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कविता

हर कोशिश है एक बगावत : राजेन्‍द्र कुमार
(Har Koshish Hai Ek Baghawat : Rajendra Kumar)

किसी कवि को सर्जना का तोष क्या सिर्फ इतने भर से मिल सकता है कि उसने अपने अनुभवों को, शब्दों की एक मनचाही व्यवस्था देने में सफलता पा ली है? व्यवस्थाएँ जो भी हैं, आज तो मानो सबकी एक ही जि़द हैसमाज को 'गति की ऐसी जड़ताके हवाले कर दिया जाए कि वह गति के साथ अपने समायोजन के सुख का ही अभ्यस्त बनता जाए। परिवर्तन की न कोई आकांक्षा उसमें जागे, न बेचैनी। 'कोशिशशब्द अगर अपना वास्तविक अर्थ पाने को कहीं सिर उठाता दिखे तो शब्दकोशों में, उसे घेरने वाले पर्यायवाचियों की दीवारें कुछ और ऊँची कर दी जाएँ। 'अभ्यस्तताया 'आदतजैसे शब्दों को खुली छूट हो कि वे कोशों से उठें और हमारे सामाजिक जीवन की घेराबंदी करने में अपनी अर्थवानता कुछ और उजागर करें। इस संग्रह की कविताएँ, ऐसे 'कुछ भीकी 'अभ्यस्तताया 'आदतके प्रतिपक्ष के रूप में 'कोशिशको परिभाषित करती हैं। 'कोशिशहाँ, कोशिश ही तो कर सकता हूँ.../हर सार्थक शुरुआत/ प्रकृति से ही बागी होती आई है...!इस 'कोशिशमें ही वह आईना द्रोह कर सकेगा, जिसमें आज का 'जनतांत्रिकजनता को उसके झूठे अक्स दिखाता रहता है। इस 'कोशिशमें, कविता का सवाल सिर्फ 'कला का सवालनहीं रह जाता, 'रोटी का सवालभी बन आता है और साथ ही कश्मीर, अयोध्या, नंदिग्राम, सिंगूर, दंतेवाड़ा आदि क्षेत्रों में चल रहे संघर्षों का सवाल भी।
                इस 'कोशिशमें ही हमें एक तरफ अपने प्राणोत्सर्गी इतिहास-पुरुषों की यह आवाज़ सुनाई पड़ती है—'हमारा लहू सिर्फ इतिहास के पन्नों पर/सूख चुका लहू नहीं है...और दूसरी तरफ बुश और ओसामा जैसों के प्रति इस चुनौती भरे प्रश्न की टंकार भी—'तुम कितने ताकतवर हो.../लेकिन कितने कमज़ोर!
                इसी कोशिश में, 'छन्ननऔर 'मनसब मियाँजैसे साधारण जन, जो कवि की स्मृति में हैं, सजीव हो उठते हैं और 'विनायक सेनजैसा जुझारू व्यक्तित्व भी अपनी वर्तमानता में हमारा अभिन्न हो उठता है।
                और इस 'कोशिशमें, सहभागिता की एक सुदीर्घ रचना-परंपरा को भी कवि भूलता नहीं, जो निराला-नागार्जुन-अज्ञेय-शमशेर-केदार से होती हुई, निरंतर गतिमान है।

राजेन्द्र कुमार


प्रमुख कृतियाँ : 'ऋण गुणा ऋण’ (कविता-संग्रह) उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा 1978 में पुरस्कृत। 'अनंतर तथा अन्य कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह), 'प्रतिबद्धता के बावजूद’ (आलोचनात्मक लेखों का संग्रह), 'इलाचंद्र जोशी’ (साहित्य अकादेमी के लिए मोनोग्राफ), 'शब्द-घड़ी में समय’ (निबंध-संग्रह)।

कुछ कहानियों का पंजाबी, बांग्ला, मराठी, तमिल और अंग्रेज़ी में अनुवाद।

संपादन : 'साही के बहाने समकालीन रचनाशीलता पर एक बहस’, 'आलोचना का विवेक’ (देवीशंकर अवस्थी पर एकाग्र), 'अपन बनाम आतंक’, 'स्वाधीनता की अवधारणा और निराला’, 'प्रेमचंद की कहानियाँ : परिदृश्य और परिप्रेक्ष्य’, 'मुक्तिबोध और 'अंधेरेमें

इलाहाबाद के 'अभिप्राय’ (साहित्यिक पत्रिका) का 1981 से संपादन। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा की पत्रिका 'बहुवचनका भी 2009-10 में संपादन।

सम्पर्क : 12बी/1, बंद रोड, एलनगंज
इलाहाबाद-211002 (उ.प्र.)

 

यहॉं ओज बोलता है : शैलेय 
(Yahan Oj Bolta Hai : Shailey) 
Rs. 200/-
शैलेय का यह तीसरा कविता-संग्रह हैअपनी चिरपरिचित सकर्मक रचनात्मकता के गहन आत्म संघर्ष, व्यापक सांस्कृतिक भावबोध व अभिव्यक्ति की अनूठी तथा सहज बेलौसी के साथ। यही काल है कि एक युयुत्स जिजीविषा की पर्याय उनकी कविताएँ समकालीन नए कवियों में उन्हें एक विशिष्ट ऊर्जस्वी पहचान देती है।

'याऔर 'तोसरीखे व्यापक चर्चित काव्य-संग्रहों के बाद अब 'यहाँ ओज बोलता हैमें भी शैलेय न केवल अनावश्यक काव्यस्फीति के विरुद्ध खड़े हैं बल्कि वे परंपरा में मिली स्वस्थ विरासत को नए सांस्कृतिक मूल्यों के साथ बढ़ाते हुए उसे सर्वथा एक नया संदर्भ देते हैं। वे इस जटिल संक्रमणकाल की गहन पड़ताल करते हैं और काली ताकतों के विरुद्ध प्रतिरोध की अक्षुण्ण परंपरा को बढ़ाते हुए पाठक समुदाय के समक्ष वैश्विक स्तर पर एक नया विधान-नई चुनौती-नए कार्यभार खड़े करते हैं।

