ढंग से पड़ताल करते हैं। वे उस राजनीति में भी घुसते हैं, जिसमें कोई विधा पीछे छूट जाती है और कोई विधा केंद्रीय स्थान बना लेती है। समय-समय पर हिंदी में यह विवाद चला भी है कि कब कविता केंद्रीय विधा है, कब कहानी और कब उपन्यास। अरुण प्रकाश सोच-समझकर ही यात्रा-आख्यान को एक $खास संदर्भ में 'साम्राज्यवादी रूपबंध' कहते हैं। हालाँकि कोई भी साहित्यिक विधा अपने आप में अमानवीय नहीं होती, उसका इस्तेमाल भिन्न उद्देश्य से हो सकता है।
अरुण प्रकाश मेरे बड़े पुराने आत्मीय हैं। मुझे प्रसन्नता है कि प्रमुख रूप से कथाकार होकर भी उन्होंने 'फार्म' और 'जेनर' जैसे गूढ़ विषय पर लिखने की योजना बनाई। मुझे थोड़ा विस्मय भी हुआ। इस क्षेत्र में और ऐसे कई जटिल क्षेत्रों में हिंदी में इतना कम काम हुआ है कि इस पुस्तक की महत्ता स्वत: बढ़ जाती है। उन्होंने खराब स्वास्थ्य में भी जो लिखा है, वह आगे भी बचे काम का रास्ता खोलनेवाला है। सतही कथन या स्पष्टवादिता के विकल्प के रूप में साहित्यिक विधाओं का एक महत्त्व है। इनमें इधर जो कायांतर आ रहा है, उसको समझने के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी (भूमिका से)
— डॉ. शंभूनाथ


मूल्‍य : 350.00 HB
कहानी के फलक : अरुण प्रकाश (Kahani Ke Falak : Arun Prakash)
अरुण प्रकाश के आलोचकीय-सैद्धांतिक ढाँचे में पाठक नाम का वह विस्मृत प्राणी पूरे महत्त्व के साथ प्रतिष्ठित है जिसे आज के कहानीकार और आलोचक किसी गिनती में नहीं रखते। वे संवाद की बात करें चाहे दृश्य की, ब्योरों की बात करें चाहे कथाभाषा की, हर जगह पाठक की चिंता उनके सूत्रीकरणों की तह में होती है। उनके कहानी-संबंधी चिंतन की, और इसीलिए इस पूरी पुस्तक की, केंद्रीय चिंता इन पंक्तियों में निहित है : ''कहानीकार प्रस्तुति के स्तर पर पाठक के थोड़ा भी अनुकूल होने में अपनी कला की बेइज़्ज़ती समझता है। लिहाज़ा, वह तानाशाह की तरह कहानियाँ लिख-लिखकर पाठकों के सामने फेंकता जाता है। पाठक पढ़ें, न पढ़ें, ग्रहण करें, न करें। अनुकूल संपादक, आलोचक हैं, इतना ही कहानीकार के लिए काफी है।''
गरज़ कि कहानी पाठक के लिए लिखी जाती है, यह अरुण प्रकाश की आलोचना का 'प्रेमाइस' है। इसी से उनकी सैद्धांतिक समझ के अधिकांश सूत्र निकलते हैं।... पर यह मान लेना गलत होगा कि उनकी आलोचना इसी पर खत्म भी हो जाती है। इन लेखों में ऐसा बहुत कुछ है जो इसके बाहर या इससे आगे भी जाता है। मसलन, जब वे कहते हैं कि कथा-भाषा के संबंध में सोच रचनाकार-केंद्रित न होकर रचना-केंद्रित होना चाहिए, यानी रचनाकार के व्यक्तित्व की नहीं, कहानी के व्यक्तित्व की बात होनी चाहिए, तो वह सिर्फ पाठक का मामला नहीं रह जाता। इसी तरह अनुभव की राजनीति की चर्चा करते हुए वे जिन जटिल सैद्धांतिक प्रपत्तियों से उलझते हैं, उन्हें सिर्फ पाठक की केंद्रीय अवस्थिति के मुहावरे से नहीं समझा जा सकता। ऐसे बहुत सारे सवालों और समस्याओं से उनकी आलोचना दो-चार होती है और एक निथरा हुआ समाधान लेकर हमारे सामने आती है। 
