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बया अप्रैल-जून 2016 ‘विश्वविद्यालय परिसर’ पर केन्द्रित अंक

बया अप्रैल-जून 2016, ‘विश्वविद्यालय परिसर’ पर केन्द्रित अंक का मुख्य आकर्षण :

विचार खंड : विश्वविद्यालय परिसर : हमारा परिसर : जेएनयू : आंदोलनों की वैचारिकियों और वैचारिकियों के आंदोलन-स्थल / आनन्द पाण्डेय जेएनयू डायरी : और लडऩे की ज़रूरत बाक़ी है / मिथिलेश प्रियदर्शी विश्वविद्यालय : शिक्षा का केंद्र या राजनीति का अखाड़ा / जगन्नाथ प्रसाद दुबे पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस वाया 'बनारस’ / सुधांशु कुमार पटना में आर्ट कॉलेज बचाओ आंदोलन का इंकलाब / पुष्पराज गंगा-जमुनी संस्कृति के साये में.../ अर्शिया रसूल जब लड़कियाँ रात भर धरने पर बैठीं.../नीलोफ़र उस्मानी   ‘देशभक्ति का मनोविज्ञान’ : राष्ट्र : वाद और द्रोह / विनय कुमार ‘दस्तावेज़’ : सितारों तक की यात्रा / रोहित वेमुला ‘प्रसंगत:’ : हम नौजवान थे और विश्वविद्यालय में थे / पंकज श्रीवास्तव   ‘मुलाहज़ा’ : कविता की नई पौद / मदन कश्यप   कहानी : दस्तावेज़ : घुसपैठिये / ओमप्रकाश वाल्मीकि   कहानी : प्रसंगत: : फैक्ट्री / लाल्टू   कहानी : विश्वविद्यालय परिसर से : पथर फोड़वा / अनिल कार्की विद्रोहिणी / रूपाली सिंह अड़्याठ कथा / पवनेश ठकुराठी 'पवन’ यादों का जलता दीया / फिरोज़ आलम 'जेन’     कविताएँ : विश्वविद्यालय परिसर से : शालू देवी प्रजापति, दृष्टि गांधी, सूरज त्रिपाठी, अजय कुमार गौतम, मुदस्सिर अहमद भट्ट, प्रणव कुमार मिश्र, रेणु कुमारी, सेतु कुमार वर्मा, जितेन, कैफ़ी हाशमी, पंकज कुमार मिश्र, कुमार मंगलम, आयुष गुप्त, दिव्यांशु पाल नागर, अभिनव, आस्था, अमन त्रिपाठी, अदिति शर्मा, शुभम श्री, वर्तिका सिंह, मनीष, आरती रानी प्रजापति, दिनेश कुमार शर्मा, अमित कुमार सिंह, प्रीति सुमन, शुभम, प्रिंस कुमार, समीक्षा, राजकुमारी, राकेश शर्मा, चन्द्रभूषण चन्द्र, दिनेश कुमार, सुरेश पवार, आदित्य राज सोमानी, शेखर सिंह, स्नेहा सिंह, पम्मी राय, प्रियंका शुक्ला, अमन शुक्ला, पल्लवी मिश्रा, विजय सिंह, मनु कंचन, वत्सला नाईक, शशिकला मौर्य, खेमकरण 'सोमन’, नीता तोरड़े, रेणु, विनायक सोनी, शिव कुमार पटेल, बीरज पाण्डेय, सत्यनारायण प्रियदर्शी, अमित कुमार मिश्रा, प्रमोद राजभर, रितु अहलावत, शुभम नेमा, वागीशा, अर्शिया रसूल, आशीष तंवर, रणजीत तिवारी, अर्चिता सिंह, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता   ‘स्मृति शेष’ : मुद्राराक्षस की याद : तर्पण की मुद्रा में नहीं / सुरेश सलिल
विचार खंड : विश्वविद्यालय परिसर :
हमारा परिसर :
जेएनयू : आंदोलनों की वैचारिकियों और वैचारिकियों के आंदोलन-स्थल / आनन्द पाण्डेय
जेएनयू डायरी : और लडऩे की ज़रूरत बाक़ी है / मिथिलेश प्रियदर्शी
विश्वविद्यालय : शिक्षा का केंद्र या राजनीति का अखाड़ा / जगन्नाथ प्रसाद दुबे
पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस वाया 'बनारस’ / सुधांशु कुमार
पटना में आर्ट कॉलेज बचाओ आंदोलन का इंकलाब / पुष्पराज
गंगा-जमुनी संस्कृति के साये में.../ अर्शिया रसूल
जब लड़कियाँ रात भर धरने पर बैठीं.../नीलोर उस्मानी

‘देशभक्ति का मनोविज्ञान’ :
राष्ट्र : वाद और द्रोह / विनय कुमार
‘दस्तावेज़’ :
सितारों तक की यात्रा / रोहित वेमुला
‘प्रसंगत:’ :
हम नौजवान थे और विश्वविद्यालय में थे / पंकज श्रीवास्तव

‘मुलाहज़ा’ :
कविता की नई पौद / मदन कश्यप

कहानी : दस्तावेज़ :
घुसपैठिये / ओमप्रकाश वाल्मीकि

कहानी : प्रसंगत: :
फैक्ट्री / लाल्टू

कहानी : विश्वविद्यालय परिसर से :
पथर फोड़वा / अनिल कार्की
विद्रोहिणी / रूपाली सिंह
अड़्याठ कथा / पवनेश ठकुराठी 'पवन
यादों का जलता दीया / फिरोज़ आलम 'जेन