महत्त्वपूर्ण है कि इसके लिए वे किसी नारेबाजी के बजाय हमारे रोज़मर्रा के जीवन में आस-पास छूटती मामूली चीज़ों, छोटे-छोटे सपनों और संघर्षों के विरल अनुभवों को पूरी शिद्दत तथा तार्किकता के साथ अभिव्यक्त करते हुए एक ऐसा आख्यान रचते हैं जहाँ कविता और भावक के साथ-साथ स्वयं कवि भी नए संस्कार ग्रहण करता चलता है। नए समय की चुनौतियों के संधान को तत्पर होता चलता है। तभी तो वे कहते हैं, 'जो छोड़ता ही जाता है अपनी धरती/ न चाहते हुए भी डूब जाता है समुद्र में।या फिर 'अनुपात सही हो तो / तीखापन / जिंदगी को जायका ही देता है।

मौजूदा विद्रूप समय से मुठभेड़ करती ये अन्यतम सघन कविताएँ निश्चय ही जहाँ मनुष्य की अदम्य जिजीविषा की द्योतक हैं वहीं ये स्वयं कविता के उज्ज्वल भविष्य और उसकी उपादेयता के प्रति गहरी आश्वस्ति भी।



शैलेय
जन्म स्थान : ग्राम जैंती (रानीखेत), जनपद अल्मोड़ा, उत्तराखण्ड।
शिक्षा : पी-एच.डी. (हिन्दी)
लम्बे समय से मजदूर आंदोलन और कुष्ठ रोगियों के मध्य कार्य।
संस्कृति कर्म में सक्रिय।
उत्तराखण्ड आंदोलन के दौरान जेल यात्रा।
किशोरावस्था से ही अनेक फुटकर नौकरियाँ एवं पत्रकारिता।
प्रकाशन : 'हलफनामा’ (उपन्यास), 'या’ (कविता-संग्रह), 'तो’ (कविता-संग्रह), 'यहीं कहीं से’ (कहानी-संग्रह)।
'नई कविता : एक मूल्यांकन’ (आलोचना पुस्तक)
पर्शियन कविताओं का हिंदी अनुवाद।
संपादन : 'द्वारतथा ' इन दिनों’ (साहित्यिक सांस्कृतिक पत्रिकाएँ)।
सम्मान : परंपरा सम्मान, शब्द साधक सम्मान, आचार्य निरंजननाथ सम्मान, परिवेश सम्मान, अम्बिका प्रसाद दिव्य सम्मान, वर्तमान साहित्य सिसौदिया सम्मान, शैलेश मटियानी कथा-स्मृति सम्मान।
सम्प्रति : एसोसिएट प्रोफेसर।
पता : डी2-1/14 मेट्रोपोलिस सिटी,
रूद्रपुर-263153 (उत्तराखण्ड)





ताकि वसंत में खिल सकें फूल : कपिलेश भोज
(Taki Vasan Mein Khil Saken Phool : Kapilesh Bhoj)
मूल्‍य : 230.00


कपिलेश भोज हिंदी में जन-कवियों की उस धारा के कवि हैं, जिसके सबसे बड़े प्रतिनिधि नागार्जुन हुए हैं। धारा एक है लेकिन इसके हर कवि का अपना-अपना व्यक्तित्व है। 2010 में कपिलेश भोज का पहला कविता-संग्रह आया था- 'यह जो वक्त है। उसमें पिछले दो दशकों के उस दौर की कविताएँ थीं, जब कवि खुद जन-संघर्षों  के बीच था। उसने अपने हिस्से की लड़ाई लड़ी। अब वह नयी युवा पीढ़ी को संघर्ष की राह पर चलने के लिए प्रेरित कर रहा है। नए संग्रह में कवि उस माली की भूमिका अदा कर रहा है जो ब$र्फ की मार खाए पौधों के आस-पास उग आये झाड़-झंखाड़ को साफ करता है ताकि वसंत के आने पर उनमें फूल खिल सकें।
कपिलेश अपनी जि़ंदगी के उस मुकाम  पर पहुँच रहे हैं जहाँ से इनसान मुड़ कर अपनी जि़ंदगी पर नज़र डालता है, गुज़रे हुए रास्तों को और अपने सहयात्रियों को याद करता है। इस संग्रह की कई कविताएँ अतीत की स्मृतियों से जुड़ी हुई हैंवे जगहें जहाँ बचपन और लड़कपन बीता, जहाँ लंबी नौकरी की, वे गुरुजन और मित्र जिनके साहचर्य में जीवन के आदर्श पाए, संघर्षों का संकल्प लिया। ये स्मृतियाँ माँ, बहन और खो गए बेटे से भी जुड़ी हुई हैं। व्यक्ति का जीवन विभिन्न संबंधों से जुड़ कर ही अपना स्वरूप और अर्थ ग्रहण करता है। इन सब के प्रति कवि कृतज्ञता का अनुभव करता है। लेकिन वह अपने वर्तमान यथार्थ से भी इतना ही जुड़ा हुआ है। अतीत की स्मृतियाँ उसकी दृष्टि को धुँधला नहीं करती। कवि आज भी अपने चारों ओर की सामाजिक सच्चाइयों, राजनीतिक प्रपंचों और सांस्कृतिक उथल-पुथल को पैनी निगाहों से परखता है। उसकी राजनीतिक चेतना व्यवस्था से अब भी किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं। इसलिए वह नयी पीढ़ी को लगातार प्रेरित और प्रबुद्ध करना चाहता है ताकि इस व्यवस्था के $िखला$फ लड़ाई जारी रह सके।
उत्तराखंड का पहाड़ी जीवन, उसकी संस्कृति, भाषा, शब्द , अमल-धवल शिखर, नदियाँ और  पेड़-पौधे- जैसे कपिलेश भोज के पहले कविता-संग्रह में थे, वैसे ही नये संग्रह में भी सजीव हो आए हैं।

वीर भारत तलवार



कपिलेश भोज
जन्म : 15 फरवरी, 1957 को उत्तराखण्ड के अल्मोड़ा जनपद के लखनाड़ी गाँव में।
शिक्षा : कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल से हिंदी साहित्य में एम.ए., पी-एच. डी.।
प्रकाशित कृतियाँ : 'यह जो व$क्त है’ (कविता-संग्रह), 'लोक का चितेरा : ब्रजेन्द्र लाल शाह’ (जीवनी)।
कुछ समय तक 'वर्तमान साहित्य’  और 'कारवाँका संपादन किया।
हिंदी के अलावा मातृभाषा कुमाउँनी में भी कहानियाँ, कविताएँ एवं आलोचनात्मक लेखन।
संप्रति, अध्यापन से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के पश्चात स्वतंत्र लेखन।
संपर्क : सोमेश्वर, अल्मोड़ा-263637 (उत्तराखण्ड)



