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विश्व पुस्तक मेला (7-15 जनवरी 2017) में जारी कुछ महत्वपूर्ण किताबें

सोनम गुप्ता बेवफ़ा नहीं है : अनिल यादव
पहली बार किसी ने दस रुपए के नोट पर लिखा होगा, सोनम गुप्ता बेवफ़ा है, तब क्या घटित हुआ होगा? क्या नियति से आशि, मिज़ाज से आविष्कारक कोई लड़का ठुकराया गया होगा, उसने डंक से तिलमिलाते हुए सोनम को बदनाम करने की गरज से उसे सरेबाज़ार ला दिया होगा। या वह सिर्फ़ रियाद करना चाहता था, किसी और से कर लेना लेकिन इस सोनम से दिल न लगाना।
क्या पता सोनम को कुछ बर ही न हो, वह सड़क की पटरी पर मुँह फाड़ कर गोलगप्पे खा रही हो, ज़िंदगी में तीसरी बार लिपिस्टिक लगाकर होंठों को किसी गाने में सुने होंठों जैसा महसूस रही हो, अपनी भाभी के सैंडिलों में ख़ुद को आजमा रही हो और तभी वह लड़के को ऐसी स्वप्न सुंदरी लगी हो जिसे कभी पाया नहीं जा सकता। लड़के ने चाहा हो कि उसे अभी के अभी दिल टूटने का दर्द हो, वह एक क्षण में वो जी ले जिसे जीने में प्रेमियों को पूरी ज़िंदगी लगती है, उसने किसी को तड़प कर बेवफ़ा कहना चाहा हो और नतीजे में ऐसा हो गया हो। यह भी तो हो सकता है कि किसी चिबिल्ली लड़की ने ही अपनी सहेली सोनम से कट्टी करने के बाद उसे नोट पर उतार कर राहत पाई हो।
जो भी हुआ हो लेकिन वह वैसा ही आविष्कारक था या थी जैसा समुद्र से आती हवा को अपने सीने पर आँख बंद करके महसूस करने वाला वो मछुआरा या मुसाफ़िर रहा होगा जिसे पहली बार नाव में पाल लगाने का इल्हाम हुआ होगा। या वह आदमी जिसने इस तरनाक और असुरक्षित दुनिया में बिल्कुल पहली बार अभय मुद्रा में कहा होगा, ईश्वर सर्वशक्तिमान है। उसने नोट के हज़ारों आँखों से होते हुए अनजान ठिकानों पर जाने में छिपी परिस्थितिजन्य तात को शायद महसूस किया होगा, वो भी ऐसे वक़्त में जब हर नोट को बड़े गौर से देखा जा रहा है, उसके बारे में आपका नज़रिया आपको देशभक्त, कालाधनप्रेमी या स्यूडोसेकुलर कुछ भी बना सकता है।
नोटबंदी के चौकन्ने समय में सोनम गुप्ता सारी दुनिया में पहुँच गई, उसके साथ वही हुआ जो सूक्तियों के साथ हुआ करता है। वे पढऩे-सुनने वाले की स्मृति, पूर्वाग्रहों, वंचनाओं और कुंठाओं के साथ घुलमिल कर बिल्कुल अलग कल्पनातीत अर्थ पा जाती हैं। यह रहस्यमय प्रक्रिया है जिसके अंत में किसी स्कूल या रेलवे स्टेशन की दीवार पर लिखा 'अच्छे नागरिक बनिएजातिवाद के ज़हर के असर में झूमते समाज में ज़रा-सा स्वाराघात बदल जाने से प्रेरित करने के बजाय कहीं और निशाना लगाने लगता है। सबसे लद्धड़ प्रतिक्रियाएँ सरसों के नली तेल के झार की तासीर वाली नारीवादियों की तर से आईं जिन्होंने कहा, सोनू सिंह या संदीप रस्तोगी क्यों नहीं? उन्हें सोनम गुप्ता नाम की लड़कियों की हिफ़ाज़त की चिंता सताने लगी जिन्हें सिर्फ़ इसी एक कारण से छेड़ा जाने वाला था और यह भी कि हमेशा औरत ही बेवफ़ा क्यों कही जाए। हमेशा घायल होने को आतुर इस ब्रांड के नारीवाद का अंजाम चाहे जो हो, 'सपोज दैटमें भी मर्द से बराबरी चाहिए। जूते के हिसाब से पैर काटने की ज़िद के कारण वे अपनी सोनम को ज़रा भी नहीं पहचान पाईं।
इन दिनों देश में पाले बहुत सा खिंच चुके हैं और एक बड़े गृहयुद्ध से पहले की छोटी झड़पों से आवेशित गर्जना और हुंकारें सुनाई दे रही हैं। एक तर आरएसएस की उग्र मुसलमान विरोधी विचारधारा और प्रधानमंत्री मोदी की व्यक्तिपूजा की केमिस्ट्री से पैदा हुए भक्त हैं जो बैंकों के सामने लगी बदहवास तारों में से छिटक कर गिरने वालों की बेजान देह समेत हर चीज़ को देशभक्ति और देशद्रोह के पलड़ों में तौल रहे हैं। दूसरी तर मामूली लोग हैं जिनके पास कुछ ऐसा भुरभुरा और मार्मिक है जिसे बचाने के लिए वे उलझना कल पर टाल देते हैं। भक्त सरकार के कामकाज को आँकने, फ़ैसला लेने का अधिकार छीनकर अपना चश्मा पहना देना चाहते हैं और जो इनकार करे गद्दार हो जाता है। हर नुक्कड़ पर दिखाई दे रहा है, अक्सर दोनों पक्षों के बीच एक तनावग्रस्त, असहनीय चुप्पी छा जाती है। तभी सोनम गुप्ता प्रकट होती है जो लगभग मर चुकी बातचीत को एक साझा हँसी से जिला देती है। सोनम गुप्ता उस युद्ध को टाल रही है। उसकी बेवफ़ाई से अनायास भड़कने वाली जो हँसी है उसमें कोई रजामंदी और ख़ुशी तो कतई नहीं है। सब अपने-अपने कारणों से हँसते हैं।.
फ्लैप
जब पत्रकारिता का अधिकांश, पूरी तरह से चाटुकारिता में तब्दील हो गया हो, किसी पत्रकार का असल पत्रकार रह जाना एक बड़ी बात है। केवल पत्रकारों को क्या कहा जाय, दृश्य तो यह कह रहा है कि किसी नागरिक का ही असल नागरिक रह जाना बहुत कठिन बात हो गई है। ऐसे में यह गनीमत है कि हमारे पास अनिल यादव के रूप में एक ऐसा मानुस है जिसके भीतर, इस समय में भी उसका नागरिक और पत्रकार अपने असल रूप में जीवित है। आज हिन्दी का पाठक देश, दुनिया,समाज में घट रही घटनाओं पर एक ठीक-ठाक नज़रिये की चाहत लिये अखबार, पत्रिकाएँ, फेसबुक और टीवी चैनल घूरते हुए भारी हताशा का शिकार है—लगभग भेड़ बनने को अभिशप्त। ऐसे में जब अनिल यादव के लिखे से उसकी भेंट होती है तो सहसा उसकी नाउम्मीदी और ऊब से भरी आँखों में चमक आ जाती है। एक ऐसी चमक जो भुलाए जा रहे विवेक, साहस और ईमानदारी को देखने से पैदा होती है और एक बेहद जि़ंदा अनूठी भाषा के सहारे हमारे भीतर उतरती है। यह चमक पाठक को चमत्कृत नहीं करती बल्कि उसके भीतर भी नए चिंतन, नई दृष्टि की चमक पैदा करती है। यह किताब 'सोनम गुप्ता बेवफा नहीं है', अपने भीतर इसी अनीलियन एलीमेन्ट को पूरेपन में समेटे हुए है। यह ऐसे समय में आ रही है, जब तमाम सोनू और सोनमें रोज़ देशद्रोही और बेवफा करार दिये जा रहे हैं लेकिन इस किताब में 1990 से लेकर 2016 के बीच छपी लेखक की उन चुनिंदा टिप्पणियों को स्थान दिया गया है, जिनमें न केवल इस दौर के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का एक नए नज़रिये से विश्लेषण मौज़ूद है,बल्कि जो हमें आगामी परिवर्तनों को सही नज़रिये से देखे जाने की सलाहियत भी बख्शती है। विगत पच्चीस वर्षों में देश, दुनिया और समाज में आये भीतरी बदलावों पर रोशनी डालती ऐसी ही टिप्पणियों, लेखों और रिपोर्ताजों से यह किताब रोशन है। अपने दिमाग की खिड़की खोले रखने और पर्याप्त हवा-रोशनी की चाहत रखने वाले पाठकों के लिए एक जरूरी किताब।
—सुशील सुमन



