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उपन्यास

ये दाग-दाग उजाला... : प्रकाश कांत

नब्बे के दशक के शुरू के सालों में साम्यवादी देशों में साम्यवादी व्यवस्था के एक खास तरह के मॉडल का ध्वस्त होना और वहाँ से साम्यवाद की विदाई तत्कालीन तीसरी दुनिया के कई पिछड़े गरीब देशों के लिए एक  महास्वप्नभंग जैसा हादसा था। असल में वह स्वप्न मानव मुक्ति का स्वप्न था। रूसी क्रांति के बाद से अनेक देशों का मेहनतकश तबका अपने लिए जिस तरह के एक सर्वथा शोषण मुक्त नए समाज का सपना देख रहा था और जिसके लिए छोटे-बड़े कई तरह के संगठन अलग-अलग स्तर पर काम कर रहे थे, उन सबके सामने इस विफलता से एक बड़ा वैचारिक संकट खड़ा हो गया था।  एक विराट् स्वप्न का अवसान ही नहीं हुआ था बल्कि बहुत सारे तर्क, बहसें और बहसों के औज़ार भी अप्रासंगिक करार दिए गए थे। बरसों पश्चिम बंगाल की वाम सरकार का नेतृत्व कर चुके मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने घोषणा कर दी थी की समाजवाद का अब कोई भविष्य नहीं है।        बहरहाल, यह सब सुदूर गाँव-कस्बों में इस विचार और नए समाज के लिए काम कर रहे लोगों के लिए किसी निजी सदमे से कम नहीं गुज़रा था।  कम्यूनिस्ट पार्टियों ने तो इस हादसे से अपना समायोजन कायम कर लिया लेकिन निजी तौर पर बहुत गहरी वैचारिक भावनात्मकता से जुड़े लोगों के लिए जिन्होंने अपने बरसों-बरस इस सपने को हकीकत में बदलने में लगाये थे, इस सदमे से उबरना आसान नहीं रहा। ऐसे ही लोगों के बारे में है यह उपन्यास। ज़ाहिर है कि साम्यवाद-समाजवाद के एक विशेष मॉडल के ध्वंस की पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह एक राजनैतिक उपन्यास है।
नब्बे के दशक के शुरू के सालों में साम्यवादी देशों में साम्यवादी व्यवस्था के एक खास तरह के मॉडल का ध्वस्त होना और वहाँ से साम्यवाद की विदाई तत्कालीन तीसरी दुनिया के कई पिछड़े गरीब देशों के लिए एक  महास्वप्नभंग जैसा हादसा था। असल में वह स्वप्न मानव मुक्ति का स्वप्न था। रूसी क्रांति के बाद से अनेक देशों का मेहनतकश तबका अपने लिए जिस तरह के एक सर्वथा शोषण मुक्त नए समाज का सपना देख रहा था और जिसके लिए छोटे-बड़े कई तरह के संगठन अलग-अलग स्तर पर काम कर रहे थे, उन सबके सामने इस विफलता से एक बड़ा वैचारिक संकट खड़ा हो गया था।  एक विराट् स्वप्न का अवसान ही नहीं हुआ था बल्कि बहुत सारे तर्क, बहसें और बहसों के औज़ार भी अप्रासंगिक करार दिए गए थे। बरसों पश्चिम बंगाल की वाम सरकार का नेतृत्व कर चुके मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने घोषणा कर दी थी की समाजवाद का अब कोई भविष्य नहीं है।

       बहरहाल, यह सब सुदूर गाँव-कस्बों में इस विचार और नए समाज के लिए काम कर रहे लोगों के लिए किसी निजी सदमे से कम नहीं गुज़रा था।  कम्यूनिस्ट पार्टियों ने तो इस हादसे से अपना समायोजन कायम कर लिया लेकिन निजी तौर पर बहुत गहरी वैचारिक भावनात्मकता से जुड़े लोगों के लिए जिन्होंने अपने बरसों-बरस इस सपने को हकीकत में बदलने में लगाये थे, इस सदमे से उबरना आसान नहीं रहा। ऐसे ही लोगों के बारे में है यह उपन्यास। ज़ाहिर है कि साम्यवाद-समाजवाद के एक विशेष मॉडल के ध्वंस की पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह एक राजनैतिक उपन्यास है।