अक्षरों के पार जाकर : सुधांशु उपाध्‍याय
(Aksharon Ke Par Jakar : Sudhanshu Upadhyay)

मूल्‍य : 210.00



'अक्षरों के पार जाकरसुधांशु उपाध्याय का चौथा नवगीत (कविता) संग्रह है। इसके पहले इनका तीसरा संग्रह 2012 में 'आने वाले कल परभारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुआ है। अपने पिछले तीनों संग्रहों की तरह यहाँ भी सुधांशु ने अपनी सोच, शिल्प, कहन-कथन और संवेदनाओं के साथ विचारों को नई ज़मीन दी है। जो कभी गीत या नवगीत में प्राय: संभव नहीं रहा था, यह संग्रह उन सारी असंभावनाओं को संभव बनाता है। सुधांशु अपनी कविताओं में ज़मीन तोडऩे वाले और नई ज़मीन तलाशने  और तैयार करने वाले कवि हैं। उनके सार्थक और कभी-कभी अचंभे में डालने वाले प्रयोग उन्हें आम कवियों-नवगीतकारों से बिल्कुल अलग खड़ा करते हैं। वह नवगीत-कविता को समय से जोड़कर चलते हैं। मामूली बातों में कविता का उत्स और उद्देश्य पा लेने वाले वे अपने तरह के विरल कवि हैं। उनकी दृष्टि अविचल और स्पष्ट है। थोड़ी अतिशयोक्ति लग सकती है किन्तु सुधांशु ने गीत को नॉस्टेल्जिया से निकाल कर युग-समय के सत्य के साथ जोड़ा है और गीत/नवगीत में विचार नहीं समा सकते, इस मिथक या प्रपंच को भी तोड़ा है। उनका अंदाजे बयाँ यानी उनका अपना खास शिल्प उन्हें नवगीत-कवियों से ही नहीं, गद्य कवियों से भी अलग करता है। भविष्य में कविता का स्वरूप क्या होगा, कहना मुश्किल है किंतु सुधांशु उपाध्याय की नवगीत-कविताएँ शायद भविष्य की पूरी हिंदी कविता की ओर संकेत करती हैं। जीवन की लय बदल रही है। कविता की लय ठहरी कैसे रह सकती है? तमाम अवरोधों और संहिताओं को तोड़ कर रचना को नई गति और नव्यार्थ देना ही सुधांशु की कविता है। उनके नवगीत हमारे साथ चलते हैं, समय के साथ चलते हैं और कहीं समय से आगे भी संकेतों में गहरे अर्थ, संवेदना और विचार लिए हुए यह ताज़ा संग्रह इसका नया उदाहरण है।



सुधांशु उपाध्याय
नवगीत-कविता में नए प्रयोग, अनूठे शिल्प एवं नए मानक तैयार करने एवं वैचारिक संपन्नता देने वाले विशिष्ट कवि।
प्रकाशन : नवगीत संग्रह : समय की ज़रूरत है यह, पुल कभी $खाली नहीं मिलते, आने वाले कल पर।
शब्द हैं साखी (आलेख संग्रह), आधुनिक पत्रकारिता और ग्रामीण संदर्भ (पत्रकारिता)।
हिन्दी की प्राय: सभी पत्रिकाओं एवं वेब मैगजीन्स में रचनाएँ प्रकाशित।
आजीविका : पत्रकारिता
संपर्क : ए-1, पत्रकार कॉलोनी, इलाहाबाद-211001 (उ.प्र.)  





शायद : मणिमोहन
(Shayad : Manimohan)



मणिमोहन अपने इस संग्रह में एक ऐसी कविता को अर्जित करने की जद्दोज़हद करते नज़र आते हैं जो उतनी ही सहजता से हमें समझ आ जाए जैसे माँ के चेहरे पर लिखी चिंता, पिता की आँख का गुस्सा, बहन की आवाज़ में दुख, बच्चे की किलकारी की खुशी और दोस्त की उदासी चेहरा देखकर ही समझ में आ जाती है। जैसे सुख और दुख समझ आ जाते हैं कविता भी उसी तरह समझ आनी चाहिये। मणिमोहन की कोशिश ऐसी ही कविता को पाने की है। वह लगातार अपनी भाषा में उस सादगी और सहजता को पाने की कोशिश करता है। वह उस कविता को पाना चाहता है जो हमारे सपनों में हमारी आकांक्षाओं में कहीं छुपी रहती है। यह सपने निरे सपने नहीं हैं यह सपने हमारे जीवन दृश्यों से बने हैं, जीवन की उथल पुथल और संघर्षों से बने हैं। इन जीवन दृश्यों में हमारी विराट प्रकृति भी, घर परिवार, अड़ोस पड़ोस भी और गाँव, गली, सड़क और मोहल्ले भी मतलब यह कि सृष्टि का कुछ भी इन दृश्यों से बाहर नहीं है। इस दृश्य में दृश्य और द्रष्टा के बीच की दूरी समाप्त हो गयी है। यहाँ द्रष्टा दृश्य के भीतर चहल$कदमी करता है और दृश्य स्वयं द्रष्टा के भीतर। कवि के सपने का घोंसला इसी तरह के दृश्यों से बना है और उसमें एक चिडिय़ा रहती है और उस चिडिय़ा का नाम कविता है।
मणिमोहन की कविता में यथार्थ, सपने और फैंटेसी एक दूसरे में गड्डमड्ड हो जाते हैं। वह अपने गाँव के डूब में आजाने और वहाँ से लगातार होते निर्वासन, अपने कस्बे से शहरों की ओर हो रहे विस्थापन, कस्बों में बढ़ रही उदासी और उदासीनता की कविता है। यह कविता में चीजों से लेकर संवेदनाओं तक में आरहे भोथरेपन के भयावह अहसास से उपजी एक चीख है। यह बाज़ार की आक्रामकता और दिनोदिन बढ़ रही बर्बरता के विरूद्ध प्रतिरोध की कविता है।
यह हमारे समय और भाषा के बीहड़ में एक घर और एक कविता को तलाशने की कोशिश करती कविता है।
--राजेश जोशी