बीज-भोजी : गौरीनाथ
आज के दौर में ग्रामीण जीवन पर लिखने वाले कथाकार सामान्य-ज्ञान के प्रश्नोत्तर बनकर रह गए हैं।
चमकते-दमकते विकास के युग में कीचड़-सने किसानों को कौन पूछता है! दूसरी तरफ गाँवों में किसानों और खेती से जुड़े अन्य लोगों का जीवन कठिन से कठिनतर होता चला गया है। कौन रोये उनका दुख, कौन गाए उनका गान! ऐसे कठिन दौर में गौरीनाथ की कहानियाँ किसी टूरिस्ट का सफरनामा नहीं, बल्कि दैनिक ज़द्दोजहद में लगे किसान-मज़दूरों के सुख-दु:ख से बावस्ता मार्मिक आख्यान हैं! वे केवल गाँव की गाथा नहीं लिखते बल्कि अपनी गँवई आँखों से शहर के भी रंग-ढंग देखते और सिहरते हैं। गौरीनाथ समकालीन कथालोक के एक अनूठे कथाकार हैं।
'बीज-भोजी' किसान आत्महत्या और अभाव से हो रही मौतों की दुखभरी गाथा है। किसान होना किसी व्यक्ति के जीवट की मुकम्मल गवाही है। वह किसान अंत तक जूझता है और अंतत: कर्ज और भूख में दबकर मर जाता है। यह मौत हमारी सभ्यता के मृत होने की मुखर घोषणा है। 'पैमाइश' कहानी एक तरफ गाँव की पतनशीलता का आख्यान है तो दूसरी तरफ दुस्साहसी, स्वच्छंद तथा कर्मठ स्त्री 'संन्यासिन' के डायन में तब्दील होने का लोमहर्षक दस्तावेज़ भी। कोई प्रखर और परिश्रमी स्त्री क्यों गाँव-भर में डायन बताई जाने लगती है, इसके पीछे कौन-सा क्षुद्र स्वार्थ छुपा होता है इसे 'पैमाइश' पढ़कर अच्छी तरह जाना जा सकता है। इसी प्रकार 'एक एकाउण्टेंट की डायरी में मिट्टी की गंध' कहानी का नायक महानगरीय जीवन की तमाम सुख-सुविधाओं को हासिल कर लेने के बावजूद बचपन से प्राणों में घुली मिट्टी की गंध पाने के लिए बदहवास फिरता है, जबकि उसके घर के लोग उसे मिट्टी से दूर रखने की जी-तोड़ कोशिशें करते हैं। 'तर्पण' कहानी गाँव के भीतर ही अपने मन में बसे गाँव को बचाए रखने की असफल कोशिशों को सामने लाती है और यह भी बताती है कि किस तरह शहरीकरण का दैत्य गाँव को गाँव नहीं रहने देने के लिए बेताब है।
—विपिन कुमार शर्मा