अधूरे सूर्यों के सत्‍य 
(Adhure Suryon Ke Satya : Prakash Kant)
मूल्‍य : 160/- (PB) 300/- (HB)
'अधूरे सूर्यों के सत्यवीर नायकों की जयगाथा नहीं, सामान्य-कमज़ोर इन्सान के क्षण-प्रतिक्षण के संघर्षों और उसके पराजय को रेखांकित करने का ईमानदार लेखकीय प्रयास है। वरिष्ठ कथाकार प्रकाश कांत ने इस उपन्यास में जाति-धर्म, ऊँच-नीच के खाँचे में बँटे हमारे समाज में व्याप्त संकीर्णता और वीभत्सता के बरक्स मानवीय उच्चतर मूल्यों के छोटे-छोटे जुगनुओं को रखकर इतिहास से वर्तमान तक की सच्चाई हमारे सामने रख दी है। बेहद पठनीय इस उपन्यास में गांधीवाद की असफलता को तो समझा ही जा सकता है, नए बाज़ारवादी दौर के अराजक माहौल बनने की प्रक्रिया को भी जाना जा सकता है।

मालवा की माटी की खुशबू से लबरेज इस उपन्यास की मूल चिंता नई नहीं है। हाँ, इसका पाठ अनुभव ताज़गीपन के साथ-साथ स्मृति में टिके रहने वाला है।

                छोटे-छोटे वाक्यों और चाक्षुष भाषा वाले इस उपन्यास को पढ़ते समय चलचित्रों की भाँति सब कुछ दृश्य-जैसे कर देने की लेखकीय क्षमता कमाल की है। किले, दुर्ग, सीढ़ी, तालाब, सूर्यास्त या आधी रात, सड़क, बाज़ार, मुहल्ले सब कुछ प्रकृति के साथ जीवंत हो उठते हैं। लेखक के साथ पाठक सैर कर रहा हो जैसे।...और सबसे महत्त्वपूर्ण पंक्ति 'आधा खून हिंदू, आधा मुसलमान!पाठक के मन-मस्तिष्क में अंत-अंत तक होंट करती रहती है।



प्रकाश कान्‍त
वरिष्‍ठ कथाकार प्रकाश कान्‍त का जन्‍म 26 मई, 1948 को सेंधवा, पश्चिम निमाड़ में हुआ।
शिक्षा, एम.ए. (हिंदी), रांगेय राघव के उपन्‍यासों पर पीएच.डी.।
कृतियाँ : 'शहर की आखिरी चिडि़या', 'टोकनी भर दुनिया', कहानी-संग्रह और 'अब और नहीं', 'मक़्तल', 'अधूरे सूर्यों के सत्‍य' उपन्‍यासों के अलावा कार्ल मार्क्‍स के जीवन और विचारों पर एक पुस्‍तक। महत्‍वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में सवा सौ से अधिक कहानियॉं प्रकाशित।
बत्‍तीस वर्ष तक ग्रामीण क्षेत्रों में अध्‍यापन के बाद फिलहाल स्‍वतंत्र-लेखन।
संपर्क : 155, एल.आई.जी., मुखर्जी नगर, देवास- 455001 (म.प्र.)