मणि मोहन
जन्म : 02 मई 1967, सिरोंज जिला विदिशा (म. प्र.)
शिक्षा : अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर और शोध उपाधि।
प्रकाशन : महत्त्वपूर्ण साहित्यिक पत्र- पत्रिकाओं में कविताएँ तथा अनुवाद प्रकाशित। वर्ष 2003 में मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के सहयोग से कविता-संग्रह 'कस्बे का कवि एवं अन्य कविताएँप्रकाशित।
वर्ष 2012 में रोमेनियन कवि मारिन सॉरेसक्यू की कविताओं की अनुवाद पुस्तक 'एक सीढ़ी आकाश के लिएउद्ïभावना से प्रकाशित।
संप्रति : सुभद्रा शर्मा शासकीय कन्या महाविद्यालय, गंज बासौदा में अध्यापन।
संपर्क : विजय नगर, सेक्टर बी, बरेठ रोड, गंज बासौदा-464221 (म. प्र.)



वक्‍त की हथेली में : हातिम जावेद
(Waqt Ki Hatheli Mein : Hatim Zaved)



'वक्त की हथेली मेंसुपरिचित गज़लकार हातिम जावेद का पहला गज़ल-संग्रह है। उर्दू मिज़ाज की इनकी गज़लों में क्लैसिक परंपरा और आधुनिक समय के दबावों का अच्छा संतुलन है। इनकी गज़लों में आज के समय-समाज में मनुष्य की स्थिति, बेचैनी, दुख-दर्द, हँसी-खुशी, जय-पराजय आदि से बाबस्ता चिंताओं-क्षणों को खूबसूरती से शब्दों में ढालने का ईमानदार शायराना प्रयास नज़र आता है
दर्द की टोकरी सर पे रक्खे हुए।
मेरी दहलीज़ पर मुफलिसी आ गई॥

जब भी ख्वाहिश खिलौनों की बच्चों ने की।
रक्स करती हुई बेबसी आ गई॥
**
सबको अपनी-अपनी फिक्र।
किसकी गठरी देखे कौन??
**
पहले जिंदा दफना दी जाती थी लड़की।
अब पैदाइश से पहले मारी जाती है॥
इस संग्रह में गज़ल के अलावा इनके कुछ महत्त्वपूर्ण कित्आत भी हैं जो निश्चय ही देर तक जहन में टिकी रहने वाली है।




डॉ. मो. हातिम जावेद

साहित्यिक नाम : हातिम जावेद

पिता : शहादत हुसैन 'जिगर मेहसवी

माता : बीबी बकरीदन
पत्नी : महजबीन अंसारी (शिक्षिका)
साहित्यिक गुरु : 'जिगर मेहसवी
जन्म तिथि : 9 जनवरी, 1963
शैक्षणिक योग्यता : बी.एच.एम.एस.
सम्मान : सिद्दीक बेदिल सम्मान (2007), भारतेन्दु हरिश्चन्द्र सम्मान (2008), चन्द्रगुप्त मौर्य सम्मान (2012)
सम्प्रति, मेडिकल ऑफिसर, स्वास्थ्य विभाग, बिहार सरकार।
स्थायी पता : ग्राम : विशम्भपुर, पो. मेहसी, जि़ला-पूर्वी चम्पारण, बिहार
 



और थोड़ी दूर
Aur Thodi Door by Sachchidand Vishakhसच्चिदानंद की कविताएँ परंपरा और इतिहास के बड़े फलक पर अपना होना सिरजती हैं। इसलिए इन्हें धैर्य और संयम से पढऩे की दरकार है। इसमें काल से उत्पन्न और राजनीति से पैदा की गई 'सफरिंग्स के गहरे निशान हैं। विशाख कविता में इन्हें लाने के उपक्रम में अनेक ब्यौरों में जाते हैं और यह जाना गतिमयता में है। कविता में दृश्य, प्रसंग और ब्यौरे आवाजाही करते हैं लोक से लेकर आधुनिक जीवन तक। परिणामस्वरूप सामाजिक विद्रूपताओं के अनेक चेहरों, उनके प्रभावों को इंदराज़ करने के प्रयत्न में विशाख की कविताएँ तहदार हैं। उनके अर्थ एक से अधिक पाठ में खुलते हैं। कहना होगा कि उनकी कई कविताओं में गूढ व्यंजनाएँ हैं। वे भाव और सत्य दोनों का विश्लेषण कविताओं में करते दिखते हैं। इसलिए उनमें काव्य-बल आवेग भी है। कदाचित् करुणा और आवेश के कारण कवि अमंगल घटता देखकर हलकान है। कहा जा सकता है कि विशाख की काव्य ज़मीन उनके समकालीनों से कहन और फार्म के स्तर पर अधिक कड़ी है। इसलिए कविताओं में कोई बनावट नहीं दिखती और वे अपनी निजता को बनाए रखती है जो कवि के लिए आसान नहीं। विशाख अपने संग्रह ‘और थोड़ी दूर में एक लंबी यात्रा पर हैं। घर-परिवार, गाँव-जवार, शहर से लेकर समूची पृथ्वी के दायरे में कवि दृष्टि में जो पैठ बनाता है, उसके संकेत और उदाहरण यहाँ उपस्थित हैं। इसमें प्रेम, विषाद, तिक्तता, क्रोध और घृणा के भाव हैं, जो लोक से लेकर उत्तर आधुनिकता की विडंबनाओं और साजिशों से उपजे हैं। प्रकृति है, लोगबाग हैं, चेहरे हैं और इनमें प्रवेश कर रही सत्ताएँ, जो निजता और विशिष्टता की हत्या में रत हैं। कवि इन परिवर्तनों को पढ़ता हुआ सच की गवाही देता है। दरअसल ये कविताएँ धरती और इसके रहवासियों की पक्षधरता में अपना होना प्रमाणित करती हैं।
लीलाधर मंडलोई

