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कहानी


भैया एक्‍सप्रेस - अरुण प्रकाश 
(Bhaiya Express : Arun Prakash)

मूल्‍य : 110/- (PB)  210/- (HB)
 अरुण प्रकाश अभिधा-परंपरा के कथाकार हैं। स्थितियों और पात्रों को अप्रत्याशित झटके नहीं देते। कहन पर अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय जानकारी नहीं गाँजते। वे पहले से परिचित पात्रों और स्थितियों में अपरिचय का अंश प्रकट करते हैं। अपरिचय का परिचय नहीं देते।...

उनकी कहानियों में तत्कालीनता की ऐतिहासिकता की भूमिका हैयह भी प्रेमचंद, परसाई, शेखर जोशी और ज्ञानरंजन, स्वयं प्रकाश की परंपरा में है। कहानियों के पात्र और उनकी स्थितियाँ ऐसी हैं, जो अभी निर्णीत नहीं हैं, वे कुछ होने और न होने की प्रक्रिया में हैं, उनपर विराम-चिह्न नहीं लगा है।

विश्वनाथ त्रिपाठी

बिहार के मज़दूरों की इस दुर्दशा के प्रति अरुण प्रकाश जितने संवेदनशील थे उतनी संवेदनशीलता मैंने बहुत कम लोगों में पाई है। उनकी इसी संवेदनशीलता का प्रमाण और परिणाम है उनकी मशहूर कहानी 'भैया एक्सप्रेस।

मैनेजर पाण्डेय
 
वे 'कफन 1984’ और 'भैया एक्सप्रेसजैसी कहानियों के माध्यम से बिहार के मज़दूरों के निरंतर पलायन और सामंती जकड़बंदी में उसके शोषण को बड़ी संवेदनशीलता से चित्रित कर रहे थे। इस शोषण से मुक्ति के लिए मज़दूरों के भीतर उठने वाले संघर्ष हिंदी आलोचकों को आलोचना के नए औज़ार गढऩे को विवश कर रहे थे।
सुरेन्द्र स्निग्ध



जल प्रांतर : अरुण प्रकाश
(Jal Prantar : Arun Prakash)

 'जल-प्रांतर’ कहानी के रूप में रिपोर्तार्ज है। बिहार की बाढ़ का शायद ही कहीं ऐसा विवरण मिलता हो जो यथार्थ के इतना करीब हो।
मूल्‍य : 100/- (PB) 200/- (HB)

'जल-प्रांतरकहानी के रूप में रिपोर्तार्ज है। बिहार की बाढ़ का शायद ही कहीं ऐसा विवरण मिलता हो जो यथार्थ के इतना करीब हो।

नामवर सिंह

'जल-प्रांतरका प्रतिपाद्य बाढ़ की विभीषिका, उस राहत कार्य में भ्रष्टाचार, सामान्य जन की विपत्ति और उनको वंचित करने के दृश्यप्रकृति के कोप के अपार नेपथ्यों में। और इसी में घोर कर्मकाण्डी रुढिग़्रस्त अंधविश्वासी पंडित परिवार और पाहुन, और उनकी वृद्धा पत्नी का प्रकरण है, जो बाढ़-लीला का छोटा-सा किनारे पड़ा हुआ अंश है। किंतु वृद्धा पत्नी और उनके पति पाहुन के संबंधों-स्थितियों से जूझते हुए संबंधों को इतनी सहजता, संयम, मितकथन से संकेतित किया गया गया है कि इस विशदकथा की मार्मिकता उस वृद्ध दम्पती केन्द्रित-पर्यवसित हो जाती है।

विश्वनाथ त्रिपाठी

'जल-प्रांतरमें जमा छह कहानियों में से 'जल-प्रांतरमुझे प्रत्येक दृष्टि से अद्वितीय लगी। एक ज़बरदस्त कहानी। अरुण ने इसमें अपना सब-कुछ उलीच कर रख दिया। मनुष्य, कल और व्यवस्था का एक यथार्थवादी रूपक। कहानी का नायक पंडित वासुदेव का किरदार एक साथ कई द्वंद्वों का प्रतिनिधित्व करता है। 'जल-प्रांतरसिर्फ बाढ़ से घिरे लोगों और इलाके की कहानी नहीं है। मैं इसे राष्ट्र के संधिकाल के अंतर्विरोधों के रूपक के तौर पर लेता हूँ।