कविताएँ : विश्वविद्यालय परिसर से : 
(हमें जिन 61 छात्र-छात्राओं की कविताएँ इस अंक के लिए प्राप्त हुईं उन सभी की कविताएँ इस अंक में हैं। तीन सौ के क़रीब प्राप्त कविताओं में से चयन के बाद दो सौ के क़रीब यहाँ प्रस्तुत की गई हैं। यहाँ हमें हिंदी कविता का शानदार भविष्य नज़र आया इसलिए किसी को भी खारिज करना मुनासिब नहीं लगा। इनमें से कई आगे चलकर बड़े और मशहूर कवि होंगे। गौर करने वाली बात है कि इनमें चालीस से ज़्यादा ऐसे कवि हैं जो पहली बार किसी साहित्यिक पत्रिका में छप रहे हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि इनमें पच्चीस छात्राएँ हैं और दलित, पिछड़ी, आदिवासी आदि समुदायों सहित लगभग भारत के बड़े हिस्से की सहभागिता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों, वर्गों, वर्णों से आये इन विद्यार्थी-कवियों में अनेक स्तर पर विविधता के बावजूद प्रतिरोध के स्वर और जीवन के प्रति नज़रिए में अद्भुत साम्य है। व्यापक ऊर्जा और क्षमता से भरी यह पीढ़ी हिंदी कविता के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। बया परिवार की तरफ़ से हम इनका स्वागत करते हैं और हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं।
—संपादक)
शालू देवी प्रजापति, दृष्टि गांधी, सूरज त्रिपाठी, अजय कुमार गौतम, मुदस्सिर अहमद भट्ट, प्रणव कुमार मिश्र, रेणु कुमारी, सेतु कुमार वर्मा, जितेन, कैफ़ी हाशमी, पंकज कुमार मिश्र, कुमार मंगलम, आयुष गुप्त, दिव्यांशु पाल नागर, अभिनव, आस्था, अमन त्रिपाठी, अदिति शर्मा, शुभम श्री, वर्तिका सिंह, मनीष, आरती रानी प्रजापति, दिनेश कुमार शर्मा, अमित कुमार सिंह, प्रीति सुमन, शुभम, प्रिंस कुमार, समीक्षा, राजकुमारी, राकेश शर्मा, चन्द्रभूषण चन्द्र, दिनेश कुमार, सुरेश पवार, आदित्य राज सोमानी, शेखर सिंह, स्नेहा सिंह, पम्मी राय, प्रियंका शुक्ला, अमन शुक्ला, पल्लवी मिश्रा, विजय सिंह, मनु कंचन, वत्सला नाईक, शशिकला मौर्य, खेमकरण 'सोमन, नीता तोरड़े, रेणु, विनायक सोनी, शिव कुमार पटेल, बीरज पाण्डेय, सत्यनारायण प्रियदर्शी, अमित कुमार मिश्रा, प्रमोद राजभर, रितु अहलावत, शुभम नेमा, वागीशा, अर्शिया रसूल, आशीष तंवर, रणजीत तिवारी, अर्चिता सिंह, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता

‘स्मृति शेष’ : मुद्राराक्षस की याद : तर्पण की मुद्रा में नहीं / सुरेश सलिल


2016 में जारी महत्वपूर्ण किताबें


पेपरबैक मूल्य 130
पेपरबैक मूल्य 300


मूल्य स. 265/ पे. 160
पेपरबैक मूल्य 150

सजिल्द मूल्य 365
मूल्य स. 595/ पे. 475
सजिल्द मूल्य 685
सजिल्द मूल्य 535


सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 450
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 235

सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 450

सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 465




2016 में अंतिका प्रकाशन से जारी महत्वपूर्ण पुस्तकें

कथेतर गद्य 
जो मर के भी अमर हैं (क्रांतिकारियों के संस्मरण) : सं. : सुरेश सलिल      मू. 130
तुलसीराम : व्यक्तित्व और कृतित्व : सं. श्रीधरम     मू. 300
तुमि चिर सारथि (नागार्जुन आख्यान) : तारानन्द वियोगी     मू. 265
अन्धेरा भारत  (उत्पीडि़तों की आत्म-कहानियाँ) : रामजी यादव     मू. 150
दाह (मराठी दलित आत्मकथा) : ल. सी. जाधव     मू. 535
गोबरहा (दलित आत्मकथा) : विश्वनाथ राम     मू. 465
कलम की काकटेल (मीडिया-समाज) : शारदा शुक्ला     मू. 225
मानव संसाधन प्रबन्धन के अनुभूत आयाम : राम जनम सिंह     मू. 365

उपन्यास 
फिरंगी ठग : राजेन्द्र चन्द्रकांत राय     मू. 685
छिन्नमूल : पुष्पिता अवस्थी     मू. 595


कहानी-संग्रह 
मैं भी जाऊंगा... : गंगा प्रसाद विमल     मू. 235
गुलामों का गणतंत्र : राजेन्द्र चन्द्रकांत राय     मू. 235
अवाक् आतंकवादी  : अजय सोडानी     मू. 225
पहला रिश्ता : दीर्घ नारायण     मू. 265
वाट्स एप पर क्रांति : अनुराग पाठक     मू. 265
लुटिया में लोकतंत्र : राजेश पाल     मू. 235