सच्चिदानन्द विशाख
शिक्षा : एम.. (हिंदी, संस्कृत)
जन्म : 04 जनवरी, 1965
कविताएँ प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।
दो कविता-पुस्तिकाएँ ‘संघर्ष की जमीन तथा 'शब्द फैल गए हैं’ प्रकाशित।
अनियतकालीन पत्रिका 'सतह’ का प्रकाशन।
स्थायी पता : ग्राम-गुजरु, पो. कच्छवाँ, जिला-रोहतास
संप्रति, अध्यापन।
वर्तमान पता : मध्य विद्यालय कल्याणपुर,
पो. कल्याणपुर, वाया-पुनपुन, जिला-पटना (बिहार)
मोबाइल : 9470645417







रेत का पुल
Ret Ka Pul by Mohan Rana
मोहन राणा की कविता हमेशा से दूर-पास की आहटों को एक-साथ सुनती-गुनती रही है। साथ ही पास दूर के दृश्यों के मर्म को अपनी ही तरह के बिंबों में रचती रही है। और उनकी कविता में स्मृतियों की भी एक अहम भूमिका है। नतीजतन ये सारी चीज़ें परस्पर गुंथ कर हमें कई ऐसे अनुभवों से जोड़ती हैं, जो प्राय: अलभ्य  से होते हैं। वे दृष्टि का कुछ विस्तार करते हैं, और उनके सूक्ष्म-जोड़ हमें कई अदेखे संवेदन-सूत्र थमाते हैं। इन अनुभवों से गुजरना प्रीतिकर होता है, और कई बार उनमें विन्यस्त, चुभन और प्रश्न, हमें वस्तु-स्थिति के एक नये आकलन के लिए उकसाते हैं। कुल मिलाकर यह कि उनकी कविताओं का पाठ हमें दैनंदिन जीवन-प्रसंगों के आत्मीय रूप से एक नये प्रकार से परिचित कराता है, साथ ही अपनी विद्युत गति उड़ानों से सुदूर ले जाकर हमारे 'दैनंदिन सामाजिक परिवारिक जीवन को कुछ नये आयामों की यात्रा कराता है। एक सधी हुई भाषा में, उनकी कविता अपनी प्रकृति रमणीयता में भी हमें आकर्षित करती है। इस संग्रह में भी उनके ये गुण भरपूर उपस्थित हैं। पर उल्लेखनीय है कि इसमें उन्होंने अपने लिये एक नयी काव्य भाषा ईजाद की है। ये कविताएँ एक नई लय लिये हुए हैं। इनमें उर्दू कविता की भी काव्यक विधियों का एक समावेश है और ये सहज ही हमें शमशेर जैसे कवि के काव्य परिसर की भी कुछ याद दिलाती हैं।
इनकी चिंता भी अधिक व्यापक हैं। एक बदली हुई 'ग्लोबल दुनिया में ये जीवन-मूल्यों' की तलाश में केवल बेचैन सी हैं, इनमें एक नई 'स्वप्नशीलता भी है। अंतर्मन के तहखानों में ये एक नए अंदाज में प्रवेश करती हैं, साथ ही बाहरी संसार की गतिविधियों को एक अधिक बेधक दृष्टि से देखती हैं, जहाँ 'भाषा के छिलकों की एक बाढ़ सी है पार पाना भाषा को है। उसके खरे रूप में। इस संग्रह से मोहन राणा की कविता-भूमि संपन्नतर हुई है और स्वयं हिंदी कविता को भी इससे एक ऐसा अंदाजे बयाँ मिला है, जिसकी ओर बहुतों का ध्यान जाएगा। 
प्रयाग शुक्ल


मोहन राणा
मोहन राणा का जन्म 1964 में दिल्ली में हुआ। पिछले डेढ़ दशक से ब्रिटेन के बाथ शहर के निवासी हैं। छह कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं।
'जगह (1994), 'जैसे जनम कोई दरवाज़ा (1997), 'सुबह की डाक (2002), 'इस छोर पर (2003), 'पत्थर हो जाएगी नदी (2007), 'धूप के अंधेरे में (2008)
दो संग्रह अंग्रेज़ी में अनुवादों के साथ प्रकाशित हुए हैं।
'With Eyes Closed (द्विभाषी संग्रह, अनुवादकलूसी रोज़ेंश्ताइन) 2008,
'Poems (द्विभाषी संग्रह, अनुवादक-बनार्ड डोनह्यू और लूसी रोज़ेंश्ताइन) 2011
अंग्रेजी के अलावा कविताओं के अनुवाद मराठी, तमिल, बुल्गारी, इतालवी, स्पहानी, पुर्तगाली और जर्मन में भी हुए हैं।

बहुत बरस पहले पुरानी दिल्ली की बात है, जो चीज़ ज़मीन पर कचरा थी जब मैंने उस कागज़ को उठाया और पढ़ा, वह कविता थी। कविता अपने जन्म का समय खुद तय करती है और स्थान भी।
संपर्क -  letters2mohan@gmail.com