रामशरण जोशी

 'जल-प्रांतरका स्थापत्य विराट है। इसके स्थापत्य में युगों से चली आ रही आस्थाओं के भग्नावशेष के साथ-साथ गँवई समाज के विविधवर्णी क्रियात्मक रूप और प्रकृति की महाकाव्यात्मकता शामिल हैं। कहानी का पाश्र्व रचते हुए अरुण प्रकाश कुछ भी आक्षेपित किए बिना सहज भाव से वर्णन करते हैं और जीवन का मर्म उकेरते चलते हैं।

अरुण प्रकाश की कहानियाँ मानसधर्मी कहानियाँ नहीं हैं। वह कालधर्मी कहानीकार हैं। वह अपने उन जीवनानुभवों को कहानी के कथ्य में रूपांतरित करते हैं जिन्हें वह हमारे समय, समाज और मनुष्य के अंतर्विरोधों से टकराकर अर्जित करते हैं।
हृषीकेश सुलभ




 उड़ानों के सारांश : वंदना शुक्‍ल
(Udanon Ke Saransh : Vandana Shukla)
'उड़ानों के सारांश’ कथा लेखिका वंदना शुक्ल का पहला संग्रह है। इस पुस्तक में संग्रहित कहानियों में लेखिका ने आज के व्यस्त और आधुनिक जीवन में मनुष्य की छिजती संवेदनाओं, मनुष्यता के लिए घटती गुंजाइशों और इंसानी छटपटाहट को बहुत ही महीन बुनावट में आत्मीयता पूर्वक आरेखित करने का अनूठा और विनम्र प्रयास किया है। गज़ब की कथात्मकता तो है ही, बिना किसी तरह के दावे और नारेबाजी के एक स्पष्ट सरोकार भी है। इनकी कहन शैली और भाषा में निजता इन्हें अपनी पीढ़ी के अन्य युवाओं से बिलगाती और विशिष्ट भी बनाती है।        यह एक स्त्री की कलम से लिखी गई कहानी होने के कारण प्रचलित अर्थ में स्त्री-विमर्श की कहानी नहीं है। व्यापक स्त्री-समाज के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण ही नहीं, सामाजिक समरसता, संबंधों में आत्मीयता और जीवन के जद्दोजहद में संघर्ष की महत्ता को भी यहाँ पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। जलकुंभियाँ, मिनाल पार्क और तीन बूढ़े, अपने-अपने तह$खाने, मुआवज़ा, आखेट, अहसास आदि इनकी अरसे तक याद रहने वाली कहानियाँ हैं। निश्चय ही हिंदी कहानी के पाठकों के पाठ-अनुभव को समृद्ध करने के साथ-साथ उनमें कुछ नया जोडऩे में सक्षम होंगी इस संग्रह की कहानियाँ।
मूल्‍य : 250/-

 'उड़ानों के सारांश कथा लेखिका वंदना शुक्ल का पहला संग्रह है। इस पुस्तक में संग्रहित कहानियों में लेखिका ने आज के व्यस्त और आधुनिक जीवन में मनुष्य की छिजती संवेदनाओं, मनुष्यता के लिए घटती गुंजाइशों और इंसानी छटपटाहट को बहुत ही महीन बुनावट में आत्मीयता पूर्वक आरेखित करने का अनूठा और विनम्र प्रयास किया है। गज़ब की कथात्मकता तो है ही, बिना किसी तरह के दावे और नारेबाजी के एक स्पष्ट सरोकार भी है। इनकी कहन शैली और भाषा में निजता इन्हें अपनी पीढ़ी के अन्य युवाओं से बिलगाती और विशिष्ट भी बनाती है।
       यह एक स्त्री की कलम से लिखी गई कहानी होने के कारण प्रचलित अर्थ में स्त्री-विमर्श की कहानी नहीं है। व्यापक स्त्री-समाज के साथ-साथ प्रकृति और पर्यावरण ही नहीं, सामाजिक समरसता, संबंधों में आत्मीयता और जीवन के जद्दोजहद में संघर्ष की महत्ता को भी यहाँ पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। जलकुंभियाँ, मिनाल पार्क और तीन बूढ़े, अपने-अपने तह$खाने, मुआवज़ा, आखेट, अहसास आदि इनकी अरसे तक याद रहने वाली कहानियाँ हैं। निश्चय ही हिंदी कहानी के पाठकों के पाठ-अनुभव को समृद्ध करने के
साथ-साथ उनमें कुछ नया जोडऩे में सक्षम होंगी इस संग्रह की कहानियाँ।