विश्व की चर्चित कहानियाँ : सुशांत सुप्रिय
प्रतिष्ठित साहित्यकार सुशांत सुप्रिय द्वारा अनूदित विश्व-साहित्य की ये अप्रतिम कहानियाँ मूल भाषा में
लिखी कहानियों-सी सोंधी खुशबू बिखेरती हैं।
सुशांत के सर्जनात्मक अनुवाद में एक सघन आत्मीयता है। विस्मित करने वाली इन कहानियों के अनुवाद की भाषा-शैली इतनी सरल, सहज, जीवंत और रवानगी भरी है कि इन्हें पढ़ते हुए यह लगता ही नहीं कि हम किसी और भाषा से अनूदित रचना पढ़ रहे हैं। सुशांत द्वारा चुनी गई इन असाधारण कहानियों की गहरी मानवीय दृष्टि और मार्मिक सृष्टि हमारे स्मृति-कोष को समृद्ध करती है। एशिया, यूरोप, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका और दक्षिणी अमेरिका के ग्यारह महान् लेखकों की चर्चित कहानियों का यह संकलन पाठकों को अवश्य पसंद आएगा। प्रस्तुत है--बोर्गेस, मार्खेज़, चेखव, सार्त्र, काफ्का, सारामागो, मुराकामी, अचेबे, ओ' फ्लैहर्टी, हेमिंग्वे और ऐटवुड की चर्चित कहानियों का यह मूल्यवान संकलन हिंदी पाठकों के लिए।


मॉल में कबूतर : डॉ. विनय कुमार
'मॉल में कबूतर' हिंदी कविता के वैविध्य को नया आयाम देता है। हिंदी में बाज़ार पर कविताएँ लिखी जाती
रही हैं और उन कविताओं में प्रतिरोध की परंपरा भी नज़र आती है लेकिन बाज़ार पर केंद्रित कविताओं का ही संग्रह हो, यह देखने को नहीं मिलता। विनय कुमार बाज़ार के विभिन्न आयामों को इन कविताओं में रखते हैं। ये आयाम हमारे रोज़मर्रा के अनुभव और वस्तुओं के उपभोग से निर्मित हुए हैं। बाज़ार मनुष्य की समूची चेतना पर अकल्पनीय गति का दबाव निर्मित करता है : 'मैंने आधी कॉफी खत्म कर ली है/ उसका इंतखाब अब भी बाकी है'। इस इंतखाब में पीछे छूटने का डर भी शामिल है। दरअसल बाज़ार ने मनुष्य की लालसाओं और आशंकाओं को एक जगह ला दिया है : 'बुरे वक्त को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता/ कि आपकी कलाई पर बंधी घड़ी/ कितनी पाबंद/कितनी खूबसूरत/ और कितनी महँगी है।' सामान्य मनुष्य की त्रासदी मॉल में अनायास फँस गए कबूतर-सी है। यह रूपक वस्तुओं से पटी दुनिया की जड़ता और क्रूरता को उजागर करता है।
मॉल हमारे भीतर बहुराष्ट्रीय होने का मिथक रचता है। वह हमें यह बताता है कि राष्ट्र और संस्कृतियाँ, इतिहास और सभ्यता के रास्ते विकसित नहीं होती, वे वस्तुओं के उपभोग के दरवाज़े से होकर हमारे भीतर जगह बनाती हैं। बाज़ार का यह नया अवतार मनुष्य और प्रकृति के आदिम संबंधों को नष्ट कर रहा है। प्रकृति से अधिक बहुलता कहाँ संभव है? लेकिन मॉल एक छद्म-बहुलता निर्मित करता है जबकि मॉल की संस्कृति वस्तुत: निर्जनता की संस्कृति है। मॉल-संस्कृति के इन निहितार्थों और मानवीय संवेदना के बदलते आयामों को चिन्हित करने में ये कविताएँ सहज साथ हो लेती हैं। ये कविताएँ बाज़ार का कोई मुखर प्रतिरोध नहीं रचती लेकिन वे हमारी चेतना में बाज़ार के दाखिल होने के सारे दरवाज़ों की कुंजियों की तलाश करते हुए पाठक को नई अनुभूतियों व संवेदनाओं से भर देती हैं। विषय की सरलता में मौजूद वस्तुगत जटिलता को ये कविताएँ बखूबी प्रस्तुत करती हैं। कविता का एक काम यह भी है कि वह पाठक के आत्म को विस्तृत करे। उसमें ऐसी संवेदना विकसित करे कि वह अपने ज्ञान की उदारता और मार्मिकता की एक साथ तलाश करे। 'मॉल में कबूतर' में इस तरह की संवेदनाएँ बहुतायत में हैं। 
—अच्युतानंद मिश्र