पके हुए फल का स्‍वाद
Pake Hue Phal ka swad by Kamleshwar Sahu
बाज़ारवाद हमारे जीवन में है, उत्तर आधुनिकता चिंतन में और औपचारिक संवेदना आदत में। इन सबने मिलकर हमारी तर्क-शक्ति को इतना गुमराह किया है कि हैसियत और खासियत शब्द अब कोई अर्थ नहीं रखते। अब हम बड़ी आसानी से छोटे को बड़ा (महान) और बुरे को अच्छा (श्रेष्ठ) साबित कर सकते हैं।
हमारे साहित्यिक परिदृश्य में भी ऐसा ही कुछ है। वह भी ऐसे परिदृश्य में जहाँ साहित्य के पाठकों की संख्या बमुश्किल 3000 होगी और साहित्यकार हैं कि साहित्य के बूते नहीं, उठा-पटक के बूते 'नम्बर वन कहलाने में तुले हैं। किसी 'फलाँ आलोचक ने कह दिया आप बड़े हैं या किसी 'बड़े-वड़े कवि ने बता दिया आप समकालीन कविता में प्रमुख हैंआप खुश हैं।
कमलेश्वर साहू चुपचाप कविता लिख रहे हैं। वे अच्छा लिख ही नहीं रहे, कविता-संग्रह भी प्रकाशित हो रहे हैं। अब तक तीन संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। 'पके हुए फल का स्वाद शीर्षक का यह संग्रह चौथा संग्रह है, यानी उसके पास हैसियत भी है और खासियत भी, पर किसी कवि-आलोचक ने नोटिस नहीं लिया। क्या कहा? कवि को नहीं जानते, भई पिछले 15-20 वर्षों से हर पत्रिका में छपा है। क्या पत्रिकाएँ नहीं पढ़ते आप लोग? अच्छा बताइये, एकांत श्रीवास्तव को जानते हैं? अनामिका, पंकज राग को जानते हैं? नीलेश को? कैसे? किस कविता से? किस कविता-संग्रह से? 'हंडा कविता ('पतंग को भी) पर आप ही में से किसी ने भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया। ब्यौरों और स्त्री संवेदना के जिस आधार पर वह कविता है, कमलेश्वर साहू इस कला में सिद्धहस्त हैं। यकीन नहीं तो उसका पिछला संग्रह 'पानी का पता पूछ रही थी मछली उठाकर पढिय़े। कोड़ा, पीकदान, तोप कविताओं में वस्तु संबंधित जो ब्योरे हैं उनसे किसी भी अन्य कवि के ब्योरों की कविता से मिलान करें तो मेरा दावा है, कमलेश्वर साहू श्रेष्ठ ठहरेंगे। हाल ही में प्रकाशित संग्रह 'किताब से निकलकर प्रेम कहानी की कविताओं में स्त्री संवेदना का जो पक्ष रखा गया है वैसा भी हिन्दी कविता में दुर्लभ है।
इस संग्रह में शामिल लंबी कविताएँ कलेवर के स्तर पर लंबी नहीं बल्कि कंटेंट के स्तर पर भी बड़ी हैं। इस संग्रह की कविताओं की संवेदना मार्मिक है कि औपचारिक। ये मार्मिक संवेदना और औपचारिक संवेदना क्या बला है भाई! चलिये समझाता हूँ, सामाजिक संघर्ष से परे कविता रचना औपचारिक संवेदना कहलाती है।
कभी कवि राजेश जोशी 'एक नाराज कवि के नोट्स लिख रहे थे। कभी साहित्य में यथार्थवाद, संप्रेषण, विचारधारा, पक्षधरता जैसे जुमले थे। आज केन्द्र में नंबर-वन, पुरस्कार, पुस्तकें हैं। आज कवि-आलोचक की दृष्टि में नरेन्द्र जैन कवि नहीं, राजेन्द्र शर्मा, ओम भारती, पूर्णचंद्र रथ, कुछ हद तक मंडलोई जी भी। पर ये सब कवि हैं। प्रचारित (प्रायोजित) कवियों से कहीं बड़े कवि। इन अर्थों में कमलेश्वर साहू भी एक कवि हैं, बड़े कवि!
नासिर अहमद सिकंदर

परिचय

कमलेश्वर साहू
जन्म : 26 नवंबर, 1965
प्रकाशन : देश की लगभग सभी महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित।
कविताओं का भारतीय भाषाओं में अनुवाद।
संग्रह : यदि लिखने को कहा जाय (कविता-संग्रह) 2003
          पानी का पता पूछ रही थी मछली (कविता-संग्रह) 2009
          किताब से निकलकर प्रेम कहानी (कविता-संग्रह) 2011
 संपर्क : 702, साकेत कालोनी, वार्ड- 57, कातुलबोड़, पो.एस..एफ.लाइन,
  जिला- दुर्ग (छत्तीसगढ़) 490022












बच रहेगा जो
Bach rahega jo by Matacharan Mishra'बच रहेगा जो तीन दशकों से अधिक अवधि से काव्य-सर्जना में रत वरिष्ठ कवि माताचरण मिश्र का तृतीय कविता-संकलन है, जो 'जंगल चुपचाप के पश्चात् पाठकों तक पहुँच रहा है। इसमें कवि अपनी 53 कविताओं के साथ प्रस्तुत है। इनमें दुनिया कहीं एक रहस्य की तरह खुलती है, और कहीं प्रकृति एक अतीन्द्रिय मायालोक-सी हर दिन नए रंग लेती है। उसमें हैं अपने समय के समस्त पुराने संघर्ष, किरचों की तरह चुभती और हमारा चेहरा बदलती घटनाएँ, एक उदास धुन या विस्मृत सिम्फनी की तरह बजता अतीत और अथाह उमड़ते जल का क्षुब्ध कोलाहल। और यह सब यह कवि बिना कोई शोर मचाए रचता है।
        धूमिल से प्राय: किनारा कर चुकी समकालीनता में व्यवस्था के विरुद्ध विद्र्रोह और मुक्त होने की उद्दाम आकांक्षा के साथ माताचरण मिश्र इस कवि की याद दिलाते हैं, और पुन: प्रश्न करते हैं? वे उद्विग्न हैं कि 'मजाक बन चुका है देश और 'सारे देश में चरित्रहीनता का यह एक और दौर है/जिसकी शुरुआत पिछली शताब्दी में हुई थी।" अपने को खोकर बनते हुए/माताचरण किसी के भी अनुसरण या छाँह से भी छिटकते हुए अपनी कविता को संभव करते हैं।
        सांप्रदायिक हिंसा और मज़हबी नफरत के विरुद्ध इस कवि की मुखरता ईश्वर के सामने भी चुनौती रखने में हिचकती नहीं है। वह अपने वर्ग को भी खूब पहचानता है, जिसका अंश बने हम घोष तो करते हैं सिंहों की तरह, किंतु व्यवस्था की बलि चढ़ते जाते हैं मेमनों की तरह। 'आजादी के ये आढ़तिए, 'ये वक्त के बहेलिए, 'काले सच और सफेद झूठ के बारे में आदि शीर्षकों से कविताओं का मूल स्वर ही नहीं, स्वभाव भी जाहिर हो जाता है। बगरते रंग, बटोहिए, फुलचुग्गी, हड़ीली, गटापारची बबुए, बोझिहार जैसे शब्दों का प्रयोग कवि की भाषा का पता देता है। और उसके बृहद् 'स्पान का प्रमाण भी।
        आर्थिक साम्राज्यवाद एवं नव्य पूँजीवादी बाजार के हमलावर निशानेबाज जिस भाँति हमारी युवा पौध को विपथित कर रहे हैं, कवि को अपने लोगों से गुहार लगाना पड़ा है, ''बचा सकते हो तो/बचा लो अब भी अपनी अगली पीढ़ी उच्च वर्ग की अभूतपूर्व उछाल ने इधर अभिजात नेतृत्व का दिमाग इतना चढ़ा दिया है कि उसने अब मध्यवर्ग के मलाईदार हिस्से को ‘मवेशी क्लास बताते हुए उसे उसकी औकात दिखाना शुरू कर दिया है। यह इतराती दौलत का क्रूर समय-खंड है जिसमें ''आदमी हों या पेड़/कभी भी उखाड़कर फेंके जा सकते हैं।‘’ जब संवाद गुम गए हैं और टूट चुके हैं आदमी-आदमी के बीच के संपर्क-सूत्र, तब भी कवि आशान्वित है, और कह सकता है कि अब भी बेहतरी की, बदलाव की संभावनाएँ अनंत हैं। पाठक आज के कविता-क्षेत्र में परिपक्व और पुष्ट परिप्रेक्ष्य से पोषित इस संग्रह की पृथक् और पुख्ता पदचाप में संभावनाओं के अनंत की प्रतिध्वनि अवश्य पकड़ सकेंगे।
--ओम भारती