वंदना शुक्ल
शिक्षा : बी.एस-सी. एम.एम. (हिंदी साहित्य), एम.ए. (संगीत), बी.एड., शोध कार्य।
महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित। कादम्बिनी कहानी लेखन प्रतियोगिता से पुरस्कृत। प्रेमचंद की तीन कहानियों का नाट्य रूपांतरण। दो का मंचन (निदेशन), आकाशवाणी सुगम संगीत कलाकार, सुप्रसिद्ध निर्देशकों द्वारा निर्देशित नौ पूर्णकालिक व दो नुक्कड़ नाटकों में अभिनय एवं संगीत संयोजन। दूरदर्शन तथा अनेक शहरों में नाट्य प्रदर्शन। 'उड़ानों के सारांशपहला कहानी-संग्रह।
संप्रति, शिक्षिका।
भोपाल मध्यप्रदेश की निवासी एवं पिलानी राजस्थान में पदस्त।



टुकड़े-टुकड़े धूप : मनीष वैद्य
(Tukde-Tukde Dhup : Manish Vaidya)

मनीष वैद्य की कहानियाँ मानवीय निरीहता और संघर्ष के संकेत के ऐसे मार्मिक आख्यान हैं जो प्रतिरोध में लोक भाषा की मदद से उसकी अन्त: दिप्ती में प्रकट होते है। आज एक ऐसे समय में जब संस्कृति विचार और संवेदना को घेरकर एक बिंदु विशेष पर केन्द्रित किया जा रहा है। बाज़ार ने सूचना और संचार माध्यमों की मदद से एक भिन्न विचार का घटाटोप तैयार कर दिया है। पिछले दो दशकों से हिंदी कहानी बाज़ार की इस बर्बरता को अनावृत करने की कोशिश में लगी है। मनीष की कहानियाँ भी इसी की एक कड़ी है। ये कहानियाँ प्रत्यक्षत: अपने पाठ में बाज़ार से अपरिचय की तरह प्रकट होती हैं। लेकिन अपने समय और समाज के यथार्थ से उसके बर्ताव में बाज़ार से उत्पन्न विभीषिका के मासूम और सांकेतिक चिह्नï उद्घाटित होते हैं।  इन रचनाओं में कहानी परम्परा के प्रति एक ऐसा आदर है जो यथार्थ के प्रति उस आसक्ति से पैदा हुआ है जहां संवेदना को कहानी में एक ऐसी जगह मिलती है जो उसकी पठनीयता को बचाकर अपने अर्थप्राण को प्रकट करे। मनीष प्राय: इसके लिए स्मृतियों के बखान का सहारा लेते हैं। स्मृतियाँ जो अवसाद से शुरू होकर हर्ष पर ठहरती हैं या प्राय: हर्ष या उत्साह से शुरू होकर एक ऐसे अवसाद पर समाप्त होती हैं जहाँ छोटी-छोटी चीजों के अभाव जीवन की इच्छाओं और दारुण दुखों का अनुवाद करते हैं। स्मृतियों और अवसाद के लिए मनीष फंतासी की तरफ न जाते हुए एक किस्म की मूर्त स्थानीयता को भाषा की मदद से जगह देते हैं। यथार्थ के ब्योरों की तकलीफ के बावजूद वह पाठकीय संवेदनों के करीब होते जाते हैं।  मनीष वैद्य के साथ एक बात अच्छी जुड़ी है कि वह स्मृति और अनुभवों की बिखरी अपनी छोटी-सी दुनिया से कथासूत्र जुटाते हैं। संभवत इसी कारण ये कहानियाँ अपने मार्मिक आवेग में संवेदना के धरातल के ज्यादा करीब लगती हैं। घर-परिवार और समाज के छोटे छोटे हिस्सों में फैली ये कहानियाँ अंतत: लेखक की उस पक्षधरता को ही ग्रहण करती हैं जो समाज में तेजी से जगह बना रही है अमानवीयता के िखलाफ है। मनीष के इस कथासंसार में उनके अनुभव संसार से आए घर-परिवार, बच्चे, छोटे बड़े सुख दु:ख, इच्छा और जीवन उष्मा से भरा स्वप्न संसार है जो आश्वस्त भी करता है और उम्मीद भी जगाता है।