अभी मैंने देखा : शेफ़ाली फ्रॉस्ट

‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन हैं जिसका प्रकाशन इसी वर्ष हुआ है। फिल्म तथा प्रयोगात्मक आर्ट से जुड़ी शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएं उनके सर्जनात्मक स्पर्श से सम्पृक्त हैं। विमर्शों के मुहावरों में परिणत होने वाले समय में शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएँ अपनी ताजगी से आह्लादित करती हैं। ये कविताएं अपने समय के साथ खड़ी होकर उसका वक्तव्य बनती हैं। स्त्री गंध से सर्वथा अछूती होना इनका एक दुर्लभ पक्ष है। ये कविताएं बृहद मानवीय दृष्टि की उपज हैं जिन्हें किसी लैंगिक विभाजन में बांटकर नहीं देखा जा सका। ऐसा नहीं है कि यहां स्त्री नहीं है, पर उसकी उपस्थिति एक सम्पूर्ण मानवीय इकाई के रूप में है। कविता संग्रह को यदि हम उसकी समग्रता में देखें तो उसमें एक उपन्यास का विस्तार पा सकते हैं। इसमें पात्र अपनी दुनिया के साथ आते हैं और कथानक की  कड़ी बन जाते हैं। इनमें कई पात्र ऐसे हैं जो फिर फिर उपस्थित होते हैं। चैराहे पर चालीस के पार की उम्र की एक औरत आती है जो अपने अंदर बीस वर्षों का आक्रोश समेटे है। उसके साथ ही उसका पुरुष साथी है। प्रौढ़ वय का वह व्यक्ति शहरी मशीनी दिनचर्या का पर्याय बन जाता है। प्रतिदिन की मशीनी दिनचर्या उसके जीवन का रस सोख लेती है। आगे चलकर एक कविता में इन दोनों का वार्तालाप उपस्थित किया गया है। यह वार्तालाप स्त्री पुरुष संबंधों की यांत्रिकता का पर्याय बन जाती है। रिश्तों की डोर में बंधा दो व्यक्तियों का संबंध कई बार बीच में कुछ इस कदर बिखरता है कि यह अहसास ही नहीं होता कि व्यक्ति कब एक दूसरे से छिटक कर दूर जा पड़े हैं। संबंधों की इस अजनबियत को इस संग्रह में जगह जगह महसूस किया जा सकता है। इसे शहरी सभ्यता का बाई प्रोडक्ट माना जा सकता है। यह ठीक है कि शेफाली फ्रॉस्ट का कविता संसार गुजरते या देखे गये दृश्यों से निर्मित है। यहां अनुभूति की प्रामाणिकता का सवाल उठ सकता है। निश्चय ही इन कविताओं का संसार सहानुभूति से निर्मित है। किंतु यह निःसंकोच स्वीकार किया जा सकता है कि यहाँ जो बाहरी परिवेश है वह कवयित्री की संवेदनपूर्ण अंतर्दृष्टि से नम आौर उद्भासित है। कवयित्री इन दृश्यों पर त्वरित प्रतिक्रिया देकर नहीं हट जातीं बल्कि दोनों हाथों से बाहरी सतह की पारदर्शी परत को हटाकर उनकी दुनिया और अंतर्जगत में प्रवेश करती हैं। जब वे लिखती हैं कि ‘क्या तेल लगे बालों में कंघी घुमाता आदमी/उतार सकता है धूल भरा चेहरा जो शहर की गलियों ने उसे बिना पूछे पहनाया है’ तो शहर के गर्द भरे चेहरे के साथ शहरी जीवन की यंत्रणा, नियति और विवशता साकार हो उठती है। इन अलग-अलग देखे हुए दृश्यों को मिलाकर शहर का एक मुकम्मल कोलाज बनाया जा सकता है। यह शहर  है -‘भीड़ इतनी है लेकिन/ आदमी कुल्ला करे कि तकरार/प्यार करे कि मन भर सिंदूर डाल कर/ ताकता रहे आसमान/ निगल जाता है यह शहर/ खिड़की से आंख/दरवाजे से धड़’’। ‘लफाड़िया चांद’ संकलन की एक उल्लेखनीय कविता है। वह चांद जो आसमान में प्रतिदिन उगता है और जिसकी मोहकता को बिम्बों में बांधा जाता रहा है- उसका एक रूप यह भी है।  चकत्तेदार गड्ढों से भरा पड़ा चांद सूरज से रोशनी उधार लेता है और मानो आसमान से गिरकर हर तरफ से लतियाया जाता है, कभी जल की सतह उसे दुत्कारती है, कभी कीचड़ में पड़ता है पर डूबता उतराता यह चांद फिर निकलता है ‘‘लौट लौटकर आयेगा वो/पलट पलट के  निकाला जायेगा/लफाड़िया लतियाया बेआबरू चांद/वो मरेगा नहीं कल /देखना''।  शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का बिम्ब अपने टटकेपन में ध्यान आकृष्ट करता हैं। इन बिम्बों में मूर्त और अमूर्त का एकीकरण अर्थ को विशिष्ट आभा से दीप्त करता है। ‘‘मेरे गले की झिल्लियों में/ फंसाकर अपना हाथ/वही पुरानी दास्तान/हकलाती है कितनी बार’’, ‘‘एक गीत का छिलका/उतर कर सब्जियों में लगा रहा है आवाज/फफोले वाले तवे पर दरकती है रोटी’’ जैसे प्रयोगों से इसे समझा जा सकता है। कविता की ध्वन्यात्मकता इतनी प्रखर है कि उसमें दृश्यात्मकता भी आ जुड़ती है। कहीं-कहीं इन बिम्बों में स्वप्नलोक की आकृतियों का भी आभास मिलता है। इस प्रकार की कविताएं जटिल हो उठी हैं और इनका अर्थ धीरे-धीरे पंखुड़ी दर पंखुडी खुलता है और अपने साथ अर्थ की कई परतें लेकर आते हैं। कवयित्री के सर्जनात्मक स्पर्श से ये बिम्ब अपूर्व हो उठे हैं।  शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का विन्यास इतना गठा हुआ है कि उसमें से एक शब्द को भी इधर उधर करना दीवाल की ईंट खिसकाने की तरह है। निश्चय ही ये कविताएं भावनात्मक उद्गार मात्र नहीं, एक गहन रचना-प्रक्रिया की उपज हैं। किसी चित्र की तरह इसकी एक-एक रेखा, एक-एक रंग बहुत बारीकी और कलात्मक से अंकित है। अपने कलात्मक संगुफन में ये कविताएं महादेवी के शिल्प गठन का स्मरण करा देती है। शेफाली फ्रॉस्ट का भविष्य की एक संभावना शील कवयित्री के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।