कालीचाट - सुनील चतुर्वेदी
मूल्‍य HB : 325/-
मूल्‍य PB : 175/-
उपन्यास मालवा के एक गाँव सिन्द्रानी की कहानी है। वहाँ सामंती युग का एक महाजन भीमा है, जिसके शोषण के हथियार ज़्यादा न$फीस और घातक हैं। अपने कुएँ से मुफ्त पानी देने की विनम्रता में उसका फैलता हुआ शोषणतंत्र है। उदारीकरण के दौर में उपजे नए महाजन हैं। उनके कर्ज का नागफाश  है। कल्याणकारी योजनाएँ हैं। उन्हें गले के फंदे में बदलता भ्रष्टतंत्र है। बैंक है, बिचोलिये और नेता हैं और उनके किसानों की ओर लपकते हाथ हैं। किसानों को अपनी जमीन से बेदखल करते कारपोरेट हैं और दोस्तों का लिबास पहने फंडिंग एजेंसियों की ज़ुबान बोलते एनजीओज हैं। बलात्कार और आत्महत्याएँ हैं। सिन्द्रानी की ज़मीन के भीतर 'कालीचाट' (काली चट्टान) है, जिसके नीचे जल है, आशा-आकांक्षा और सपने हैं। उस चट्टान को तोडऩे के लिए अनवरत घन बरसाते संघर्षशील जीवंत किसान हैं। वह चट्टान टूट नहीं रही। उसे तोड़ता किसान खुद टूट रहा है।
यह मालवा के गाँव सिन्द्रानी मात्र की कहानी नहीं, देश के लगभग सभी गाँवों की दुखांत संघर्षगाथा है। काली चट्टान सिर्फ वहीं नहीं है। अपने रूप बदलकर यह सर्वत्र पसरी हुई है, कहीं ज़मीन के नीचे और कहीं ज़मीन के ऊपर। अपने यथार्थ से उपजी भाषा में—जिसके शब्द स्वयं अपने अर्थ ध्वनित करते हैं, उपन्यास सिन्द्रानी के बहाने समस्त गाँवों की कहानी बयान करता है। और अपने वक्त का सबसे अहम् सवाल उठता है। किसान आत्महत्याएँ क्यों कर रहा है और जो आत्महत्या नहीं कर रहा, उन्हें अपनी ज़मीन से बेदखल क्यों किया जा रहा है।
एक ध्रुवीय होती व्यवस्था का सबसे बड़ा खतरा किसान है। वह जागेगा तो व्यवस्था बदल देगा। उसे अपने पैरों पर खड़ा मत होने दो। कार्पोरेट जगत उसे अपनी जमीन से बेदखल करके उसकी पहचान समाप्त करने का खेल खेल रहा है। उसने अपने दलालों के ज़रिये हर किसान के घर में एक बाजारू संस्कृति पैदा कर दी  है।  हर घर में ज़मीन बचाने और बेचने का द्वंद है।
किसान के पास सिर्फ दो विकल्प हैं। या तो ज़मीन बेचे या फिर आत्महत्या करने के लिए विवश हो। हम मूक दर्शक हैं और मीडिया खामोश है। इस खामोश वक्त में यह उपन्यास एक चीख है।
बोल्सिकी का कथन है कि महत्त्वपूर्ण कृतियाँ या तो अपने समय का सवाल होती हैं, या फिर उनका जवाब।
'कालीचाट' अपने समय का सवाल भी है और जवाब भी।
सुभाष पंत 