माताचरण मिश्र
जन्म : 3, नवम्बर सन् 1946 को बिलासपुर 'छत्तीसगढ़में
शिक्षा : एम. .
प्रकाशन : देश की पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ एवं कॉलम प्रकाशित। 1968-69 से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन के विविध कार्यक्रमों में प्रसारण, 'संदर्भ, 'शुरुआतऔर 'अक्षरा जैसी चर्चित लघुपत्रिकाओं में संपादन सहयोग
'अकेला कोई नहीं है काव्य संग्रह तथा 'रौंदे हुए गुलाब कथा संग्रह प्रकाशित, 'जंगल चुपचाप काव्य संग्रह को वर्ष 2007 का 'अखिल भारतीय भवानीप्रसाद मिश्र पुरस्कार प्राप्त।
        अनेक सरकारी-गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा सम्मानित पुरस्कृत, .प्र. हिन्दी साहित्य सम्मेलन के प्रबंध मंत्री एवं सम्पादक विचार आलेख सेवा।
संपर्क : /19, मिनाल रेसिडेंसी, गोविंदपुरा, भोपाल-462003 (.प्र.)




गुनगुनाती नृत्‍यमय कविताऍं
Gungunati Nrityamay kavitayen by Pooja Saxena

खूबसूरत सी महकती हुर्इ सूरज की किरन है कविता
लेखनी के माध्यम से कागजों पर उतरता प्यारा सा चित्र है कविता
मेरें ऊपर, अपने स्वर्ण कलश से, प्रेम की बारिश करती है कविता
रात और दिन की गुथी हुर्इ आध्यातिमकता है कविता
मुझे जिन्दगी के नए सूत्र देती है कविता
जैसे ही शाम ढलती है, अस्त होता सूर्य, कविता के माध्यम से मुझसे जुड़ जाता है
रात और चांद दोनो के सौन्दर्य में चार चाद लगाती है कविता
मेरे तन-मन-आत्मा के लिये संजीवनी है कविता
मेरी जिन्दगी एक झरना है, इस झरने से बनी नदी का पानी है कविता
मेरे लिये हर पल जिन्दादिली और नवीनता का एहसास है कविता
मुझे हर दिन एक खूबसूरत सफर पर ले जाती है कविता
मुझे भावुकता के महासागर में और प्यार के आकाश में घुमाती है कविता
मुझे सूरज-चाद-तारो-ग्रह-नक्षत्रों -आकाशगंगाओं के गहने पहनाती है कविता
प्यार के कंगन से मेरी कलाइयों को सजाती है कविता
प्रेम नाम का तत्व है, मेरे लिये कविता
जिन्दगी को गजल बनाती है कविता
उर्वशी और अप्सरा की अनुभूति जगाती है कविता
गुनगुनाती नृत्यमय कविताएँ-किसी बासुरी की धुन हैं,
जिन्दगी का राग हैं  
- पूजा


पूजा सक्‍सेना
पहले प्रकाशित कविता-संग्रह ''जिंदगी गजल हो गई'', ''उर्वशी पुन:'' और ''अप्‍सरा'' की चर्चित क‍वयित्री। कई सम्‍मानों से सम्‍मानित। 
सम्‍प्रति, प्राचार्य स्‍कूल शिक्षा विभाग, मध्‍य प्रदेश शासन
संपर्क : 6/2, रीडर्स क्‍वार्टर, स्‍टाफ कैंपस, एसजीएसआईटीएस, 
वाय एन रोड, इंदौर-452003 (म.प्र.)
ई-मेल : saxenapoojaa@gmail.com









पगडंडियॉं गवाह हैं - आत्‍मा रंजन (Pagdandiyan Gawah hain : Aatma Ranjan)