‘अभी मैंने देखा’ शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का संकलन हैं. फिल्म तथा प्रयोगात्मक आर्ट से जुड़ी शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएं उनके सर्जनात्मक स्पर्श से सम्पृक्त हैं। विमर्शों के मुहावरों में परिणत होने वाले समय में शेफाली फ्रॉस्ट की कविताएँ अपनी ताजगी से आह्लादित करती हैं। ये कविताएं अपने समय के साथ खड़ी होकर उसका वक्तव्य बनती हैं। स्त्री गंध से सर्वथा अछूती होना इनका एक दुर्लभ पक्ष है। ये कविताएं बृहद मानवीय दृष्टि की उपज हैं जिन्हें किसी लैंगिक विभाजन में बांटकर नहीं देखा जा सका। ऐसा नहीं है कि यहां स्त्री नहीं है, पर उसकी उपस्थिति एक सम्पूर्ण मानवीय इकाई के रूप में है।
कविता संग्रह को यदि हम उसकी समग्रता में देखें तो उसमें एक उपन्यास का विस्तार पा सकते हैं। इसमें पात्र अपनी दुनिया के साथ आते हैं और कथानक की  कड़ी बन जाते हैं। इनमें कई पात्र ऐसे हैं जो फिर फिर उपस्थित होते हैं। चैराहे पर चालीस के पार की उम्र की एक औरत आती है जो अपने अंदर बीस वर्षों का आक्रोश समेटे है। उसके साथ ही उसका पुरुष साथी है। प्रौढ़ वय का वह व्यक्ति शहरी मशीनी दिनचर्या का पर्याय बन जाता है। प्रतिदिन की मशीनी दिनचर्या उसके जीवन का रस सोख लेती है। आगे चलकर एक कविता में इन दोनों का वार्तालाप उपस्थित किया गया है। यह वार्तालाप स्त्री पुरुष संबंधों की यांत्रिकता का पर्याय बन जाती है। रिश्तों की डोर में बंधा दो व्यक्तियों का संबंध कई बार बीच में कुछ इस कदर बिखरता है कि यह अहसास ही नहीं होता कि व्यक्ति कब एक दूसरे से छिटक कर दूर जा पड़े हैं। संबंधों की इस अजनबियत को इस संग्रह में जगह जगह महसूस किया जा सकता है। इसे शहरी सभ्यता का बाई प्रोडक्ट माना जा सकता है।
यह ठीक है कि शेफाली फ्रॉस्ट का कविता संसार गुजरते या देखे गये दृश्यों से निर्मित है। यहां अनुभूति की प्रामाणिकता का सवाल उठ सकता है। निश्चय ही इन कविताओं का संसार सहानुभूति से निर्मित है। किंतु यह निःसंकोच स्वीकार किया जा सकता है कि यहाँ जो बाहरी परिवेश है वह कवयित्री की संवेदनपूर्ण अंतर्दृष्टि से नम आौर उद्भासित है। कवयित्री इन दृश्यों पर त्वरित प्रतिक्रिया देकर नहीं हट जातीं बल्कि दोनों हाथों से बाहरी सतह की पारदर्शी परत को हटाकर उनकी दुनिया और अंतर्जगत में प्रवेश करती हैं। जब वे लिखती हैं कि ‘क्या तेल लगे बालों में कंघी घुमाता आदमी/उतार सकता है धूल भरा चेहरा जो शहर की गलियों ने उसे बिना पूछे पहनाया है’ तो शहर के गर्द भरे चेहरे के साथ शहरी जीवन की यंत्रणा, नियति और विवशता साकार हो उठती है। इन अलग-अलग देखे हुए दृश्यों को मिलाकर शहर का एक मुकम्मल कोलाज बनाया जा सकता है। यह शहर  है -‘भीड़ इतनी है लेकिन/ आदमी कुल्ला करे कि तकरार/प्यार करे कि मन भर सिंदूर डाल कर/ ताकता रहे आसमान/ निगल जाता है यह शहर/ खिड़की से आंख/दरवाजे से धड़’’।
‘लफाड़िया चांद’ संकलन की एक उल्लेखनीय कविता है। वह चांद जो आसमान में प्रतिदिन उगता है और जिसकी मोहकता को बिम्बों में बांधा जाता रहा है- उसका एक रूप यह भी है।  चकत्तेदार गड्ढों से भरा पड़ा चांद सूरज से रोशनी उधार लेता है और मानो आसमान से गिरकर हर तरफ से लतियाया जाता है, कभी जल की सतह उसे दुत्कारती है, कभी कीचड़ में पड़ता है पर डूबता उतराता यह चांद फिर निकलता है ‘‘लौट लौटकर आयेगा वो/पलट पलट के  निकाला जायेगा/लफाड़िया लतियाया बेआबरू चांद/वो मरेगा नहीं कल /देखना''। 
शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का बिम्ब अपने टटकेपन में ध्यान आकृष्ट करता हैं। इन बिम्बों में मूर्त और अमूर्त का एकीकरण अर्थ को विशिष्ट आभा से दीप्त करता है। ‘‘मेरे गले की झिल्लियों में/ फंसाकर अपना हाथ/वही पुरानी दास्तान/हकलाती है कितनी बार’’, ‘‘एक गीत का छिलका/उतर कर सब्जियों में लगा रहा है आवाज/फफोले वाले तवे पर दरकती है रोटी’’ जैसे प्रयोगों से इसे समझा जा सकता है।
कविता की ध्वन्यात्मकता इतनी प्रखर है कि उसमें दृश्यात्मकता भी आ जुड़ती है। कहीं-कहीं इन बिम्बों में स्वप्नलोक की आकृतियों का भी आभास मिलता है। इस प्रकार की कविताएं जटिल हो उठी हैं और इनका अर्थ धीरे-धीरे पंखुड़ी दर पंखुडी खुलता है और अपने साथ अर्थ की कई परतें लेकर आते हैं। कवयित्री के सर्जनात्मक स्पर्श से ये बिम्ब अपूर्व हो उठे हैं। 
शेफाली फ्रॉस्ट की कविताओं का विन्यास इतना गठा हुआ है कि उसमें से एक शब्द को भी इधर उधर करना दीवाल की ईंट खिसकाने की तरह है। निश्चय ही ये कविताएं भावनात्मक उद्गार मात्र नहीं, एक गहन रचना-प्रक्रिया की उपज हैं। किसी चित्र की तरह इसकी एक-एक रेखा, एक-एक रंग बहुत बारीकी और कलात्मक से अंकित है। अपने कलात्मक संगुफन में ये कविताएं महादेवी के शिल्प गठन का स्मरण करा देती है।
शेफाली फ्रॉस्ट का भविष्य की एक संभावना शील कवयित्री के रूप में स्वागत किया जाना चाहिए।
--सुनीता गुप्ता