मनीष वैद्य की कहानियाँ मानवीय निरीहता और संघर्ष के संकेत के ऐसे मार्मिक आख्यान हैं जो प्रतिरोध में लोक भाषा की मदद से उसकी अन्त: दिप्ती में प्रकट होते है। आज एक ऐसे समय में जब संस्कृति विचार और संवेदना को घेरकर एक बिंदु विशेष पर केन्द्रित किया जा रहा है। बाज़ार ने सूचना और संचार माध्यमों की मदद से एक भिन्न विचार का घटाटोप तैयार कर दिया है। पिछले दो दशकों से हिंदी कहानी बाज़ार की इस बर्बरता को अनावृत करने की कोशिश में लगी है। मनीष की कहानियाँ भी इसी की एक कड़ी है। ये कहानियाँ प्रत्यक्षत: अपने पाठ में बाज़ार से अपरिचय की तरह प्रकट होती हैं। लेकिन अपने समय और समाज के यथार्थ से उसके बर्ताव में बाज़ार से उत्पन्न विभीषिका के मासूम और सांकेतिक चिह्नï उद्घाटित होते हैं।
इन रचनाओं में कहानी परम्परा के प्रति एक ऐसा आदर है जो यथार्थ के प्रति उस आसक्ति से पैदा हुआ है जहां संवेदना को कहानी में एक ऐसी जगह मिलती है जो उसकी पठनीयता को बचाकर अपने अर्थप्राण को प्रकट करे। मनीष प्राय: इसके लिए स्मृतियों के बखान का सहारा लेते हैं। स्मृतियाँ जो अवसाद से शुरू होकर हर्ष पर ठहरती हैं या प्राय: हर्ष या उत्साह से शुरू होकर एक ऐसे अवसाद पर समाप्त होती हैं जहाँ छोटी-छोटी चीजों के अभाव जीवन की इच्छाओं और दारुण दुखों का अनुवाद करते हैं। स्मृतियों और अवसाद के लिए मनीष फंतासी की तरफ न जाते हुए एक किस्म की मूर्त स्थानीयता को भाषा की मदद से जगह देते हैं। यथार्थ के ब्योरों की तकलीफ के बावजूद वह पाठकीय संवेदनों के करीब होते जाते हैं।
मनीष वैद्य के साथ एक बात अच्छी जुड़ी है कि वह स्मृति और अनुभवों की बिखरी अपनी छोटी-सी दुनिया से कथासूत्र जुटाते हैं। संभवत इसी कारण ये कहानियाँ अपने मार्मिक आवेग में संवेदना के धरातल के ज्यादा करीब लगती हैं। घर-परिवार और समाज के छोटे छोटे हिस्सों में फैली ये कहानियाँ अंतत: लेखक की उस पक्षधरता को ही ग्रहण करती हैं जो समाज में तेजी से जगह बना रही है अमानवीयता के िखलाफ है। मनीष के इस कथासंसार में उनके अनुभव संसार से आए घर-परिवार, बच्चे, छोटे बड़े सुख दु:ख, इच्छा और जीवन उष्मा से भरा स्वप्न संसार है जो आश्वस्त भी करता है और उम्मीद भी जगाता है।
--भालचंद्र जोशी
 