महामाया : सुनील चतुर्वेदी 
(Mahamaya : Sunil Chaturvedi)
कमलेश्वर ने जब कहा कि ईश्वर ने आदमी के जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा घेर रखा है तब उनका इशारा संभवत: उस विराट कारोबार की तरफ भी था जो धर्म के नाम पर फल-फूल रहा है, धर्म और अध्यात्म अगर इस देश के समृद्ध वर्ग के लिए प्रतिष्ठा मूल्य रहे हैं तो आम आदमी के लिए श्रद्धा एवं आस्था के केन्द्र! कुम्भ, सिंहस्थ और अन्य धार्मिक समागमों में लाखों की संख्या में उमडऩे वाली भीड़ इसी का प्रमाण है। आम आदमी सांसारिक मुक्ति की कामना से ज़्यादा दैनिक जीवन के दु:ख, कष्ट तथा समस्याओं से छुटकारा पाने की इच्छा से अमूमन धर्म की शरण में जाता है। पिछले ढाई-तीन दशकों में धर्म और अध्यात्म का एक बेहद सुव्यवस्थित, सुप्रबंधित कारोबार इसी आम आदमी की श्रद्धा और आस्था के दम पर पनपा और फैला है। इसी बीच पिछले तीन-चार दशकों में दर्जनों नए-पुराने छोटे-बड़े अवतार, महात्मा, धर्माचार्य, बाबा, योगी, प्रवचनकार उभरे और उनके करोड़ों की सम्पत्ति वाले विशाल मठ, संस्थान, प्रतिष्ठान वगैरह बड़े हुए है। उन्हें थैलीशाहों-राजनेताओं का संरक्षण भी प्राप्त रहा है। हालाँकि, उन्हीं महात्माओं-बाबाओं में से कई पर बलात्कार, व्याभिचार, हत्या, धोखाधड़ी इत्यादि के प्रामाणिक आरोप भी लगे हैं। ईश्वर के इन स्वयंभू एजेंटों ने अपने प्रभाव का विस्तार विदेशों तक किया है। यह भी सही है कि सिर्फ आम आदमी ही नहीं बल्कि एक बड़ा बौद्धिक वर्ग भी इनके प्रभाव क्षेत्र में रहा है। बहुत सारे धार्मिक संस्थानों, प्रतिष्ठानों की बाहरी दुनिया अगर कर्मकाण्डों, अंधश्रद्धा एवं तर्कातीत विश्वासों पर खड़ी है तो भीतरी दुनिया रहस्यमयी अंधेरी, बंद और गंदगी से बजबजाती सुरंगों एवं षड्यंत्र कक्षों वाले तहखानों से बनी है। सुनील चतुर्वेदी ने इस दुनिया के बाहर-भीतर को बहुत नजदीक से देखा, समझा और अनुभव किया है। 'महामायाÓ उपन्यास इसी सबका एक तरह का सर्जनात्मक एवं कथात्मक दस्तावेज है। सुनील चतुर्वेदी पत्रकार रहे हैं, व्यंग्यकार भी! इसके अलावा साक्षरता, जल संरक्षण जैसे राष्ट्रीय अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। इस सबसे उनकी दृष्टि में जो पैनापन और गहराई आए हैं उन्हें इस उपन्यास में देखा जा सकता है। व अपने विशिष्ट भाषिक मुहावरे में भण्डाफोड़ जैसा कुछ नहीं करते बल्कि धर्म की तिजारत के असली सचों को महसूस करवाते हैं। यही बात उनके उपन्यास को महत्त्वपूर्ण बनाती है।                                                                                                                                 —प्रकाश कांत   सुनील चतुर्वेदी जन्म : 11 जनवरी, 1963 को उज्जैन (म.प्र.) में। शिक्षा : एम.एस-सी., पीएच.डी. प्रकाशन : जल संवर्द्धन एवं सरक्षण पर 'पानी दे गुड़धानी दे', 'रुको बूँद' पुस्तकें तथा 'विजि़ट गरीबी' (व्यंग्य-संग्रह) एवं कई रिपोर्ताज प्रकाशित। सम्मान : 'पानी दे गुड़धानी दे' राष्ट्रीय मेदिनी पुरस्कार से सम्मानित। संप्रति, भू-गर्भ शास्त्री के रूप में सामाजिक संस्था विभावरी से संबद्ध। संपर्क : ई.बी. 275, स्कीम नं.-94, बंबई अस्पताल के सामने, इन्दौर-452010 (म.प्र.)