कविता-संग्रह 
कोई दीवार भी नहीं : सुरेश सलिल     मू. 235
भोजपत्र : पुष्पिता अवस्थी     मू. 450
समुद्र से लौटकर रेत के घर : अमेय कांत     मू. 225
हथेलियों पर हस्ताक्षर : आभा दूबे     मू. 265
समय और समय : दुर्गाप्रसाद झाला     मू. 450
वरुणा का होना : वन्दना झा     मू. 265
कविता में सब कुछ सम्भव : शैलेन्द्र शैल     मू. 225
शूद्र : त्रिभुवन     मू. 235
अब और नहीं : रामचन्द्र त्यागी     मू. 225

गजल-संग्रह 
जीवन कर्जा गाड़ी है : अविनाश दास     मू. 225


नवीनतम पुस्तकें :  2015 में प्रकाशित कुछ और पुस्तकें






उपन्यास
लव विद बेनीफिट  : सर्वेश मिश्र  मू. 495.00


कहानी-संग्रह
नाटे कद का आदमी : संतोष गौतम मू. 225.00
दलदल : सुशांत सुप्रिय मू. 275.00



                                      कविता-संग्रह 

सपने को मरने मत देना : भावना मू. 265.00
इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं : 335.00 
जिसे वे बचा देखना चाहते हैं : लक्ष्‍मण प्रसाद गुप्ता 235.00


प्रबन्ध-काव्य
सुकन्या : रामावतार शशी मू. 265.00


                                              गजल 

शब्दों की कीमत : भावना मू. 235.00






विश्व पुस्तक मेला (15-23 फरवरी, 2014) में जारी अंतिका की नवीनतम पुस्‍तकें




आलोचना/संस्मरण
स्मृतियों के साक्ष्य : हृदयेश                  मूल्‍य : 315.00/170.00
कहानी के फलक : अरुण प्रकाश             मूल्‍य : 350.00
दास्ताने-दिले-नादां : रामकुमार कृषक     मूल्‍य : 225.00/130.00
डायरी में साहित्य : बलराज पांडेय         मूल्‍य : 495.00/295.00

उपन्यास
ये दाग-दाग उजाला... : प्रकाश कांत        मूल्‍य : 260.00/150.00
क्या मैं अंदर आ सकता हूँ : अरुण कुमार असफल   मूल्‍य : 425.00/225.00

कला
अकाल की कला और जैनुल आबेदिन : अशोक भौमिक   मूल्‍य : 250.00/150.00


सेहत
एक मनोचिकि‍त्‍सक के नोट्स : डॉ विनय कुमार  मूल्‍य 310.00 

कविता-संग्रह
जीवन भी कविता हो सकता है : विष्णु नागर              मूल्‍य : 275.00/150.00
घोड़े की आँखों में ऑंसू : अजंता देव                     मूल्‍य : 210.00
शव : संजय अलंग                                 मूल्‍य : 225.00
नूपिलान की मायरा पायबी : गीता गैरोला         मूल्‍य : 210.00
संभावना के चिथड़े : वर्तिका              मूल्‍य : 230.00
मैं एस्‍ट्रोनॉट हूँ : अरविन्‍द जोशी          मूल्‍य : 210.00

