पुस्‍तक मंगवाने के नियम व शर्तें

पुस्तक मंगवाने के लिए मनीआर्डर/ चेक/ ड्राफ्ट अंतिका प्रकाशन के नाम से भेजें। दिल्ली से बाहर के एट पार बैंकिंग (at par banking) चेक के अलावा अन्य चेक एक हजार से कम का न भेजें। रु.200/- से ज्यादा की पुस्तकों पर डाक खर्च हम वहन करेंगे। रु.300/- से रु.500/- तक की पुस्तकों पर 10% की छूट, रु.500/- से ऊपर रु.1000/- तक 15% और उससे ज्यादा की किताबों पर 20% की छूट व्यक्तिगत खरीद पर दी जाएगी। पुस्‍तकें मँगवाने के लिए संपर्क करें : सी-56/यूजीएफ-4, शालीमार गार्डन एक्‍सटेंशन-2, गाजियाबाद-201005 (उ.प्र.) फोन : 0120-2648212 ई-मेल : antika56@gmail.com
हमारी किताबें अब आप घर बैठे ऑनलाइन मँगवा सकते हैं...www.amazon.in पर...

यात्रा संस्मरण

खरामा-खरामा : पंकज बिष्‍ट

''हिमालय में जुड़े व्यक्ति को सहयाद्री के ये पहाड़ बहुत ही सौम्य और शिशुवत लगते हैं। हालांकि उम्र में बड़े हैं। छोटी-सी वघोरा नदी के दूसरी ओर अर्धचंद्राकार गुफाओं को पहली बार देख कर, दर्शक, सब कुछ सुना होने के बावजूद, अनुमान नहीं कर पाता कि वह सौंदर्य के किस लोक में प्रवेश करने जा रहा है। इस छोटी-सी नदी को (इस तरह की जलधाराओं को कुमाऊँनी में गधेरा यानी झरना या नाला कहा जाता है जो हमारे पहाड़ों में हर मोड़ पर मिल जाते हैं) इन गुफाओं ने दुनिया के न$क्शे पर अमर कर दिया है। कह नहीं सकता कि बरसात में यह नदी कैसी लगती होगी। पर दिसंबर में इसमें इतना भी पानी नहीं था कि एडिय़ाँ डूब पाएँ। एक क्षीण-सी जलधारा। पाँच किलोमीटर की दूरी पर एक गाँव है। इसका नाम है अजंता और अंग्रेज़ों ने इन्हें इसी नाम से पुकारना शुरू कर दिया। अजंता सुंदर नाम है पर मराठी में यह अजिंठा है, बल्कि कहना चाहिए अजिंठा लेणी।’’



(इसी पुस्तक से...)
 
 
पंकज बिष्ट
जन्म, 20 फरवरी, 1946 को मुंबई में।
शिक्षा : 1969 में अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए.।
1969 में भारत सरकार की सूचना सेवा में प्रवेश। इस दौरान 'योजना’ अंग्रेज़ी में सहायक संपादक, आकाशवाणी के अंग्रेज़ी समाचार विभाग में संवाददाता और समाचार संपादक, $िफल्म प्रभाग में पटकथा लेखक का कार्य किया।
1993 से प्रकाशन विभाग, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की पत्रिका 'आजकल’ के संपादक।
1998 में स्वैच्छिक अवकाश।
1999 से 'समयांतर’ का मासिक रूप में पुनप्र्रकाशन।
पहली कहानी 1967 में 'साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में छपी। पहला कहानी-संग्रह 1980 में 'पंद्रह जमा पच्चीस’।
कृतियाँ : 'लेकिन दरवाजा’, 'उस चिडिय़ा का नाम’, 'पंखवाली नाव’ (उपन्यास), 'बच्चे गवाह नहीं हो सकते?’, 'टुंड्रा प्रदेश तथा अन्य कहानियाँ’, 'चर्चित कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह), 'गोलू और भोलू’ (बाल उपन्यास), 'हिंदी का पक्ष’, 'कुछ सवाल कुछ जवाब’, 'शब्दों के घर’ (लेख संग्रह)
कई भारतीय भाषाओं के अलावा अंग्रेज़ी तथा कुछ अन्य योरोपीय भाषाओं में भी अनुवाद।
संपर्क : 98, कला विहार, मयूर विहार फेज वन
दिल्ली-110091

वह भी कोई देस है महराज : अनिल यादव


'वह भी कोई देस है महराजहिंदी के यात्रा-संस्मरणों में अपने ढंग का पहला और अद्ïभुत वृत्तांत है। सामाजिक-सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक मसलों पर लिखने वाले पत्रकार अनिल यादव का यह यात्रा-वृत्तांत पूर्वोत्तर की ज़मीनी हकीकत तो बयान करता ही है, वहाँ के जन-जीवन का आँखों देखा वह हाल बयान करता है जो दूरबीनी दृष्टि वाले पत्रकार और इतिहासकार की नज़र में नहीं आता। पेट्रोल-डीजल, गैस, कोयला, चाय देने वाले पूर्वोत्तर को हमारी सरकार बदले में वर्दीधारी $फौजों की टुकडिय़ाँ भेजती रही हैं।
पूर्वोत्तर केंद्रित इस यात्रा पुस्तक में वहाँ के जन-जीवन की असलियत बयान करने के साथ-साथ व्यवस्था की असलियत को उजागर करने में भी अनिल ने कोई कोताही नहीं बरती है। इस यात्रा में उन्होंने छ: महीने से ज़्यादा समय दिया और उस अनुभव को लिखने में लगभग दस वर्ष लगाए। जाहिर है कि भावोच्छ्वास का कोई झोल न हो और तथ्यजन्य त्रुटि भी न जाए इसका खयाल रखा गया है।
यात्रा की इस पुस्तक में अनिल के कथाकार की भाषा उनकी पत्रकार-दृष्टि को इस कदर ता$कत देती है कि इसे उपन्यास की तरह भी पढ़ा जा सकता है।
निश्चय ही बेहद पठनीय और हिंदी में पूर्वोत्तर केंद्रित अपने ढंग की इस पहली यात्रा पुस्तक को पाठकों का अपार स्नेह मिलेगा।