Price : INR 300.00 (HB)
कमलेश्वर ने जब कहा कि ईश्वर ने आदमी के जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा घेर रखा है तब उनका इशारा संभवत: उस विराट कारोबार की तरफ भी था जो धर्म के नाम पर फल-फूल रहा है, धर्म और अध्यात्म अगर इस देश के समृद्ध वर्ग के लिए प्रतिष्ठा मूल्य रहे हैं तो आम आदमी के लिए श्रद्धा एवं आस्था के केन्द्र! कुम्भ, सिंहस्थ और अन्य धार्मिक समागमों में लाखों की संख्या में उमडऩे वाली भीड़ इसी का प्रमाण है। आम आदमी सांसारिक मुक्ति की कामना से ज़्यादा दैनिक जीवन के दु:ख, कष्ट तथा समस्याओं से छुटकारा पाने की इच्छा से अमूमन धर्म की शरण में जाता है। पिछले ढाई-तीन दशकों में धर्म और अध्यात्म का एक बेहद सुव्यवस्थित, सुप्रबंधित कारोबार इसी आम आदमी की श्रद्धा और आस्था के दम पर पनपा और फैला है। इसी बीच पिछले तीन-चार दशकों में दर्जनों नए-पुराने छोटे-बड़े अवतार, महात्मा, धर्माचार्य, बाबा, योगी, प्रवचनकार उभरे और उनके करोड़ों की सम्पत्ति वाले विशाल मठ, संस्थान, प्रतिष्ठान वगैरह बड़े हुए है। उन्हें थैलीशाहों-राजनेताओं का संरक्षण भी प्राप्त रहा है। हालाँकि, उन्हीं महात्माओं-बाबाओं में से कई पर बलात्कार, व्याभिचार, हत्या, धोखाधड़ी इत्यादि के प्रामाणिक आरोप भी लगे हैं। ईश्वर के इन स्वयंभू एजेंटों ने अपने प्रभाव का विस्तार विदेशों तक किया है। यह भी सही है कि सिर्फ आम आदमी ही नहीं बल्कि एक बड़ा बौद्धिक वर्ग भी इनके प्रभाव क्षेत्र में रहा है।
बहुत सारे धार्मिक संस्थानों, प्रतिष्ठानों की बाहरी दुनिया अगर कर्मकाण्डों, अंधश्रद्धा एवं तर्कातीत विश्वासों पर खड़ी है तो भीतरी दुनिया रहस्यमयी अंधेरी, बंद और गंदगी से बजबजाती सुरंगों एवं षड्यंत्र कक्षों वाले तहखानों से बनी है। सुनील चतुर्वेदी ने इस दुनिया के बाहर-भीतर को बहुत नजदीक से देखा, समझा और अनुभव किया है। 'महामायाÓ उपन्यास इसी सबका एक तरह का सर्जनात्मक एवं कथात्मक दस्तावेज है। सुनील चतुर्वेदी पत्रकार रहे हैं, व्यंग्यकार भी! इसके अलावा साक्षरता, जल संरक्षण जैसे राष्ट्रीय अभियानों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है। इस सबसे उनकी दृष्टि में जो पैनापन और गहराई आए हैं उन्हें इस उपन्यास में देखा जा सकता है। व अपने विशिष्ट भाषिक मुहावरे में भण्डाफोड़ जैसा कुछ नहीं करते बल्कि धर्म की तिजारत के असली सचों को महसूस करवाते हैं। यही बात उनके उपन्यास को महत्त्वपूर्ण बनाती है।
—प्रकाश कांत


