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डायरी

सिसकियाँ लेता स्‍वर्ग



'सिसकियाँ लेता स्वर्ग’ कश्मीर के हिंदी कवि निदा नवाज़ की एक ऐसी साहसिक डायरी है जो इकहरी अफवाहों और लगभग सच समझ लिए जाने वाले झूठ के खिलाफ एक नया और वास्तविक आईना दिखाती है। दरअसल यह डायरी निदा की आंशिक जीवनी है जो आम कश्मीरियों की भी जीवनी है। यह कठिनडरावनीदहशतगर्द और मानव अपमान की पाशविक कहानी है। एक लगातारभरपूर अंधकार के बीच इसको पढ़ते हुए लगता है कि ज़रूर एक तीली जल रही है। लेकिन इस डायरी की सच्चाईयों को स्वीकार करना काफी मुश्किल इसलिए है कि विगत पचास वर्षों में राष्ट्रवादसैन्यवादआतंकवाद और स्थानीय सत्ताओं ने कश्मीर के बाहर लोगों को दिमागी तौर पर पक्षधरकट्ïटरपूर्वाग्रही और विभाजित बना दिया है। अब जानकारियों में स्वतंत्रता और ईमानदारी नहीं है। निदा की डायरी से रोशनी मिलती हैएक नई खिड़की खुलती है।
       कश्मीरी सदा से भोलेसदाचारीअहिंसकमेहनतकश और मोहब्बतें करने वाले रहे हैं। वे लपलपाता चाकू तक नहीं जानते थेऐसे समाज में अब बंदूकें ही बंदूकेंविस्फोटक ही विस्फोटक फैल गया है। निदा के ऊपर संगीन तनी हैवह फौज के लिए संदिग्ध हैंआतंकी उसे अपहृत करना चाहते हैंजासूसी कुत्ते उसे सूँघ रहे हैंलोकतंत्र के छलछंदों और रक्तपात और उजाड़ से घिरा लेखक अपनी डायरी को टुकड़ों-टुकड़ों में सँवार रहा है। वह यहाँ-वहाँ हर जगह घायल और मारे जाने के लिए अभिशप्त है। निदा नवाज़ की डायरी कश्मीर के असंख्य नागरिकों की डायरी बन गई है। ऐसी संगीन हकीकत पहली बार एक जीवित दस्तावेज़ बनकर प्रकाशित हुई है। सेब के बगीचों में होती फर्जी मुठभेड़ों के बीच निदा कब तक लिखते रह सकेंगे कहा नहीं जा सकता।
       फिलहाल इस कृति का प्रकाशन हिंदी भाषा का एक नया और उजला पक्ष है क्योंकि निदा नवाज़ ने शालीन और अतिआधुनिक होती भाषा के उकता देने वाले ठसके को तोड़कर रख दिया है। वे ज़बरदस्त जोखिम उठाते हैं। मेरा आग्रह है कि इसे सब पढ़ें और अपने को दुरुस्त करें।
ज्ञानरंजन


दिन में पहरा। रात में ताले। हाथों में पहचान पत्र। मौत का खौफ। जेह्ïलम का प्रेम। डल लेक की रुहानी हवा। डाउन-टाउन की निगाहों का शक। जेना कदल और सफा कदल की दास्ताँ। सेना की छाया। कब्रगाह की धूप। घाटी के ये अनमोल शब्द ज़मीं पर जन्नत है या मौत से दो-दो हाथ करते हुए जीने की दास्ताँ। नब्बे के दशक का सच तो यही है। देश की आज़ादी के पचास बरस बाद भी घाटी में आज़ादी का नारा कश्मीर का ऐसा सच है जो नब्बे के दशक में खुले आसमान तले गूँजा करता था। अब यही दिलों में ज़ख्म भर रिसता रहता है। दरअसल निदा नवाज़ की डायरी झटके में उस एहसास को जगा देती है, जहाँ हालात कितने बदले हैं या फिर घाटी को देखने का नज़रिया कितना बदला है या घाटी से संवाद कोई कश्मीरी आज भी नहीं कर पा रहा है। क्योंकि कश्मीर को जीतने का ख्वाब धारा 370 तले लाया जा चुका है। कश्मीरी पंडितों के लिए घाटी में ज़मीन की तलाश दिल्ली का सुकून बन चुकी है। इस्लामाबाद कश्मीर के ज़रिए अपनी सियासत संभालने का ख्वाब पालना चाहता है।
       अपने तरीके से पहली बार बीते ढाई दशकों के ज़ख्म को हिंदी में किसी कश्मीरी की आवाज़ कलम से लिखी गई ऐसी इबारत के तौर पर सामने है जिसे दिल्ली की सियासी हवा में हर कोई भूल चुका था। कश्मीर से एक नए कश्मीर के निकलने का सपना हर कश्मीरी देखता है लेकिन हर ज़ख्म के पीछे धोखा-फरेब होता है और कश्मीर इससे आज़ाद नहीं है। कौन किसका गुनाह सामने ला रहा है या गुनाह की परिभाषा ही हर किसी के लिए कितनी अलग-अलग होनी चाहिए कश्मीर इससे बिलकुल अलग नहीं है। सेना हो या सत्ता, आतंक हो या मानवता का चेहरा सभी को अगर एक ही कश्मीर में रहना हो तो फिर समाज कैसे बँटता है। रिश्तों में कैसे दरार आती है। सही कौन और गलत कौन यह सत्ता तय करने लगे तो हर सत्ता कैसे कटघरे में खड़ी नज़र आती है। लेखक की कलम कश्मीर की हर साँस को छूती है। सीमा पार जहाँ तीसरे दर्जे का लोकतंत्र भी पनप न पाया वह कश्मीर को कौन से सपने बेच सकता है। और कश्मीर के सियासी और धार्मिक दल तो चील और चीते हैं। हर कोई कश्मीर को नोच रहा है। निदा नवाज़ की 'सिसकियाँ लेता स्वर्गडायरी में कश्मीर का ऐसा अनकहा सच है जिसका इनकाउंटर नब्बे के दौर में हो जाना चाहिए था। बच गया तो आपके सामने है।
पुण्य प्रसून वाजपेयी