अब समय आ गया है कि आलोचक अरुण प्रकाश पर गंभीरता से बात हो और उनकी आलोचना से उभरने वाले सैद्धांतिक ढाँचे को व्यवस्थित तरीके से चिह्नित किया जाए।              संजीव कुमार (भूमिका से)


अरुण प्रकाश
जन्म : 22 फरवरी को 1948 में बेगूसराय (बिहार) में।
शिक्षा : स्नातक प्रबंध विज्ञान और पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा।
प्रकाशित कृतियाँ : 
कहानी संग्रह : भैया एक्सप्रेस, जलप्रांतर, मँझधार किनारे, लाखों के बोल सहे, विषम राग
उपन्यास : कोंपल कथा
कविता संकलन : रक्त के बारे में
आलोचना : गद्य की पहचान, उपन्यास के रंग, कहानी के फलक
अनुवाद : अंग्रेजी से हिंदी में विभिन्न विषयों की आठ पुस्तकों का अनुवाद।
अनुभव : अखबारों व पत्रिकाओं का संपादन। खासकर साहित्य अकादमी की पत्रिका 'समकालीन भारतीय साहित्य' का कई वर्षों तक संपादन। कई धारावाहिकों, वृत्त चित्रों तथा टेली-फिल्मों से संबद्ध रहे, कई स्तंभों का लेखन। प्राय: एक दशक से कथा-समीक्षा और आलोचना लेखन। अनेक राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठियों में सहभागिता।
सम्मान : साहित्यकार सम्मान, हिंदी अकादमी; दिल्ली, कृति पुरस्कार, हिंदी अकादमी; दिल्ली, रेणु पुरस्कार, बिहार शासन, दिनकर सम्मान, सुभाष चन्द्र बोस कथा-सम्मान, कृष्ण प्रताप स्मृति कथा पुरस्कार।
18 जून, 2012 को निधन।




किसान आंदोलन की साहित्यिक जमीन : रामाज्ञा शशिधर
(Kisan Aandolan ki sahityik jamin : Ramagya Shashidhar)

भूमिका : 'अदृश्यप्रतिरोध की पुनर्रचना
 एक
साम्राजी पूँजी और पश्चिमी आधुनिकता के 'जल प्रलयके कारण भारतीय समाज गहरे भँवर में फँस चुका है। भारतीय खेतिहर आबादी की अस्मिता और अस्तित्व, उसके प्रकृति और संस्कृति से निर्मित सतत संबंध, जल जंगल जमीनसब कुछ दाँव पर है। किसान के सामने 'मुक्तिके तीन रास्ते हैंविस्थापन, आत्महत्या और प्रतिरोध। घाटे की खेती, ई-खेती, बड़े निर्माण, वर्णसंकरता, सेज, उत्खनन, खुदरा व्यापार, पर्यटन-पिकनिक, शहरीकरण जैसी अनगिनत छीना झपटी के माध्यम से बड़ी खेतिहर आबादी को खेत से विस्थापित किया जा रहा है। लाखों किसानों ने खेती से तंग आकर आत्महत्या कर ली है और सिलसिला जारी है। लूट एवं दमन से परेशान आदिवासी-किसान और मुख्य समाज के किसान आरपार की लड़ाई फतह करने में जुटे हैं।