डायरी से झाँकती ज़िंदगी : राम जनम सिंह
पुस्तक के रूप में राम जनम सिंह की यह दूसरी कृृति है। अपनी पहली पुस्तक 'मानव संसाधन
प्रबंधन के अनुभूत आयाम’ के अंतर्गत लेखक ने प्रबंधन के मानवीय पक्ष पर विशेष जोर देते हुए अपने अनुभवजन्य विचारों एवं भावों को शब्दबद्ध करने का प्रयास किया। इसे विद्वान पाठकों की अपार सराहना मिली। अपनी दूसरी कृति 'डायरी से झाँकती ज़िंदगी’  में लेखक ने विभिन्न विषयों एवं घटनाओं पर स्वानुभूतिमूलक विचारों को शब्दबद्ध करके उन्हें प्रासंगिकता प्रदान करने का सराहनीय प्रयास किया है।
लेखक की डायरी से संकलित ये अंश, जो पुस्तक रूप में आपके सामने है, मूलत: व्यक्तिपरक है। परन्तु इसमें सार्वजनिकता भी है। इसमें व्यक्त भावों एवं विचारों को सार्वजन्य बनने की प्रक्रिया में लेखक की सशक्त अभिव्यक्ति प्रभावी साबित हुई है।


एक उर्सुला होती है : कुमार मुकुल
निपट गद्य में सूखे विचारों की कविताएँ आप रोज़ पढ़ते हैं। आज उस लोक में चलते हैं जहाँ जीवन
के आदिम राग और रस की गूँज है। यह गूँज उस कवि के अचेतन से निकली है जिसे आप कुमार मुकुल के नाम से जानते हैं। जीवन के आदिम राग को अपने काल की भाषा में गाना आसान नहीं। मगर कुमार मुकुल ने उसे इतनी तन्मयता और ईमानदारी से गाया है कि वह जटिलतम राग आपकी आत्मा को सहज लोकगीत-सा छूता लगता है। ये सिर्फ़ प्रेम के आत्मीय अनुभवों की कविताएँ नहीं उसकी उलझनों, दुर्घटनाओं और उदासियों की भी कविताएँ हैं। बल्कि सच तो यह है कि इनमें में जीवन की बहुरंगी छवियाँ कौंधती हैं।
संग्रह में एक कविता पंक्ति है—'हर विंसेंट की एक उर्सुला होती है।तो क्या यह भी सच नहीं है कि हर कवि थोड़ा विंसेंट होता हैविंसेंट वान गॉग, सृजन के जुनून का मारा एक चाकगरेबाँ मुसाफ़िर! पता नहीं। मगर यह संग्रह यक़ीनन उस कवि का है जो न सही पूरा, थोड़ा विंसेंट अवश्य है। वही आवेग, वही ऊष्मा और वही तन्मयता!
वस्तु में बदल दिए गए प्रेम के शोर से भरे समय में तन्मयता की इन कविताओं का स्वागत है; 'तन्मयता / समझते हैं ना आप तन्मयता के माने / मतलब तब हमारे आस-पास की / हर वस्तु बोलने लगती है / हमारी ही भाषा!
कुमार मुकुल महीन संवेदना के कवि हैं और नागर हिंदी के आँगन में उनकी लोकभाषा साधिकार आवाजाही करती है। इसलिए इनकी काव्यभाषा का आस्वाद एकदम अलग है।
डॉ. विनय कुमार

करजा के खातिर : राणा प्रताप सिंह

ग्रामीण जीवन और कृषि संदर्भों से जुड़ी राणा प्रताप सिंह की कहानियाँ लेखक के जीवनानुभव में रसी-पगी कहानियाँ हैं। लेखक गाँव में रहते कृषि-कर्म के साथ-साथ लेखन और दूसरे कार्य भी करते हैं। कृषि-कर्म से लेखक के सीधा जुड़ाव का प्रभाव इन कहानियों में सा-सा दिखाई पड़ता है। भाषाई स्तर पर किसी तरह के चकाचौंध यहाँ नहीं मिलेंगे न ही शिल्प का चमत्कार, लेकिन कथ्य और संवेदना के स्तर पर जीवनानुभव का जो सौंधापन यहाँ दिखता है वह अलहदा है।
'करजा के खातिरसंग्रह में कुल ग्यारह कहानियाँ हैंकरजा के खातिरलसहरा, अंधेरे में हम, राधे-राधे, अन्तूचउआई, उतरती रात, नवकेतन, राह की तलाश, ज़रूरत, ख़िर कब तक? ये तमाम कहानियाँ ग्रामीण समाज के दैनंदिन अनुभवों के साथ-साथ लोक-जीवन और गाथाओं से खाद-पानी ग्रहण करती हैं। दैनिक संघर्षों के साथ-साथ ग्रामांचल की राजनीतिक विकृतियाँ और लोगों की भाव दशाएँ और मनोदशाएँ भी परिलक्षित होती हैं।



बया अप्रैल-जून 2016 ‘विश्वविद्यालय परिसर’ पर केन्द्रित अंक

बया अप्रैल-जून 2016, ‘विश्वविद्यालय परिसर’ पर केन्द्रित अंक का मुख्य आकर्षण :