बाग़-ए-बेदिल : कृष्‍ण कल्पित का महत्‍त्‍वपूर्ण-वजनी दीवान प्रकाशित

जब तक बेदिल का केवल नाम सुना था तब तक जानता न था कि तज्र-ए-बेदिल में रेख्ता क्या है? जब तक बाग़-ए-बेदिल को दूर से, बाहर से देखा था तब तक जानता न था कि वहाँ खुशबू क्या है? जब तक कल्ब-ए-कबीर उर्फ़ कृष्ण कल्पित का यह पूरा संग्रह पढ़ा न था तब तक जानता न था कि यहाँ कौन सा खज़ाना गड़ा है।     <br>     हममें से बहुतों ने कृष्ण कल्पित के ये छोटे-छोटे पद अपने मोबाइल के पर्दे पर पढ़ रखे हैं और आपस में कई बार इन पर चर्चा भी की है। लेकिन उस क्षणभंगुर लोक में ये दोहे एक स्फुलिंग की तरह उठे और फिर गुम हो गए। इन्हें दुबारा, तिबारा एक दूसरे से मिलाकर, ठहर-ठहर कर पढऩे गुनने का मौका शायद ही किसी को मिला। कहते हैं, बूँद बूँद से तालाब भरता है। यहाँ तो इन छोटे-छोटे पदों से, पाँच सौ से भी ज़्यादा पदों से, एक पूरा वज़नी दीवान बन चुका है। </br>                इस दीवान ने मुझे कई हफ्तों से बेचैन कर रखा है। मानव जीवन का कोई भी भाव ऐसा नहीं जो यहाँ न हो। हिन्दी, उर्दू, राजस्थानी, ब्रज, अवधी, फारसी और संस्कृत की सात धाराओं से जरखेज यह भूमि हमारी कविता के लिए एक दुर्लभ खोज की तरह है। एकरस, एक सरीखी, इकहरी, निहंग कविताओं के सामने यह संग्रह एक बीहड़, सघन वन प्रांतर की तरह है। समुद्र से उठती भूमि की तरह। ऐसी कविताएँ आज तक लिखीं न गईं। एक साथ रूलाने, हँसाने, क्रोध से उफनाने वाली कविताएँ, घृणा और प्यार को एक साथ गूँथने वाली कविताएँ किसी समकालीन के यहाँ मुश्किल से मिलेंगी। सबकी आवाज़—भर्तृहरि, धरणीदास, राजशेखर, कालिदास, व्यास, कबीर, मीर, गालिब, निराला, बेदिल और बहुत से, बहुत-बहुत से कवियों की आवाज़ें यहाँ एक ही ऑर्केस्ट्रा में पैबस्त हैं। मीर तकी मीर ही नहीं, ख़ुद यह संग्रह ग़रीब-गुरबों, मज़लूमों, वंचितों के लिए चल रहा एक विराट् राहत शिविर है। समकालीन कविता ने इसके पहले कभी भी इतनी सारी प्रतिध्वनियाँ एकत्र न की थीं। लगता है जैसे सरहप्पा, भर्तृहरि, शमशेर और केदारनाथ सिंह एक ही थाल में जीम रहे हों। परम्परा यहाँ जाग्रत है। यह हमारे पुरखे कवियों के जागरण और पुनरागमन की रजत रात है।                 और कल्पित ने इतनी-इतनी धुनों, लयों, छंदों में रचा है। कौन सा ऐसा समकालीन है जिसकी तरकश में इतने छंद हैं, इतने पुष्प-बाण? आवाज़ और स्वर के इतने घुमाव, इतने घूर्ण, इतने भँवर, इतनी रंगभरी अनुकृतियाँ हैं।  कई बार तो इनमें से कुछ पदों को पढ़कर मैं ढूँढता हुआ क्षेमेन्द्र या राजशेखर या मीर या शाद तक पहुँचा। ये कविताएँ हमारे अपने ही पते हैं—खोये हुए, उन घरों के पते, जहाँ हम अपनी पिछली साँसें छोड़ आये हैं। इन्हें पढ़ कर लगता है कि हिन्दी कवि के पास ख़ुद अपनी कितनी बड़ी और चौड़े पाट वाली परम्परा है। दिलचस्प यह है कि कल्पित ने उन छंदों, धुनों, ज़मीनों की अनुकृति नहीं की है, बल्कि उन प्राचीन नीवों पर नयी इमारतें खड़ी की हैं।                 कल्पित ने 'मैं’ को 'सब’ से जोड़ा है। जो गुज़रते थे दाग़ पर सदमे अब वही कैफियत सभी की है। ये कविताएँ एक साथ पुर्नरचना हैं, पुनराविष्कार हैं, पुर्ननवा सृजन है। कैसे थेर भिक्षुणी हमारे आँगन में आकर खड़ी हो जाती है, यह देखते ही बनता है। कल्पित ने अतीत को वत्र्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढाल कर उसे व्यतीत होने से रोका है। इसीलिए हर कविता एक साथ कई कालों में प्रवाहित होती है।                 कल्पित ने अनेक कविताएँ आज के साहित्य समाज और साहित्यकारों को लक्ष्य कर लिखी है। बेहद बेधक, तेज़, कत्ल कर देने वाली कविताएँ। आज के लगभग शालीन, सहिष्णु, सर्वधर्मसमभाव वाले साहित्य समाज में इनकी छौंक बर्दाश्त करना कठिन है। लेकिन कल्पित ने फिक्र न की, अपना स्वार्थ न ताका, किसी का मुँह न देखा। कई बार मुझे भी लगा कि भई कुछ ज़्यादा हो रहा है, लेकिन कल्पित ने परवाह न की। ऐसी कविताओं का चलन हर भाषा में रहा है। ख़ुद हिन्दी में। खासकर छायावाद काल में। अब यह कम दिखता है। कल्पित ने इसे भी साधा और जगाया है। देखना है, ख़ुद कल्पित के करीबी दोस्त क्या कहते हैं। क्योंकि सच कहना मतलब अकेला होना है। हुज़ूर बेदिल फरमाते हैं—याद रख कि सुन्दरता को शर्म और लज्जा पसंद है। अप्सरा अपना तमाशा दिखाने के लिए चाहती है कि आँखें बंद रखो।                 कृष्ण कल्पित बाग़-ए-बेदिल का बुलबुल है। सूफी मिज़ाज के महान कवि बेदिल, जो बिहार के होकर भी सारी दुनिया की आवाज़ बन गए, हमारे साथी कवि कल्पित के लिए खानकाह से कम नहीं। बेदिल कहते हैं—इतनी दूर न जाओ कि रास्ता भूल जाओ और फिर फरियाद करते फिरो। हमारा वुज़ूद खयाल के दश्त से गुज़रता हुआ काफिला है जहाँ कदम की चाप भी सुनाई नहीं देती, केवल रंग की गर्दिश का आभास होता है। कृष्ण कल्पित का यह संग्रह खयाल के दश्त से गुज़रता हुआ काफिला है। आमीन! —अरुण कमल
मूल्‍य : HB 850/-, PB 450/- 
प्रकाशन वर्ष : 2013, पृ. सं: 512
ISBN : 978-93-81923-63-4
ISBN : 978-93-81923-64-1

बाग़-ए-बेदिल (Bagh-E-Bedil) : कृष्‍ण कल्पित (Krishna Kalpit)