आज विकास और आधुनिकता जहाँ पूँजीवादी सभ्यता के दमनकारी 'बीज शब्दहैं वहीं आंदोलन एक विभ्रमकारी हर्फ। यह व्यापक 'सभ्यतागत सवालहै कि किसकी कीमत पर किसका विकास; किसकी आधुनिकता और कैसी आधुनिकता; किसका आंदोलन, कैसा आंदोलन। बदनसीबी से हमारी भाषा, स्मृति और कल्पना चार सौ सालों से रेहन पर 'औपनिवेशिक वर्चस्वके हवाले हैं। इसलिए बेतक्कलुफी से विनाश को विकास, पश्चिमीकरण को आधुनिकता तथा स्वयं सेवी संगठन को आंदोलन कहा जाता है। यह ईस्ट इंडिया कंपनी से मोंसेंटो-वालमार्ट तक की अनवरत औपनिवेशिक यात्रा की वैचारिक-सांस्कृतिक परिणति है। तब जरूरी हो गया है कि चेतना और मनुष्यता की मुक्ति के लिए आधुनिकता और आंदोलन जैसी धारणाओं के विउपनिवेशित-वैकल्पिक परिप्रेक्ष्य की खोज की जाए। यह किताब इस दिशा में केवल पारिभाषिक लफ्फाजी न होकर एक ठोस सांस्कृतिक-वैचारिक जमीन देने की शुरुआती पहल है। इतिहास और आलोचना का 'केंद्र’(मुख्य धारा) वह कसाईबाड़ा रहा है जहाँ 'अन्य’(किसान) अदृश्य है; प्रभुत्व और वर्चस्व की बलि का शिकार है; पिछड़ा हुआ प्रेत है; भाषाहीन जीभ है; संस्कृति-विचार की चेतना से मुक्त केवल आर्थिक अस्थि ढाँचा है। हालांकि उस 'परिधिके कारण ही 'केंद्रका अस्तित्व कायम है लेकिन 'परिधिसे वह केवल 'दमन-दमनका खेल खेलना चाहता है; उसके उत्पादन और सृजन का भोग करना चाहता है तथा 'विकास’, 'आधुनिकताऔर 'आंदोलनके चक्की-चल अभियान में सत्ता को सहयोग देकर बचा खुचा 'तंदूरी स्वादपाना चाहता है।

दो
यह किताब प्रतिरोध की पुनर्रचना का प्रयास है। प्रतिरोध मनुष्य की स्वाधीनता की आकांक्षा और संघर्ष का बुनियादी औजार है। स्वाधीनता कल्पनाशील एवं रचनात्मक सौंदर्य मूल्य है। इसलिए प्रतिरोध के भीतर यह मूल्य अंतर्निहित होता है। शोषण एक जटिल, बहुआयामी, गतिशील एवं सृजनविरोधी कार्रवाई है। प्रतिरोध में सृजनशीलता के गुण होने के कारण वह ज्यादा जटिल, बहुआयामी और गतिशील होता है। आंदोलन प्रतिरोध का सामाजिक और संगठनात्मक रूप है। इसलिए आंदोलन और उससे उपजे साहित्य में कल्पनाशील रूपान्तरण की संभावना सर्वाधिक होती है। उपनिवेश के दौरान संभव हुए किसान आंदोलन और किसान साहित्य इसके जीवंत प्रमाण हैं। वस्तुत: किसान आंदोलन और किसान कविता दोनों ऐसी 'सांस्कृतिक संरचना और रचनाहैं जहाँ मुख्यधारा के 'प्रभुत्व और वर्चस्वको चुनौती देनेवाले प्रतिरोध और मुक्ति के भरपूर यूटोपियन मसौदे मौजूद हैं।
इस किताब में किसान कविता के दो समय-खंड हैं। पहला वह पूर्वउपनिवेशी काल जिसे आजकल अकादमिक हलके में 'आरंभिक देशज आधुनिकताका दौर कहा जाता है। दूसरा काल-खंड 1857 से 1947 तक 'औपनिवेशिक आधुनिकताका है जिस दौरान हिंदी प्रदेश में स्वाधीनता आंदोलन के साथ तथा सामानांतर घमासान किसान आंदोलन हुए। इस अवधि में 'देशज आधुनिकताऔर 'मुक्ति की खोजमें बड़ी मात्रा में 'किसान कवितारची गई। खासकर 1917 के अवध, बिजोलिया एवं चंपारण से 1947 तक के लिए इतिहास की धूल से चुनकर अभूतपूर्व 'देशज साहित्यिक सांस्कृतिक सामग्रीएकत्रित की गई है।
आजकल बाहरी और भीतरी औपनिवेशिक आक्रमण की मार से हिंदी साहित्य की विचारधारा, ज्ञान-मीमांसा, चिंतन, सृजन के साथ ही इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीतिशास्त्र एवं संस्कृति-अध्ययन हाँफ रहे हैं। हिंदी की युवा आलोचना ऐसी मरीज हो गई है जो 'गहन चिकित्सा कक्षमें भर्ती है। तब हमें 'विउपनिवेशिकृत चेतना और कल्पनाकी पुनर्रचना के लिए 'किसान कवितावैचारिक-सांस्कृतिक संघर्ष की क्रांतिकारी राह दिखाती है।