सुनील चतुर्वेदी
जन्म : 11 जनवरी, 1963 को उज्जैन (म.प्र.) में।
शिक्षा : एम.एस-सी., पीएच.डी.
प्रकाशन : जल संवर्द्धन एवं सरक्षण पर 'पानी दे गुड़धानी दे', 'रुको बूँद' पुस्तकें तथा 'विजि़ट गरीबी' (व्यंग्य-संग्रह) एवं कई रिपोर्ताज प्रकाशित।
सम्मान : 'पानी दे गुड़धानी दे' राष्ट्रीय मेदिनी पुरस्कार से सम्मानित।
संप्रति, भू-गर्भ शास्त्री के रूप में सामाजिक संस्था विभावरी से संबद्ध।
संपर्क : ई.बी. 275, स्कीम नं.-94, बंबई अस्पताल के सामने, इन्दौर-452010 (म.प्र.)











मैं मुहब्‍बत : सैयद ज़ैग़म इमाम
(Main Muhabbat : Syed Zaigham Imam)
Price : INR 200.00 (PB)
सैयद ज़ैगम इमाम का उपन्यास 'मैं मुहब्बतएक साथ दो स्तरों पर चलता है। एक तरफ उनके पत्रकारी जीवन के संघर्ष और सफलताओं और विफलताओं की कहानी है, जहाँ उनका नायक परवेज़ जहाँगीर बनारस के छोटे से अखबार से उठकर नोएडा के एक अखबार में जाता है और अंत में एक टीवी चैनल में अपनी जगह बनाता है। दूसरी तरफ उसके प्रेम संबंधों की कहानियाँ हैं जिसमें कभी सोनाक्षी है कभी संचारी है तो कभी काव्या लेकिन वह टिकता है पूर्वा शर्मा के छज्जे पर। पूर्वा से उसके संबंध बेहद घनिष्ठ, आत्मीय और सबकुछ दाँव पर लगा देने वाले हैं। यहीं इस उपन्यास की सबसे संवेदनशील समस्या से भी हमारा साक्षात्कार होता है।
परवेज़ मुसलमान है और पूर्वा हिंदू। पूर्वा का परिवार इस संबंध को सिरे से खारिज कर देता है और परवेज़ के परिवार का आग्रह है कि पूर्वा को मुसलमान बनाकर ही 'शादीहो सकती है। दोनों कोर्ट मैरेज कर लेते हैं और बाद में उनका बेटा भी होता है समीर जहाँगीर। दोनों उसके माध्यम से और निकट आते हैं मगर कुछ ही दिनों में उसकी मृत्यु हो जाती है और पूर्वा टूट जाती है। कुछ दिन बाद दूसरा बेटा होता है और परवेज़ के घरवाले उसका नाम रख देते हैं काशिफ। उनका आग्रह अब भी यही है कि कोर्ट मैरेज से कुछ नहीं होता, उसे बाकायदा निकाह पढ़वा लेना चाहिए। पूर्वा अंतत: इस निकाह के लिए तैयार हो जाती है और उसका नाम होता है, परवीन।

उपन्यास में पूर्वा और परवेज़ के आत्मीय संबंधों, रूठने-मनाने, प्यार और नाराजगी के वर्णन विस्तार से दिए गए हैं। और हर प्रसंग की आिखरी टेक होती है परवेज़ का मुसलमान होना। इस धार्मिक भेदभाव को लेकर सैयद ज़ैगम इमाम खुद बहुत सचेत हैं और इस बात का जवाब तलाशने की कोशिश करते हैं कि चाहे प्रेम लड़के और लड़की के बीच हो या लड़की और लड़के के बीच, दोनों ही हालत में अपना धर्म छोड़कर इस्लाम ही क्यों कबूल करना पड़ता है...क्यों नहीं, दोनों ही अपना-अपना धर्म छोड़कर उस प्रतिज्ञा पर टिके रहते, जहाँ प्यार ही एकमात्र आधार है और दोनों सिर्फ मनुष्य। समस्या वहीं खड़ी होती है जब परिवार या समाज के बहाने धर्म दखलंदाज़ी करने लगता है। परवेज़ के सामने यह समस्या तीनों लड़कियों के साथ संबंध बनाते हुए बार-बार आई। यह महत्त्वपूर्ण उपन्यास जिन सवालों को सामने रखता है उनका अंतिम हल होना अभी बाकी है। मैं कामना करता हूँ कि सैयद ज़ैगम इमाम इस समस्या को और आगे सोचेंगे और इसे मौलवियों और पंडितों के हवाले ही नहीं छोड़ देंगे।