जब तक बेदिल का केवल नाम सुना था तब तक जानता न था कि तज्र-ए-बेदिल में रेख्ता क्या है? जब तक बाग़-ए-बेदिल को दूर से, बाहर से देखा था तब तक जानता न था कि वहाँ खुशबू क्या है? जब तक कल्ब-ए-कबीर उर्फ़ कृष्ण कल्पित का यह पूरा संग्रह पढ़ा न था तब तक जानता न था कि यहाँ कौन सा खज़ाना गड़ा है।
         हममें से बहुतों ने कृष्ण कल्पित के ये छोटे-छोटे पद अपने मोबाइल के पर्दे पर पढ़ रखे हैं और आपस में कई बार इन पर चर्चा भी की है। लेकिन उस क्षणभंगुर लोक में ये दोहे एक स्फुलिंग की तरह उठे और फिर गुम हो गए। इन्हें दुबारा, तिबारा एक दूसरे से मिलाकर, ठहर-ठहर कर पढऩे गुनने का मौका शायद ही किसी को मिला। कहते हैं, बूँद बूँद से तालाब भरता है। यहाँ तो इन छोटे-छोटे पदों से, पाँच सौ से भी ज़्यादा पदों से, एक पूरा वज़नी दीवान बन चुका है।
                इस दीवान ने मुझे कई हफ्तों से बेचैन कर रखा है। मानव जीवन का कोई भी भाव ऐसा नहीं जो यहाँ न हो। हिन्दी, उर्दू, राजस्थानी, ब्रज, अवधी, फारसी और संस्कृत की सात धाराओं से जरखेज यह भूमि हमारी कविता के लिए एक दुर्लभ खोज की तरह है। एकरस, एक सरीखी, इकहरी, निहंग कविताओं के सामने यह संग्रह एक बीहड़, सघन वन प्रांतर की तरह है। समुद्र से उठती भूमि की तरह। ऐसी कविताएँ आज तक लिखीं न गईं। एक साथ रूलाने, हँसाने, क्रोध से उफनाने वाली कविताएँ, घृणा और प्यार को एक साथ गूँथने वाली कविताएँ किसी समकालीन के यहाँ मुश्किल से मिलेंगी। सबकी आवाज़भर्तृहरि, धरणीदास, राजशेखर, कालिदास, व्यास, कबीर, मीर, गालिब, निराला, बेदिल और बहुत से, बहुत-बहुत से कवियों की आवाज़ें यहाँ एक ही ऑर्केस्ट्रा में पैबस्त हैं। मीर तकी मीर ही नहीं, ख़ुद यह संग्रह ग़रीब-गुरबों, मज़लूमों, वंचितों के लिए चल रहा एक विराट् राहत शिविर है। समकालीन कविता ने इसके पहले कभी भी इतनी सारी प्रतिध्वनियाँ एकत्र न की थीं। लगता है जैसे सरहप्पा, भर्तृहरि, शमशेर और केदारनाथ सिंह एक ही थाल में जीम रहे हों। परम्परा यहाँ जाग्रत है। यह हमारे पुरखे कवियों के जागरण और पुनरागमन की रजत रात है।
                और कल्पित ने इतनी-इतनी धुनों, लयों, छंदों में रचा है। कौन सा ऐसा समकालीन है जिसकी तरकश में इतने छंद हैं, इतने पुष्प-बाण? आवाज़ और स्वर के इतने घुमाव, इतने घूर्ण, इतने भँवर, इतनी रंगभरी अनुकृतियाँ हैं।  कई बार तो इनमें से कुछ पदों को पढ़कर मैं ढूँढता हुआ क्षेमेन्द्र या राजशेखर या मीर या शाद तक पहुँचा। ये कविताएँ हमारे अपने ही पते हैंखोये हुए, उन घरों के पते, जहाँ हम अपनी पिछली साँसें छोड़ आये हैं। इन्हें पढ़ कर लगता है कि हिन्दी कवि के पास ख़ुद अपनी कितनी बड़ी और चौड़े पाट वाली परम्परा है। दिलचस्प यह है कि कल्पित ने उन छंदों, धुनों, ज़मीनों की अनुकृति नहीं की है, बल्कि उन प्राचीन नीवों पर नयी इमारतें खड़ी की हैं।
                कल्पित ने 'मैंको 'सबसे जोड़ा है। जो गुज़रते थे दाग़ पर सदमे अब वही कैफियत सभी की है। ये कविताएँ एक साथ पुर्नरचना हैं, पुनराविष्कार हैं, पुर्ननवा सृजन है। कैसे थेर भिक्षुणी हमारे आँगन में आकर खड़ी हो जाती है, यह देखते ही बनता है। कल्पित ने अतीत को वत्र्तमान में ढाल दिया है और वर्तमान को अतीत में ढाल कर उसे व्यतीत होने से रोका है। इसीलिए हर कविता एक साथ कई कालों में प्रवाहित होती है।
                कल्पित ने अनेक कविताएँ आज के साहित्य समाज और साहित्यकारों को लक्ष्य कर लिखी है। बेहद बेधक, तेज़, कत्ल कर देने वाली कविताएँ। आज के लगभग शालीन, सहिष्णु, सर्वधर्मसमभाव वाले साहित्य समाज में इनकी छौंक बर्दाश्त करना कठिन है। लेकिन कल्पित ने फिक्र न की, अपना स्वार्थ न ताका, किसी का मुँह न देखा। कई बार मुझे भी लगा कि भई कुछ ज़्यादा हो रहा है, लेकिन कल्पित ने परवाह न की। ऐसी कविताओं का चलन हर भाषा में रहा है। ख़ुद हिन्दी में। खासकर छायावाद काल में। अब यह कम दिखता है। कल्पित ने इसे भी साधा और जगाया है। देखना है, ख़ुद कल्पित के करीबी दोस्त क्या कहते हैं। क्योंकि सच कहना मतलब अकेला होना है। हुज़ूर बेदिल फरमाते हैंयाद रख कि सुन्दरता को शर्म और लज्जा पसंद है। अप्सरा अपना तमाशा दिखाने के लिए चाहती है कि आँखें बंद रखो।
                कृष्ण कल्पित बाग़-ए-बेदिल का बुलबुल है। सूफी मिज़ाज के महान कवि बेदिल, जो बिहार के होकर भी सारी दुनिया की आवाज़ बन गए, हमारे साथी कवि कल्पित के लिए खानकाह से कम नहीं। बेदिल कहते हैंइतनी दूर न जाओ कि रास्ता भूल जाओ और फिर फरियाद करते फिरो। हमारा वुज़ूद खयाल के दश्त से गुज़रता हुआ काफिला है जहाँ कदम की चाप भी सुनाई नहीं देती, केवल रंग की गर्दिश का आभास होता है। कृष्ण कल्पित का यह संग्रह खयाल के दश्त से गुज़रता हुआ काफिला है। आमीन!
अरुण कमल