किसान कविता कई कारणों से आज प्रासंगिक और बहसतलब 'औपनिवेशिक पाठहै। वह किसान आंदोलन का वैचारिक रूप है। वह उपनिवेशविरोधी मनोरचना, कल्पना और स्मृति के अध्ययन का परिधि पर फेंक दिया गया उपेक्षित स्रोत है। वह आंदोलन की मानसिक और सांस्कृतिक टकराहटों और द्वंद्वों को विचारधारात्मक आधार देती है। वह किसान समुदाय को 'पिछड़ी व्यवस्थाके आरोप से मुक्त करती है। वह राष्ट्रवाद को उपनिवेशवाद के खिलाफ हथियार बनाती है और उसके दमनकारी रूप की आलोचना भी करती है। वह माक्र्सवाद को किसान मुक्ति का औजार मानती है लेकिन उसकी 'यूरोकेंद्रित मशीनी एवं तानाशाह अवधारणाका 'क्रिटिकपेश करती है। वह राष्ट्रवाद और माक्र्सवाद के द्वंद्व को व्यापक परिप्रेक्ष्य में रखती है।
किसान कविता पश्चिमी पूँजीवाद और आधुनिकता को प्रकृति, संस्कृति और भाषा की विविधता का नंबर एक शत्रु मानती है। वह लाखों साल में निर्मित प्रकृति और उसकी कोख में मौजूद संसाधनों को नवसाम्राज द्वारा कुछ सालों में उपभोग कर लेने की लालसा और प्रवृति का तीखा विरोध करती है। वह संघर्ष के 'अदृश्य देशज नायककी खोज करती है तथा स्वतंत्रता संग्राम की 'वर्चस्वशील संरचनाको चुनौती देती है। किसान कविता अंग्रेजी की 'औपनिवेशिक भाषाई मानसिकताके विरुद्ध हिंदी कविता की 'खड़ी बोलीको जनपदीय बोलियों की कविता से समृद्ध करती है तथा लिखित और वाचिक के तनाव से कलात्मकता एवं लोकप्रियता के बुनियादी कला-नियम का हल प्रस्तुत करती है।
क्या अब हमें यह सवाल करने का अधिकार नहीं होना चाहिए कि जैसे प्रभुत्वशाली सत्ता के लिए किसान वर्ग 'अन्यहै ठीक वैसे ही वर्चस्वमूलक हिंदी आलोचना के लिए किसान कविता 'अन्यरही है। और, 'अन्यइतिहास की कब्र का वह प्रेत है, जब जिन्दा होता है तब पूरा हिसाब माँगता है। 

तीन
किसान साहित्य और किसान आंदोलन की अदृश्य, इतिहास की धूल में फेंकी हुई, जनता की जुबान से लिपटी हुई तथा ज्ञान के मुर्दाघरों में पड़ी हुई इस 'कच्ची सांस्कृतिक-वैचारिक सामग्रीतक पहुँचने की यात्रा पर बात नहीं करना बेईमानी होगा जिस कारण हिंदी ज्ञान-मीमांसा की भाषा आजतक नहीं हो पाई है। हिंदी बौद्धिकों की दो विशेषताएँ हैंमाल उड़ाओ पर सन्दर्भ मत बताओ तथा ज्ञान को निजी मिलकियत की तरह उपयोग करो। यह संस्कृति ब्राह्मïणवादी-सामंती संस्कार की केंचुल नहीं उतरने और पूँजीवादी विचार के कूड़ेदान से कूड़ा बीनने के कारण बनी है जो जनपक्षीय ज्ञान के 'शिखरपुरुषोंमें भी खूब दिखाई देती है। यह प्रवृति ज्ञान की आतंरिक औपनिवेशिक मानसिकता की भी उपज है। जो ज्ञान-उत्पादन खुद सामाजिक नहीं हो सकता वह समाज को स्वतंत्रता का रास्ता खाक दिखाएगा!