अनिल यादव
जन्म 1967। जड़ें पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जि़ले के दौलतपुर गाँव में। शिक्षा बीएचयू समेत कई विश्वविद्यालयों में। छात्र एवं किसान आंदोलनों में सक्रियता। पेशे से पत्रकार, फिलहाल अंग्रेज़ी दैनिक 'द पॉयनियरमें प्रधान संवाददाता। उग्रवाद और आदिवासी जीवन के अध्ययन के लिए उत्तर-पूर्व समेत देश के कई हिस्सों की यात्राएँ। कई यात्राएँ बेमकसद भी। सेन्टर फार साइंस एंड इनवैरॉन्मेंट, मीडिया फेलोशिप के तहत अरुणाचल प्रदेश में कार्य। संगम राइटर्स इन्टरनेशनल रेजिडेन्सी प्रोग्राम, 2010 में भागीदारी। वर्ष 2011 में पहला कहानी-संग्रह 'नगरवधुएँ अखबार नहीं पढ़तींप्रकाशित।
संपर्क : 10/7, डालीबाग कॉलोनी, तिलक मार्ग
लखनऊ-34 (उ.प्र.)
ई-मेल : oopsanil@gmail.com
 
 रास्ते की तलाश में: अगर वजाहत
 
'रास्ते की तलाश में’ कई अर्थों से पारंपरिक यात्रा-वृत्तांतों से भिन्न पुस्तक है। इस पुस्तक में विवरण के शब्द-चित्र ही नहीं बल्कि वास्तविक चित्र भी देखे जा सकते हैं। चित्रों की भाषा के व्यापक आयाम होते हैं। यही कारण है कि 'रास्ते की तलाश में’ यात्रा-वृत्तांत की भाषा को चित्र एक व्यापकता और समग्रता प्रदान करते हैं। हिंदी में ऐसे यात्रा-वृत्तांत कम हैं जो शब्दों को चित्रात्मक ही नहीं बनाते बल्कि चित्रों के माध्यम से एक जीवंत भाषा को संप्रेषित करते हैं।



हिंदी में बहुत श्रेष्ठ यात्रा-वृत्तांत लिखे गए हैं। यह एक ऐसी शैली में है जिसके माध्यम से लेखक आँखों देखी घटनाओं, स्थानों और व्यक्तियों को अपने शब्दों के माध्यम से पुनर्जीवित करता है। यात्रा एक दृश्यात्मक अनुभव है। असगर वजाहत के यात्रा-वृत्तांत जैसे ईरान यात्रा पर केंद्रित 'चलते तो अच्छा था’ और पाकिस्तान यात्रा पर आधारित 'पाकिस्तान का मतलब क्या’ पाठकों को अपने साथ यात्रा पर ले जाते हैं। इस यात्रा में ऐसे अनुभव होते हैं जो प्राय: समाजशास्त्रियों, पत्रकारों और अन्य की पकड़ में नहीं आते क्योंकि लेखक की सृजनात्मक और व्यापक दृष्टि ही उनसे साक्षात्कार कर सकती है।
 
 
 
असगर वजाहत


जन्म, 1946, फतेहपुर (उ.प्र.)
हिंदी के वरिष्ठ लेखक हैं जिनके छ: उपन्यास, पाँच कहानी-संग्रह, छ: पूर्णकालिक नाटक, एक नुक्कड़-नाटक संग्रह, पटकथा लेखन व्यावहारिक निर्देशिका, और ईरान तथा पकिस्तान की यात्राओं पर केंद्रित दो पुस्तकें छप चुकी हैं।
उनके नाटकों को हबीब तनवीर, एम. के. रैना, दिनेश ठाकुर, राजेन्द्रनाथ, शीमा किरमानी जैसे निर्देशों ने मंच पर प्रस्तुत किया है। उमेश अग्निहोत्री ने उनके बहुचर्चित नाटक 'जिस लाहौर नइ देख्या...’ का मंचन वाशिंगटन डी.सी. के कैनेडी सेंटर में किया था। इस नाटक को सिडनी, कराची, दुबई और लाहौर के अतिरिक्त देश के प्रमुख शहरों में मंचित किया गया है। इसके अनुवाद और मंचन गुजराती, मराठी और कन्नड़ भाषाओं में किए गए हैं। 'जिस लाहौर...’ पर विख्यात निर्देशक राजकुमार संतोषी फीचर फिल्म बना रहे हैं।
असगर वजाहत ने कई फिल्मों की पटकथाएँ भी लिखी हैं।
भुवनेश्वर नाट्य संस्थान, हिंदी अकादमी, कथा यूके सहित कई सम्मानों से सम्मानित।
सम्प्रति, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली में हिंदी के प्रोफेसर।
संपर्क : 79, कला विहार, मयूर विहार फेज वन
दिल्ली-110091