बाग़-ए-बेदिल (Bagh-E-Bedil) : कृष्‍ण कल्पित (Krishna Kalpit)
कृष्ण कल्पित
कवि-गद्यकार कृष्ण कल्पित का जन्म 30 अक्टूबर, 1957 को रेगिस्तान के एक कस्बे फतेहपुर शेखावाटी, राजस्थान में हुआ।
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से हिन्दी साहित्य में प्रथम स्थान लेकर
एम. ए. (1980)फिल्म और टेलीविज़न संस्थान, पुणे से फिल्म निर्माण पर अध्ययन।
अध्यापन, पत्रकारिता के बाद 1982 में भारतीय प्रसारण सेवा में प्रवेश। आकाशवाणी व दूरदर्शन के विभिन्न केन्द्रों के बाद सम्प्रति उपमहानिदेशक, दूरदर्शन केन्द्र, पटना-राँची।
कविता की चार पुस्तकें प्रकाशित— 'भीड़ से गुज़रते हुए’ (1980), 'बढ़ई का बेटा’ (1990), 'कोई अछूता सबद’ (2003) और 'एक शराबी की सूक्तियाँ’ (2006)
मीडिया/सिनेमा समीक्षा पर बहुचर्चित पुस्तक 'छोटा परदा, बड़ा परदा’ (2003)
'राजस्थान पत्रिका’, 'जनसत्ता’, 'रविवारमें बरसों तक मीडिया/सिनेमा पर स्तम्भ लेखन।
मीरा नायर की अन्तरराष्ट्रीय ख्याति की फिल्म 'कामसूत्रमें भारत सरकार की ओर से सम्पर्क अधिकारी के रूप में कार्य।
ऋत्विक घटक के जीवन पर एक वृत्त-चित्र 'एक पेड़ की कहानीका
निर्माण (1997)
साम्प्रदायिकता के खिलाफ 'भारत-भारती कविता यात्राके अखिल भारतीय
संयोजक (1992)
कविता-कहानियों के अंग्रेज़ी के अलावा कई भारतीय भाषाओं में अनुवाद।

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अप्रैल 2013 में जारी पुस्‍तकें...




हिंदी में समाचार : अरविंद दास

पूँजीवाद के प्रसार के लिए अखबारों का इस्तेमाल शुरू से ही होता रहा है और अखबार अपने प्रसार और मुनाफे के लिए पूँजी का सहारा लेते रहे हैं। भूमंडलीकरण के साथ पनपे नव पूँजीवाद और हिंदी अखबारों के बीच संबंध काफी रोचक हैं। संचार क्रांति ने हिंदी अखबारों की रूपरेखा और विषय-वस्तु को इस कदर बदल दिया कि आज वह एक प्रोडक्ट भर बन कर रह गया है।  	उदारीकरण के इक्कीस-बाइस साल बाद अगर हम हिंदी अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालें  तो स्पष्ट दिखेगा कि उनका जोर मनोरंजन, खेल और आर्थिक खबरों पर ज्यादा है। पत्रकारिता का स्वरूप लगभग अराजनीतिक हो चला है। वहाँ जो पूँजी लगाई जाती है वह सिर्फ पाठक नामक उपभोक्ता से नहीं, विज्ञापन दाता की असीम कृपा पर दोहरी-तिहरी होकर लौटती है। युवा पत्रकार, स्कॉलर और शोधार्थी अरविंद दास ने भाषायी पत्रकारिता की इन स्थितियों को बेहतर ढंग से समझा है और प्रमाण, तर्क और उदाहरणों के जरिये विश्लेषित किया है।  	वर्ष 1991 में उदारीकरण के रास्ते संचार, बाजार, निवेश और उपभोग के पहियों पर सवार होकर भारत में समकालीन भूमंडलीकरण का जो रथ उतरा उसने हिंदी पत्रकारिता को किस रूप में प्रभावित किया? पिछले दो दशकों में भारतीय राज्य, समाज और भूमंडलीकरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के संबंध किस रूप में विकसित हुए? इसका निरुपण, विवेचन और विश्लेषण इस किताब का मुख्य लक्ष्य है। 	'हिंदी में समाचार’ के मार्फत हिंदी पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले तो इनमें आए बदलाव से जुड़ीं स्थितियों-परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ ही सकते हैं, हिंदी पत्रकारिता के छात्रों-शोधार्थियों के लिए भी यह एक अनिवार्य सी पुस्तक है।
PRICE : 390.00 (HB)