राजेन्द्र यादव


सैयद ज़ैगम इमाम....वह लिखते नहीं, बल्कि बोलते हैं। ऐसा लगता है कि उपन्यास के सारे पात्र आपके इर्द- गिर्द इकट्ठा हैं और आपका कमरा एक एम्फीथियेटर है। सड़क, गली, मुहल्ला, घर, दफ्तर, डिस्कोथिक--सब कुछ लाइव! सब कुछ आपकी आँखों के सामने घटित हो रहा है। कभी-कभी तो मन करता है कि इनमें से किसी से बतिया लें, कुछ कह दें, कुछ सुन लें, कुछ गुन दें, कुछ बदल दें!
'मैं मुहब्बत का नायक एक साथ कई मोर्चों पर कई झंझावातों से गुज़रता जि़न्दगी की पेचीदगियों और रिश्तों की गुत्थियों में बार-बार फँसता है।

एक मुसलमान युवक सपना देखता है कि वह पत्रकार बनेगा, बड़ा पत्रकार बनेगा। अपने चारों तरफ पसरे तरह-तरह के समाजों के उतने ही विचित्र और विविध अन्तर्विरोधों के चक्रव्यूह में फँसे अभिमन्यु की तरह वह युद्ध के मैदान में कदम रखता है, बस फर्क इतना है कि वह अभिमन्यु जितना भी सौभाग्यशाली नहीं है कि जंग की कुछ टिप्स माँ के गर्भ में मिल गयी हों। नौसिखिया और निहत्था---वह बीच मैदान में हर समय निपट अकेला दीखता है.

उलझनें हैं, गाँठें हैं, जकडऩें हैं, द्वन्द्व हैं...जड़ें कहीं हैं, उड़ कर पहुँचना वह कहीं चाहता है, अपनी ज़मीन और अपने आसमान के बीच फँसा वह त्रिशंकु की तरह कभी आगे बढ़ता है, कभी न लौटना चाह कर भी पीछे लौटता है। परिवार, सपने, प्रेम और प्रेम के बाद के परिवार की चक्कियों में पिसते-पिसाते वह एक हिन्दू लड़की से अपने प्रेम को कैसे जीता है।

ज़ैगम का यह उपन्यास जटिल स्थितियों और विकट मन:स्थितियों का बहुत ही मार्मिक यथार्थ है, जिसे उन्होंने पूरी संवेदनशीलता से उकेरा है।


कमर वहीद नकवी
वरिष्ठ पत्रकार, पूर्व न्यूज़ डायरेक्टर टीवी टुडे नेटवर्क लिमिटेड (आज तक)

 




सैयद ज़ैगम इमाम 

Main Muhabbat

2 जनवरी 1982 को बनारस में जन्म। शुरुआती पढ़ाई-लिखाई बनारस के कस्बे चंदौली में। आगे की शिक्षा लखनऊ, इलाहाबाद और भोपाल से। 2002 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य और प्राचीन इतिहास में स्नातक। 2004 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय (भोपाल, नोएडा) से मास्टर ऑफ जर्नलिज़्म की डिग्री।
   2004 में 'अमर उजाला’ (दिल्ली संस्करण) के साथ बतौर रिपोर्टर करियर की शुरुआत। बाद में 'न्यूज़ 24’ (न्यूज़ चैनल) और टीवी टुडे समूह के लिए काम। सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़) सराय की ओर से 2007 में इंडीपेंडेंट फेलोशिप। 'सपनों की रेलडॉक्यूमेंट्री का निर्माण। फिलहाल मुंबई में बीएजी फिल्म्स  (स्टूडियो 24) में बतौर क्रिएटिव राइटर। कई टीवी सीरियलों का लेखन और निर्देशन। फिल्म निर्माण में सक्रिय।
   उपन्यास लेखन में विशेष रुचि। 2009 में पहला उपन्यास 'दोज़खप्रकाशित। उपन्यास के अलावा कविता, गज़ल, व्यंग्य और कहानियों में रुचि। कई व्यंग्य, कविताएँ और कहानियाँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित तीसरे उपन्यास का लेखन जारी।
ईमेल-zaighamimam@gmail.com