आते रहना : दिनेश कर्नाटक
(Aate Rahna : Dinesh Karnataka)
 

नई पीढ़ी की कहानियाँ पढ़ते हुए मुझे सब से ज़्यादा आश्वस्ति परिवर्तनमूलक चेतना से होती है। दिनेश कर्नाटक की 'झाडिय़ाँएक ऐसे कुलीन वर्ग के नौजवान की कहानी है जो अंतत: ज़मीन पर उतरता है।...यह एक अच्छी, सार्थक कहानी है।
रवीन्द्र वर्मा

दिनेश कर्नाटक की कहानी 'सफर आसान नहीं है मगर...(मैं और क्या चाहती थी।) प्रभावित करती है। दिनेशजी लगातार बहुत सादगी और शिद्दत से सशक्त कहानियाँ लिख रहे हैं।
जयनंदन

'अंतराल के बाद’...आज सुबह-सुबह...सूर्योदय के पहले पढ़कर अद्ïभुत लालिमा से नहा गया हँ! बेचैनी में आपको कॉल करना चाहा लेकिन आपका मोबाइल बंद...एकदम कहानी के अंत में छायी उद्वेलक चुप्पी की तरह! बहरहाल इस यादगार कहानी के लिए अनंत, अंतरंग, अक्षय बधाई!
श्याम बिहारी श्यामल
                                                                                                                                               
आपकी कहानी पढ़ी 'अंधेरे के....’ (मैं और क्या चाहती थी)। पढ़कर देर तक उस दुनिया में डूबी रही। लगा यह तो घर-घर की कहानी है। आपने एक डेंजमतचपमबम (मास्टरपीस) की रचना की है।
चमेली जुगरान


दिनेश कर्नाटक

 जन्म : 13 जुलाई 1972, रानीबाग (नैनीताल)      शिक्षा : एम.ए. (हिन्दी एवं अंग्रेजी साहित्य) बी.एड. रचनाएँ : पहली कहानी 'एक छोटी सी यात्रा’ 1991 में 'उत्तर प्रदेशपत्रिका में प्रकाशित हुई। एक कहानी-संग्रह 'काली कुमाऊँ का शेरदा तथा अन्य कहानियाँऔर एक उपन्यास 'फिर वही सवालप्रकाशित। 'दक्षिण भारत में सोलह दिनयात्रा संस्मरण तथा 'कहो कुछ, करो कुछआलेख-संग्रह प्रकाशकाधीन। हिन्दी की महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित। पत्र-पत्रिकाओं में आलेख, संस्मरण, अनुवाद तथा समीक्षा आदि निरंतर प्रकाशित।
स्ंापादन : विद्यालयी शिक्षा, उत्तराखंड सरकार की कक्षा 4, 5, 7 तथा 8 की हिन्दी पाठ्यपुस्तकों 'हंसी-खुशीतथा 'बुरांशके लेखन तथा संपादन में योगदान। कक्षा-आठ की किताब में अंग्रेजी से अनूदित कहानी 'अंतिम पाठसंकलित। शिक्षा के सवालों पर केंद्रित छमाही पत्रिका 'शैक्षिक दखलके संपादन तथा प्रकाशन में भागीदारी।
पुरस्कार तथा अन्य : प्रताप नारायण मिश्र स्मृति युवा साहित्यकार सम्मान, 2010 से सम्मानित। उपन्यास 'फिर वही सवालभारतीय ज्ञानपीठ की नवलेखन प्रतियोगिता-2009 में प्रकाशनार्थ पुरस्कृत।
संप्रति, राजकीय इंटर कालेज, कालाढंूगी (नैनीताल) में अध्यापन।
संपर्क : ग्राम व पो.आ.-रानीबाग
जि़ला-नैनीताल-263126 (उत्तराखंड)