भूमंडलीकरण के साथ पनपे नव पूँजीवाद और हिंदी अखबारों के बीच संबंध काफी रोचक हैं। हिंदी अखबार जो अंग्रेजी अखबारों के पिछलग्गू बने हुए थे, अपनी निजी पहचान लेकर सामने आए।
संचार क्रांति के दौर में इनके व्यावसायिक हितों के फलने-फूलने का खूब मौका मिला और आज ये 'ग्लोकल' हैं।
उदारीकरण के बाद भारतीय राज्य और समाज के स्वरूप में आए परिवर्तनों के बरक्स भारतीय मीडिया ने भी खबरों के चयन, प्रस्तुतीकरण, प्रबंधन आदि में परिवर्तन किया। हिंदी अखबारों की सुर्खियों पर नजर डालें तो स्पष्ट दिखेगा कि खबरों के मानी, उसके उत्पादन के ढंग बदल गए हैं। अखबारों के माध्यम से बनने वाली हिंदी की सार्वजनिक दुनिया में जहाँ राजनीतिक खबरों और बहस-मुबाहिसा के बदले मनोरंजन का तत्व हावी है, वहीं भाषा, स्त्री और दलित विमर्श का एक नया रूप उभरा है। मिश्रित-अर्थव्यवस्था में जो मध्यवर्गीय इच्छा दबी हुई थी, वह खुले बाजार में अखबारों के पन्नों पर खुल कर अभिव्यक्त हो रही है। खबरों के कारोबार में 'पेड न्यूज फाँस नजर आने लगी है। हिंदी पत्रकारिता की इन स्थितियों को यह शोधपरक किताब पहली बार सामग्री विश्लेषण और उदाहरणों के जरिये निरूपित करती है।
                वर्ष 1991 में उदारीकरण के रास्ते आए भूमंडलीकरण ने हिंदी पत्रकारिता को किस रूप में प्रभावित किया? पिछले दो दशकों में भारतीय राज्य, समाज और भूमंडलीकरण के साथ हिंदी पत्रकारिता के संबंध किस रूप में विकसित हुए? शोध और पत्रकारिता के अपने साझे अनुभव का इस्तेमाल कर अत्यधिक परिश्रम से लेखक ने इसका विवेचन और विश्लेषण किया है।
                'हिंदी में समाचार के मार्फत हिंदी पत्रकारिता में रुचि रखनेवाले तो इनमें आए बदलाव से जुड़ीं स्थितियों-परिस्थितियों को बेहतर ढंग से समझ ही सकते हैं, हिंदी पत्रकारिता के छात्रों-शोधार्थियों के लिए भी यह एक अनिवार्य सी पुस्तक है।





अरविंद दास

 arvindkdas@gmail.com
 जन्म : 1978 में बेलारही, मधुबनी (बिहार) में।
 शिक्षा : दिल्ली विश्वविद्यालय के देशबंधु कॉलेज से अर्थशास्त्र की पढ़ाई, आईआईएमसी से पत्रकारिता में प्रशिक्षण और जेएनयू से हिंदी  साहित्य और मीडिया में शोध। भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान, पुणे से फिल्म एप्रिसिएशन कोर्स। नेशनल कौंसिल फॉर प्रमोशन ऑफ उर्दू लैंग्वेज से उर्दू में डिप्लोमा। जर्मनी के जिगन विश्वविद्यालय से पोस्ट डॉक्टरल शोध। पीएचडी के लिए जूनियर रिसर्च फेलोशिप और पोस्ट डॉक्टरल शोध के लिए जर्मन रिसर्च फांउडेशन फेलोशिप।
                देश-विदेश में मीडिया को लेकर हुए सेमिनारों, वर्कशॉपों में शोध पत्रों की प्रस्तुति। भारतीय मीडिया के विभिन्न आयामों को लेकर जर्मनी के विश्वविद्यालयों में व्याख्यान। इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट के दक्षिण एशियाई देशों के पत्रकारों के लिए 2012 में 'न्यू मीडिया को लेकर ट्रेनिंग और कोलंबो में हुए वर्कशॉप में भागीदारी।
                बीबीसी के दिल्ली स्थित ब्यूरो में सलाहकार और स्टार न्यूज में मल्टीमीडिया कंटेंट एडिटर रहे। 'अलग अंदाजÓ के ब्लॉगर। ब्लॉग लेखों का संकलन 'गुल, नजूरा और रामचंद पाकिस्तानी शीघ्र प्रकाश्य। मिथिला कला को लेकर एक लघु पुस्तिका 'गर्दिश में एक चित्र शैली प्रकाशित।
                फिलहाल पिछले दो वर्षों से करेंट अफेयर्स कार्यक्रम बनाने वाली प्रतिष्ठित प्रोडक्शन कंपनी आईटीवी के सीनियर रिसर्चर। विशेष तौर पर सीएनएन-आईबीएन पर प्रसारित होने वाले चर्चित कार्यक्रम 'डेविल्स एडवोकेट और 'लास्ट वर्ड के शोध की जिम्मेदारी।
संपर्क : बीडी स्ट्रीट, 14 एच, डीडीए फ्लैट्स, मुनिरका, नई दिल्ली-110067
ई-मेल : arvindkdas@gmail.com




 