            किसान साहित्य से जुडी सामग्री के लिए मुझे तत्कालीन मौखिक स्रोतों, पुस्तिकाओं, पत्र-पत्रिकाओं, ट्रेक्टों, इश्तिहारों, पर्चों, साक्षात्कारों, किताबों और पांडुलिपियों पर निर्भर होना पड़ा। दस साल तक यह खोजबीन चलती रही। बिहार, उत्तर प्रदेश और राजस्थान की पगडंडियों से मुलाकातों ने इस यात्रा को और समृद्ध किया। तीनमूर्ति पुस्तकालय, जेएनयू पुस्तकालय, माडवाड़ी पुस्तकालय, साहित्य अकादेमी पुस्तकालय, केंद्रीय सचिवालय पुस्तकालय, राष्ट्रीय अभिलेखागार (दिल्ली), राष्ट्रभाषा परिषद, अजय भवन पुस्तकालय (पटना), नेशनल पुस्तकालय (कोलकाता), मोतीलाल तेजावत शोध संस्थान (उदयपुर), हिंदी साहित्य सम्मलेन, भारती पुस्तकालय (इलाहाबाद), नागरी प्रचारिणी पुस्तकालय (वाराणसी) आदि महत्त्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं।
इस सामाजिक ज्ञान उत्पादन के लिए गुरु मैनेजर पाण्डेय ने विषय सुझाया; नामवर सिंह और वीर भारत तलवार ने विषय को प्रश्नांकित कर इसे धार देने में मदद की; बद्रीनारायण ने इसकी रचनात्मक सम्भावना की ओर इशारा किया। किसान आंदोलन विशेषज्ञ राघवशरण शर्मा से किसान आंदोलन के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य को समझने में बहुत मदद मिली, उन्होंने मगही गीतों के अनेक टुकड़े उपलब्ध कराए। त्रिलोचन, कपिल कुमार, लालबहादुर वर्मा, त्रिवेणी शर्मा सुधाकर, हुकुमचंद मेहता सहित अनगिनत व्यक्तियों के साक्षात्कारों से इस अध्ययन को पुष्ट करने में सहायता मिली है। प्रो. रामबक्ष, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, अवधेश प्रधान, गीतेश शर्मा, जब्बार आलम, धीरज कुमार नाईट, निहाल अहमद और पल्लव के सहयोग के बिना यह अध्ययन पूरा ही नहीं होता। गौरीनाथ के कारण यह पाठकों के पास है वरना मैं तो अपनी आदत के अनुसार खोज-यात्रा में ही होता। मैं इन सबका दिल से शुक्रगुजार हूँ। उम्मीद है हिंदी की दुनिया इसे गंभीरता से लेगी।
रामाज्ञा शशिधर
23 सितंबर, 2012       
सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी-221005



रामाज्ञा शशिधर
 02 जनवरी, 1972 को बेगूसराय जि़ले (बिहार) के सिमरिया गाँव में निम्नवर्गीय खेतिहर परिवार में जन्म। चार बहन-भाइयों  में अग्रज। दिनकर उच्च विद्यालय सिमरिया के बाद लनामिवि, दरभंगा से एम.ए. तक की शिक्षा। एम.फिल. जामिया मिल्लिया इस्लामिया एवं पीएच-डी. जेएनयू से।
2005 से हिन्दी विभाग, बीएचयू में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत।
गाँव में दिनकर पुस्तकालय के शुरुआती सांस्कृतिक विस्तार में 12 साल का वैचारिक नेतृत्व, कला संस्था 'प्रतिबिंब’ की स्थापना एवं संचालन तथा इलाकाई किसान सहकारी समिति के भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष। जनपक्षीय लेखक संगठनों के मंचों पर दो दशकों से सक्रिय। इप्टा के लिए गीत लेखन।
लगभग आधा दर्जन पत्र-पत्रिकाओं का संपादन। दिल्ली से प्रकाशित समयांतर (मासिक) में प्रथम अंक से 2006 तक संपादन सहयोगी। ज़ी न्यूज, डीडी भारती, आकाशवाणी एवं सिटी चैनल के लिए छिटपुट कार्य।
प्रकाशित पुस्तकें : 'आँसू के अंगारे, 'विशाल ब्लेड पर सोई हुयी लड़की' (काव्य संकलन), 'संस्कृति का क्रान्तिकारी पहलू' (इतिहास), 'बाढ़ और कविता' (संपादन)। पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं के अलावा आलोचना, रिपोर्ताज और वैचारिक लेखन। 'किसान आंदोलन की साहित्यिक भूमिका' शीघ्र प्रकाश्य।
फिलहाल बनारस के बुनकरों के संकट पर अध्ययन।
ईमेल : rrshashidhar@gmail.com