विचार खंड : विश्वविद्यालय परिसर : हमारा परिसर : जेएनयू : आंदोलनों की वैचारिकियों और वैचारिकियों के आंदोलन-स्थल / आनन्द पाण्डेय जेएनयू डायरी : और लडऩे की ज़रूरत बाक़ी है / मिथिलेश प्रियदर्शी विश्वविद्यालय : शिक्षा का केंद्र या राजनीति का अखाड़ा / जगन्नाथ प्रसाद दुबे पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस वाया 'बनारस’ / सुधांशु कुमार पटना में आर्ट कॉलेज बचाओ आंदोलन का इंकलाब / पुष्पराज गंगा-जमुनी संस्कृति के साये में.../ अर्शिया रसूल जब लड़कियाँ रात भर धरने पर बैठीं.../नीलोफ़र उस्मानी   ‘देशभक्ति का मनोविज्ञान’ : राष्ट्र : वाद और द्रोह / विनय कुमार ‘दस्तावेज़’ : सितारों तक की यात्रा / रोहित वेमुला ‘प्रसंगत:’ : हम नौजवान थे और विश्वविद्यालय में थे / पंकज श्रीवास्तव   ‘मुलाहज़ा’ : कविता की नई पौद / मदन कश्यप   कहानी : दस्तावेज़ : घुसपैठिये / ओमप्रकाश वाल्मीकि   कहानी : प्रसंगत: : फैक्ट्री / लाल्टू   कहानी : विश्वविद्यालय परिसर से : पथर फोड़वा / अनिल कार्की विद्रोहिणी / रूपाली सिंह अड़्याठ कथा / पवनेश ठकुराठी 'पवन’ यादों का जलता दीया / फिरोज़ आलम 'जेन’     कविताएँ : विश्वविद्यालय परिसर से : शालू देवी प्रजापति, दृष्टि गांधी, सूरज त्रिपाठी, अजय कुमार गौतम, मुदस्सिर अहमद भट्ट, प्रणव कुमार मिश्र, रेणु कुमारी, सेतु कुमार वर्मा, जितेन, कैफ़ी हाशमी, पंकज कुमार मिश्र, कुमार मंगलम, आयुष गुप्त, दिव्यांशु पाल नागर, अभिनव, आस्था, अमन त्रिपाठी, अदिति शर्मा, शुभम श्री, वर्तिका सिंह, मनीष, आरती रानी प्रजापति, दिनेश कुमार शर्मा, अमित कुमार सिंह, प्रीति सुमन, शुभम, प्रिंस कुमार, समीक्षा, राजकुमारी, राकेश शर्मा, चन्द्रभूषण चन्द्र, दिनेश कुमार, सुरेश पवार, आदित्य राज सोमानी, शेखर सिंह, स्नेहा सिंह, पम्मी राय, प्रियंका शुक्ला, अमन शुक्ला, पल्लवी मिश्रा, विजय सिंह, मनु कंचन, वत्सला नाईक, शशिकला मौर्य, खेमकरण 'सोमन’, नीता तोरड़े, रेणु, विनायक सोनी, शिव कुमार पटेल, बीरज पाण्डेय, सत्यनारायण प्रियदर्शी, अमित कुमार मिश्रा, प्रमोद राजभर, रितु अहलावत, शुभम नेमा, वागीशा, अर्शिया रसूल, आशीष तंवर, रणजीत तिवारी, अर्चिता सिंह, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता   ‘स्मृति शेष’ : मुद्राराक्षस की याद : तर्पण की मुद्रा में नहीं / सुरेश सलिल
विचार खंड : विश्वविद्यालय परिसर :
हमारा परिसर :
जेएनयू : आंदोलनों की वैचारिकियों और वैचारिकियों के आंदोलन-स्थल / आनन्द पाण्डेय
जेएनयू डायरी : और लडऩे की ज़रूरत बाक़ी है / मिथिलेश प्रियदर्शी
विश्वविद्यालय : शिक्षा का केंद्र या राजनीति का अखाड़ा / जगन्नाथ प्रसाद दुबे
पटना-सिकंदराबाद एक्सप्रेस वाया 'बनारस’ / सुधांशु कुमार
पटना में आर्ट कॉलेज बचाओ आंदोलन का इंकलाब / पुष्पराज
गंगा-जमुनी संस्कृति के साये में.../ अर्शिया रसूल
जब लड़कियाँ रात भर धरने पर बैठीं.../नीलोर उस्मानी

‘देशभक्ति का मनोविज्ञान’ :
राष्ट्र : वाद और द्रोह / विनय कुमार
‘दस्तावेज़’ :
सितारों तक की यात्रा / रोहित वेमुला
‘प्रसंगत:’ :
हम नौजवान थे और विश्वविद्यालय में थे / पंकज श्रीवास्तव

‘मुलाहज़ा’ :
कविता की नई पौद / मदन कश्यप

कहानी : दस्तावेज़ :
घुसपैठिये / ओमप्रकाश वाल्मीकि

कहानी : प्रसंगत: :
फैक्ट्री / लाल्टू

कहानी : विश्वविद्यालय परिसर से :
पथर फोड़वा / अनिल कार्की
विद्रोहिणी / रूपाली सिंह
अड़्याठ कथा / पवनेश ठकुराठी 'पवन
यादों का जलता दीया / फिरोज़ आलम 'जेन