झाँकी : व्‍योमेश शुक्‍ल

कामायनी की कहानी जिन पंक्तियों से बनती है महज़ उनसे भी महाकाव्य में शामिल बड़ी दार्शनिक समस्याओं की झाँकी मिल जाएगी। बाकी कविता भी अनिवार्य है और इस चयन में वह आलोकित ही होती है। ऐसे ही, पंक्तियों के क्रम में भी कहीं-कहीं कुछ उलटफेर है। प्रसाद ने मनोविकारों के आधार पर सर्गों की रचना की है। हमने कहीं उन मनोविकारों को स्वाधीन चरित्रों की तरह विकसित किया है—कहीं वे दूसरे चरित्रों में घुल गये हैं और कहीं उन्हें पूरा छोड़ भी दिया गया है। यों, यह नाट्यालेख भले ही मूल कविता-पंक्तियों के स्तंभ पर खड़ा है, उससे पूरी तरह स्वायत्त है और पढऩे की मेज़ की जगह रिहर्सल के फ्लोर पर—मंचन की ज़रूरतों के मुताबिक संभव हुआ है।   'कामायनी’ के साथ हमने 'शक्तिपूजा’ के मंचन का फैसला किया। 1936 में लिखी गयी इस कृति की रचना के पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर, वैसे भी एक मौका बनता था। राम के आत्मसंघर्ष में निराला का संग्राम तो दिखता ही है, अपने छोटे-छोटे समर भी हम उसमें खोजते रहे हैं। अधुनातन अंतर्वस्तु को पारंपरिक देहभाषा के ज़रिये अभिव्यक्त किया जा सके, यह हमेशा हमारा स्वप्न है। बनारस की रामलीला जैसे प्राचीनतम् नाट्यरूप के साथ आधुनिक रंगमंच की अंत:क्रिया ज़्यादा प्रत्यक्ष और रोमांचक हो, इस संकल्प को भी हमने एक चुनौती की तरह लिया है। 'शक्तिपूजा’ में यथावसर, यथाशक्ति रामलीला के तत्व को विन्यस्त और चरितार्थ करने का प्रयत्न किया गया है। इस कविता की भाषा में एक स्वत:स्फूर्त संगीत अंत:सलिल है।
मूल्‍य : 75.00













कामायनी की कहानी जिन पंक्तियों से बनती है महज़ उनसे भी महाकाव्य में शामिल बड़ी दार्शनिक समस्याओं की झाँकी मिल जाएगी। बाकी कविता भी अनिवार्य है और इस चयन में वह आलोकित ही होती है। ऐसे ही, पंक्तियों के क्रम में भी कहीं-कहीं कुछ उलटफेर है। प्रसाद ने मनोविकारों के आधार पर सर्गों की रचना की है। हमने कहीं उन मनोविकारों को स्वाधीन चरित्रों की तरह विकसित किया हैकहीं वे दूसरे चरित्रों में घुल गये हैं और कहीं उन्हें पूरा छोड़ भी दिया गया है। यों, यह नाट्यालेख भले ही मूल कविता-पंक्तियों के स्तंभ पर खड़ा है, उससे पूरी तरह स्वायत्त है और पढऩे की मेज़ की जगह रिहर्सल के फ्लोर परमंचन की ज़रूरतों के मुताबिक संभव हुआ है।

 'कामायनी के साथ हमने 'शक्तिपूजा के मंचन का फैसला किया। 1936 में लिखी गयी इस कृति की रचना के पचहत्तर वर्ष पूरे होने पर, वैसे भी एक मौका बनता था। राम के आत्मसंघर्ष में निराला का संग्राम तो दिखता ही है, अपने छोटे-छोटे समर भी हम उसमें खोजते रहे हैं। अधुनातन अंतर्वस्तु को पारंपरिक देहभाषा के ज़रिये अभिव्यक्त किया जा सके, यह हमेशा हमारा स्वप्न है। बनारस की रामलीला जैसे प्राचीनतम् नाट्यरूप के साथ आधुनिक रंगमंच की अंत:क्रिया ज़्यादा प्रत्यक्ष और रोमांचक हो, इस संकल्प को भी हमने एक चुनौती की तरह लिया है। 'शक्तिपूजा में यथावसर, यथाशक्ति रामलीला के तत्व को विन्यस्त और चरितार्थ करने का प्रयत्न किया गया है। इस कविता की भाषा में एक स्वत:स्फूर्त संगीत अंत:सलिल है।



व्योमेश शुक्ल

25 जून, 1980 को वाराणसी में जन्म। यहीं बचपन और एम.ए. तक पढ़ाई। शहर के जीवन, अतीत, भूगोल और दिक्कतों पर एकाग्र लेखों और प्रतिक्रियाओं से 2004 में लिखने की शुरुआत। कविताओं के अलावा आलोचनात्मक लेखन। मशहूर अमेरिकी कवि-अनुवादक-पत्रकार इलियट वाइनबर्गर की किताब का हिंदी अनुवाद 'मैंने इराक के बारे में जो सुना शीर्षक से 'पहल पुस्तिका के रूप में प्रकाशित। इसके अलावा विश्व साहित्य से नॉम चॉम्स्की, हॉवर्ड जिन, रेमण्ड विलियम्स और वॉल्टर बेंजामिन के कुछ निबंधों के हिंदी में अनुवाद। बनारस की चित्रकूट रामलीला का विधिवत अध्ययन। सुप्रसिद्ध कला इतिहासकार राय कृष्णदास के जीवन और अवदान पर उनके पुत्र प्रसिद्ध कलाविद् राय आनन्दकृष्ण के साथ बातचीत पर आधारित एक जीवनीपरक पुस्तक में व्यस्त। नाट्यशास्त्र और संगीत पर केंद्रित कुछ निबंध।
2008 में कविताओं के लिए अंकुर मिश्र स्मृति पुरस्कार।
2009 में कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल स्मृति पुरस्कार।
2013 में रज़ा फाउंडेशन फेलोशिप।
रंगकर्म में विशेष दिलचस्पी। 2011 में मोहन राकेश लिखित संस्कृत कवि कालिदास की जीवन-ट्रैजिडी पर आधारित नाटक 'आषाड़ का एक दिन का समसामयिक अभिप्रायों में मंचन। फिलहाल जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य 'कामायनी की बैले के विन्यास में प्रस्तुति तैयार की है।
संपर्क : सी-27/111, बी-4, जगतगंज, वाराणसी-221002 (उ.प्र.)
ई-मेल : vyomeshshukla@gmail.com