आत्मा रंजन की ये कविताएँ हिन्दी की समसामयिक कविता को सहजता के साथ स्पर्श करती हैं। इनमें उनके कवि-अनुभोक्ता की जीवंत छवियाँ हैं। महीन किंतु मारक व्यंजना भी है इन कविताओं में। उन्होंने रचना में प्रतिफलित हर प्रसंग को शब्दों में हू-ब-हू उतारने का भरसक प्रयास किया है ताकि वह सामान्य आदमी के जैवी पर्यायों-विपर्यायों एवं जीवन के मारक एवं पोषक तत्वों की रहनुमाई कर सके।     रंजन ने कविता की पीछे छूट गई ज़मीन को फिर से टटोला है और निरंतर ऐसे सच को प्रकाशवृत्त में लाने की ऊहापोह की है जिसे हम आज प्राय: भुला चुके हैं। वे कविता के रूप में खँगाले गए सच और समाज से उसके सरोकार को एक संतुलित भावयष्टि में पिरोने का उपक्रम करते हैं। आज जबकि नई मीडिया टेक्नॉलोजी के जेरेअसर पूरा लिखित रचना साहित्य महज शेल्फों के क्षेपक भूमीय खातों में धूल फाँक रहा है, ऐसी कविता का कहा जाना एक साहसिक रचना कर्म का परिचायक है। कविता आज न केवल साहित्येतर अपितु साहित्य के हलकों में भी उपेक्षित हो रही है—इस तरह की कविताएँ सहसा हमें यह बोध कराती हैं कि हमने अपनी काव्य विरासत को बरसरे-रोज़गार होम कर दिया है।     इन कविताओं को पढ़कर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की 'काठ की घंटियाँÓ सहज ही स्मरण हो आती है जिनमें परोक्ष संवाद था, वक्रोक्ति व्यास शैली थी और थी मध्यवर्ग की बुर्जुवाई को तोड़ती हुई सहज और भरपूर प्रगतिशीलता। आत्मा रंजन ने भी हस्बेमामूल इन प्रतिमानों की चौहदी में अपने समीप के संसार को जिया है। उनकी इन रचनाओं में पारिवारी, समाजगत और परिवेशीय सभी स्थितियाँ सीधी-सरल काव्यपदीय भाषा में उकेरी नज़र आती हैं। आशा है सभी वर्ग के रसिक पाठक इन्हें पसंद करेंगे। —श्रीनिवास श्रीकांत
आत्मा रंजन की ये कविताएँ हिन्दी की समसामयिक कविता को सहजता के साथ स्पर्श करती हैं। इनमें उनके कवि-अनुभोक्ता की जीवंत छवियाँ हैं। महीन किंतु मारक व्यंजना भी है इन कविताओं में। उन्होंने रचना में प्रतिफलित हर प्रसंग को शब्दों में हू-ब-हू उतारने का भरसक प्रयास किया है ताकि वह सामान्य आदमी के जैवी पर्यायों-विपर्यायों एवं जीवन के मारक एवं पोषक तत्वों की रहनुमाई कर सके।
    रंजन ने कविता की पीछे छूट गई ज़मीन को फिर से टटोला है और निरंतर ऐसे सच को प्रकाशवृत्त में लाने की ऊहापोह की है जिसे हम आज प्राय: भुला चुके हैं। वे कविता के रूप में खँगाले गए सच और समाज से उसके सरोकार को एक संतुलित भावयष्टि में पिरोने का उपक्रम करते हैं। आज जबकि नई मीडिया टेक्नॉलोजी के जेरेअसर पूरा लिखित रचना साहित्य महज शेल्फों के क्षेपक भूमीय खातों में धूल फाँक रहा है, ऐसी कविता का कहा जाना एक साहसिक रचना कर्म का परिचायक है। कविता आज न केवल साहित्येतर अपितु साहित्य के हलकों में भी उपेक्षित हो रही है—इस तरह की कविताएँ सहसा हमें यह बोध कराती हैं कि हमने अपनी काव्य विरासत को बरसरे-रोज़गार होम कर दिया है।
    इन कविताओं को पढ़कर सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की 'काठ की घंटियाँ' सहज ही स्मरण हो आती है जिनमें परोक्ष संवाद था, वक्रोक्ति व्यास शैली थी और थी मध्यवर्ग की बुर्जुवाई को तोड़ती हुई सहज और भरपूर प्रगतिशीलता। आत्मा रंजन ने भी हस्बेमामूल इन प्रतिमानों की चौहदी में अपने समीप के संसार को जिया है। उनकी इन रचनाओं में पारिवारी, समाजगत और परिवेशीय सभी स्थितियाँ सीधी-सरल काव्यपदीय भाषा में उकेरी नज़र आती हैं। आशा है सभी वर्ग के रसिक पाठक इन्हें
पसंद करेंगे।
—श्रीनिवास श्रीकांत


आत्मा रंजन
जन्म : 18 मार्च 1971 (दस्तावेज़ों में 13 मार्च, 1970) को एक साधारण किसान परिवार में।
शिक्षा : एम.ए., एम. फिल. (हिन्दी साहित्य) हि.प्र. विश्वविद्यालय,    शिमला से।
सृजन : देश भर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, कहानियाँ और कुछ समीक्षाएँ प्रकाशित। कुछ रचनाएँ संपादित संकलनों में भी संकलित। कुछ रचनाओं का अंग्रेजी व पंजाबी में अनुवाद। 'पगडंडियाँ गवाह हैं' पहला ही कविता-संग्रह।
सम्मान : युवा शिखर साहित्य सम्मान-2010 से सम्मानित।
सम्प्रति : हि.प्र. उच्च शिक्षा विभाग में वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर हिन्दी के प्राध्यापक।
स्थाई पता : गाँव-हरीचोटी चनारडी, डाक-थाची, वाया-धामी, जिला-शिमला-171103 (हि.प्र.)


सुकन्या 
प्रबन्ध-काव्य

सन् 1970 से लगातार हिंदी काव्य मंच पर अपना अनूठा स्थान बनाए रखने वाले कवियों की परंपरा में रामावतार शशी का नाम पहली फहरिस्त के रचनाकारों में है। हिंदी का पहला जनवादी प्रबंध काव्य ''जिलाधीश जी आज हमारे गाँव पधारे हैं"  सरलतम भाषा में लिखी गई काव्य कृति को कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं ने धारावाहिक भी छापा है।
उनकी नई कृति सुकन्या में एक पौराणिक नारी चरित्र को इंकलाब की इस सदी में खड़ा करने का यह अनूठा प्रयास हिंदी पाठकों को निश्चय ही कृति के मूल्यांकन के लिए आकृष्ट करेगा। इधर लिखी जाने वाली काव्य कृतियों में इस कृति को मूल्यांकन की प्रतीक्षा शेष है।
वृहृमनाद सुनने वाले पिकवयनी ताक रहे हैं।
मृगछाला वाले देखो मृगनयनी माँग रहे हैं।

रामावतार शशी
जन्म : 2 फरवरी 1940
पिता : स्वतंत्रता सेनानी महीपाल सिंह चौहान
जन्म स्थान : खरपरी मैनपुरी उ.प्र.
वर्तमान : मुहल्ला गाडीवान मैनपुरी उ.प्र.
माँ : विद्यावती चौहान
व्यवसाय : अधिवक्ता
लगभग आधा दर्जन काव्य कृतियाँ प्रकाशित है।