कविताएँ : विश्वविद्यालय परिसर से : 
(हमें जिन 61 छात्र-छात्राओं की कविताएँ इस अंक के लिए प्राप्त हुईं उन सभी की कविताएँ इस अंक में हैं। तीन सौ के क़रीब प्राप्त कविताओं में से चयन के बाद दो सौ के क़रीब यहाँ प्रस्तुत की गई हैं। यहाँ हमें हिंदी कविता का शानदार भविष्य नज़र आया इसलिए किसी को भी खारिज करना मुनासिब नहीं लगा। इनमें से कई आगे चलकर बड़े और मशहूर कवि होंगे। गौर करने वाली बात है कि इनमें चालीस से ज़्यादा ऐसे कवि हैं जो पहली बार किसी साहित्यिक पत्रिका में छप रहे हैं। गौर करने वाली बात यह भी है कि इनमें पच्चीस छात्राएँ हैं और दलित, पिछड़ी, आदिवासी आदि समुदायों सहित लगभग भारत के बड़े हिस्से की सहभागिता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों, वर्गों, वर्णों से आये इन विद्यार्थी-कवियों में अनेक स्तर पर विविधता के बावजूद प्रतिरोध के स्वर और जीवन के प्रति नज़रिए में अद्भुत साम्य है। व्यापक ऊर्जा और क्षमता से भरी यह पीढ़ी हिंदी कविता के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त करती है। बया परिवार की तरफ़ से हम इनका स्वागत करते हैं और हार्दिक शुभकामनाएँ देते हैं।
—संपादक)
शालू देवी प्रजापति, दृष्टि गांधी, सूरज त्रिपाठी, अजय कुमार गौतम, मुदस्सिर अहमद भट्ट, प्रणव कुमार मिश्र, रेणु कुमारी, सेतु कुमार वर्मा, जितेन, कैफ़ी हाशमी, पंकज कुमार मिश्र, कुमार मंगलम, आयुष गुप्त, दिव्यांशु पाल नागर, अभिनव, आस्था, अमन त्रिपाठी, अदिति शर्मा, शुभम श्री, वर्तिका सिंह, मनीष, आरती रानी प्रजापति, दिनेश कुमार शर्मा, अमित कुमार सिंह, प्रीति सुमन, शुभम, प्रिंस कुमार, समीक्षा, राजकुमारी, राकेश शर्मा, चन्द्रभूषण चन्द्र, दिनेश कुमार, सुरेश पवार, आदित्य राज सोमानी, शेखर सिंह, स्नेहा सिंह, पम्मी राय, प्रियंका शुक्ला, अमन शुक्ला, पल्लवी मिश्रा, विजय सिंह, मनु कंचन, वत्सला नाईक, शशिकला मौर्य, खेमकरण 'सोमन, नीता तोरड़े, रेणु, विनायक सोनी, शिव कुमार पटेल, बीरज पाण्डेय, सत्यनारायण प्रियदर्शी, अमित कुमार मिश्रा, प्रमोद राजभर, रितु अहलावत, शुभम नेमा, वागीशा, अर्शिया रसूल, आशीष तंवर, रणजीत तिवारी, अर्चिता सिंह, लक्ष्मण प्रसाद गुप्ता

‘स्मृति शेष’ : मुद्राराक्षस की याद : तर्पण की मुद्रा में नहीं / सुरेश सलिल


2016 में जारी महत्वपूर्ण किताबें


पेपरबैक मूल्य 130
पेपरबैक मूल्य 300


मूल्य स. 265/ पे. 160
पेपरबैक मूल्य 150

सजिल्द मूल्य 365
मूल्य स. 595/ पे. 475
सजिल्द मूल्य 685
सजिल्द मूल्य 535


सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 450
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 235

सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 450

सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 265
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 235
सजिल्द मूल्य 225
सजिल्द मूल्य 465




2016 में अंतिका प्रकाशन से जारी महत्वपूर्ण पुस्तकें

कथेतर गद्य 
जो मर के भी अमर हैं (क्रांतिकारियों के संस्मरण) : सं. : सुरेश सलिल      मू. 130
तुलसीराम : व्यक्तित्व और कृतित्व : सं. श्रीधरम     मू. 300
तुमि चिर सारथि (नागार्जुन आख्यान) : तारानन्द वियोगी     मू. 265
अन्धेरा भारत  (उत्पीडि़तों की आत्म-कहानियाँ) : रामजी यादव     मू. 150
दाह (मराठी दलित आत्मकथा) : ल. सी. जाधव     मू. 535
गोबरहा (दलित आत्मकथा) : विश्वनाथ राम     मू. 465
कलम की काकटेल (मीडिया-समाज) : शारदा शुक्ला     मू. 225
मानव संसाधन प्रबन्धन के अनुभूत आयाम : राम जनम सिंह     मू. 365

उपन्यास 
फिरंगी ठग : राजेन्द्र चन्द्रकांत राय     मू. 685
छिन्नमूल : पुष्पिता अवस्थी     मू. 595


कहानी-संग्रह 
मैं भी जाऊंगा... : गंगा प्रसाद विमल     मू. 235
गुलामों का गणतंत्र : राजेन्द्र चन्द्रकांत राय     मू. 235
अवाक् आतंकवादी  : अजय सोडानी     मू. 225
पहला रिश्ता : दीर्घ नारायण     मू. 265
वाट्स एप पर क्रांति : अनुराग पाठक     मू. 265
लुटिया में लोकतंत्र : राजेश पाल     मू. 235

कविता-संग्रह 
कोई दीवार भी नहीं : सुरेश सलिल     मू. 235
भोजपत्र : पुष्पिता अवस्थी     मू. 450
समुद्र से लौटकर रेत के घर : अमेय कांत     मू. 225
हथेलियों पर हस्ताक्षर : आभा दूबे     मू. 265
समय और समय : दुर्गाप्रसाद झाला     मू. 450
वरुणा का होना : वन्दना झा     मू. 265
कविता में सब कुछ सम्भव : शैलेन्द्र शैल     मू. 225
शूद्र : त्रिभुवन     मू. 235
अब और नहीं : रामचन्द्र त्यागी     मू. 225

गजल-संग्रह 
जीवन कर्जा गाड़ी है : अविनाश दास     मू. 225


नवीनतम पुस्तकें :  2015 में प्रकाशित कुछ और पुस्तकें






उपन्यास
लव विद बेनीफिट  : सर्वेश मिश्र  मू. 495.00


कहानी-संग्रह
नाटे कद का आदमी : संतोष गौतम मू. 225.00
दलदल : सुशांत सुप्रिय मू. 275.00



                                      कविता-संग्रह 

सपने को मरने मत देना : भावना मू. 265.00
इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं : 335.00 
जिसे वे बचा देखना चाहते हैं : लक्ष्‍मण प्रसाद गुप्ता 235.00


प्रबन्ध-काव्य
सुकन्या : रामावतार शशी मू. 265.00


                                              गजल 

शब्दों की कीमत : भावना मू. 235.00